Chapter Chapter 12. उपभोक्ता संरक्षण Class 12 Business Study CBSE notes in hindi पेज 2 - CBSE Study
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Chapter 12. उपभोक्ता संरक्षण
2. पेज 2
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986
यह अधिनियम 1जुलाई 1987 को जम्मू व कश्मीर के अतिरिक्त पुरे भारत में सभी वस्तुओं व सेवाओं पर लागू किया गया | इसका उद्येश्य उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है | जिसके लिए उपभोक्ता संरक्षण परिषद की स्थापन की गयी हैं |
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की मुख्य विशेषताएं
(1) मदों का फैलाव : इस अधिनियम में सभी वस्तुएं व सेवाएं शामिल होती हैं | जब तक किसी विशेष वस्तु व सेवाओं को केंद्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम से मुक्त नहीं किया जाता हैं |
(2) क्षेत्र का फैलाव : यह अधिनियम सभी क्षेत्र जैसे निजी , सार्वजनिक और सहकारी में लागू होता हैं |
(3) प्रावधानों की क्षतिपूरक प्रकृति : इस अधिनियम में उपभोक्ताओं की क्षतिपूरक अथवा अतिरिक्त मदद प्रदान किया जाता हैं |तथा उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की जाती हैं |
(4) उपभोक्ता अधिकारों का समूह : यह अधिनियम उपभोक्ताओं को निम्न अधिकार प्रदान करता हैं :- जैसे सुरक्षा, सूचना, चयन, प्रतिनिधित्व, उपचार और शिक्षा आदि |
(5) प्रभावी संरक्षण : यह अधिनियम उपभोक्ताओं को अनेक प्रकार के अनुचित व्यापार व्यवहारों से सुरक्षा प्रदान कराता हैं जैसे :त्रुटिपूर्ण पदार्थों और असंतोषजनक सेवाएं आदि |
(6) तीन स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र : उपभोक्ताओं के शिकायतों के निवारण के लिए तीन स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया गया है :- (i) जिला फोरम (ii) राज्य आयोग और (iii) राष्ट्रीय आयोग |
(7) समयबद्ध निवारण : इस अधिनियम की यह विशेषता हैं की इसमें शिकायतों का निवारण समय सीमा में किया जाता हैं |
(8) उपभोक्ता संरक्षण परिषद् : यह अधिनियम के अंतर्गत उपभोक्ताओं को शिक्षित करने के लिए उपभोक्ता संरक्षण परिषद् की स्थापन की गई हैं |
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के मुख्य प्रावधान
I. उपभोक्ता का अर्थ :- उपभोक्ता वह व्यक्ति जो -
(i) जो प्रतिफल के लिए वस्तुओं का क्रय और सेवाएं किराये पर लेता हैं |,
(ii) जो विक्रेता द्वारा वस्तुओं तथा सेवाओं का उपयोग करता हैं |
(iii) जो वस्तुओं तथा सेवाओं का क्रय पुनः बिक्री के लिए नहीं करता हैं |
II. शिकायत के आधार
(1) अनुचित व्यापार व्यवहार :- अनुचित व्यापार व्यवहार का अर्थ : एक व्यापारी दवारा अधिक लाभ अर्जित करने के लिए वस्तुओं/सेवाओं के बारे में गलत जानकारी देना, जमाखेरी करना , निर्धारित प्रमापों के अनुसार न होना आदि त्रुटिपूर्ण विधियों का प्रयोग करना |
(2) प्रतिबंधित व्यापार व्यवहार : प्रतिबंधित व्यापार व्यवहार का अर्थ : विक्रेता दवारा उपभोक्ता को शर्तसहित वस्तुओं और सेवाओं का विक्रेय करना | जैसे : कार क्रय करने के साथ बीमा पॉलिसी भी लेना |
(3) दोषयुक्त वस्तुएं : इस अधिनियम के अंतर्गत वस्तुओं के दोषयुक्त होने की स्थिति में उपभोक्ता इसके विरुद्ध शिकायत दायर कर सकता हैं |जैसे वस्तु की गुणवत्ता, शुद्धता, और मात्रा का शर्तों के अनुसार न होना आदि की स्थिति में |
(4) सेवाओं में न्यूनता : इस अधिनितम के अंतर्गत पीड़ित उपभोक्ता दोषपूर्ण सेवाओं के विरुद्ध शिकायत दायर कर सकता हैं | जैसे : (i) ऋण का समय पर उपलब्ध न होना ,(ii) माल की सुपुर्दगी में देरी ,(iii) बिजली विभाग दवारा गलत बिल देना |
(5) अधिक कीमत लेना : यदि किसी उपभोक्ता से वस्तु के पैकेट पर लिखे कीमत से अधिक कीमत ली जाती हैं तो उपभोक्ता इसके विरुद्ध शिकायत दायर कर सकता हैं |
(6) जोखिमपूर्ण वस्तुओं की पूर्ति : इसके अंतर्गत यदि कोई विक्रेता जोखिम पूर्ण वस्तुओं का विक्रय करता हैं तो उसे उस वस्तुओं से संबंधित आवश्यक जानकारी देना जरुरी हो जाता हैं | जैसे : बिजली यंत्र, प्रेशर कुकर इत्यादि वस्तुओं की स्थिति में |
III. तीन स्तरीय न्यायिक तंत्र
(1) जिला स्तर पर - जिला फोरम
(2) राज्य स्तर पर - राज्य आयोग
(3) राष्ट्रीय स्तर पर - राष्ट्रीय आयोग
IV. शिकायत निवारण अवधि
इस अधिनियम के अंतर्गत शिकायत निवारण की, सामान्य स्थिति में अवधि तीन महीने की , और विशेष स्थिति में पाँच महीने की होती हैं |
V. शिकायत कौन दायर कर सकता हैं ?
निम्नलिखित लोगों दवारा शिकायत दायर की जा सकती हैं |
(i) उपभोक्ताओं द्वारा, (ii) उपभोक्ता संघ द्वारा, (iii) केन्द्रीय सरकार द्वारा, (iv) राज्य सरकार द्वारा |
VI. शिकायत किसके विरुद्ध दायर की जा सकती हैं ?
(i) दोषपूर्ण वस्तुओं के विक्रेता और उत्पादक के विरुद्ध |
(ii) दोषपूर्ण सेवाएं सुपुर्द कराने वाले व्यक्ति के विरुद्ध |
VII. शिकायत फीस
प्रत्येक शिकायत के साथ निर्धारित फीस जमा की जाती हैं परन्तु न्यायालय फीस की आवश्कता नहीं होती हैं |
VIII. उपभोक्ताओं को उपलब्ध राहत
(1) वस्तुओं के दोषपूर्ण होने की स्थिति में उपभोक्ता को उस वस्तु के 'दोषों को दूर करने के आदेश ' से संबंधित अधिकार प्राप्त होते हैं |
(2) वस्तुओं के दोषपूर्ण होने की स्थिति में उपभोक्ता को दोषरहित वस्तुएं प्राप्त करने का अधिकार हैं |
(3) यदि विक्रेता की लापरवाही से उपभोक्ता को कोई हानि होती हैं तो उसे हानि की क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार हैं |
(4) उपभोक्ता को यह राहत होती हैं की वह सेवा में हुई कमी को दूर करवा सकता हैं |
(5) यदि कोई उपभोक्ता किसी अनुचित/प्रतिबंधित व्यापार व्यवहार के विरुद्ध शिकायत करता हैं तो उस पर तुरंत रोक लगाईं जाती हैं |
(6) ऐसी वस्तुएं जो जोखिमपूर्ण हैं उनकी बिक्री पर रोक लगाईं जाती हैं |