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Chapter Chapter 12. उपभोक्ता संरक्षण Class 12 Business Study CBSE notes in hindi पेज 1 - CBSE Study

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Chapter Chapter 12. उपभोक्ता संरक्षण Class 12 Business Study CBSE notes in hindi पेज 1 - CBSE Study

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Class 12 English Medium Business Study All Chapters:

Chapter 12. उपभोक्ता संरक्षण

1. पेज 1

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अध्याय - 12

उपभोक्ता संरक्षण

उपभोक्ता संरक्षण - इसका अभिप्राय उपभोक्ताओं को, उत्पादको तथा विक्रेताओं के अनुचित व्यवहार से सुरक्षा प्रदान करना है |

उपभोक्ता संरक्षण का महत्व

A) उपभोक्ताओं के दृष्टिकोण से

1) उपभोक्ता अनदेखी : प्रायः उपभोक्ता अपने अधिकारों की जानकारी न होने के कारण , बाजार में हो रहे शोषण के विरुद्ध आवाज नहीं उठा पाते हैं | वे शोषण को बाजार का आवश्यक हिस्सा मान कर उसे स्वीकार कर लेते हैं | और चुपचाप बैठे रहते है | अतः उन्हें उनके अधिकारों की शिक्षा देना आवश्यक हो जाता है, ताकि उनमें चेतना आए और वह शोषण के विरुद्ध आवाज उठाये |

2) असंगठित उपभोक्ता : उपभोक्ताओं का असंगठित होना उपभोक्ता संरक्षण के महत्व को प्रमाणित करता है | एक अकेले उपभोक्ता द्वारा शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने का इतना प्रभाव नहीं होता है जितना कि समूह द्वारा | अतः उपभोक्ताओं के संगठित होने में ही उनका हित है | उपभोक्ता संरक्षण उपभोक्ताओं को संगठित होने के लिए प्रेरित करता है | और उपभोक्ता अपने हितो की रक्षा स्वयं कर पाते हैं |

3) उपभोक्ताओं का बड़े पैमाने पर शोषण : उपभोक्ता शोषण के कुछ उदाहरण निम्न हैं :

a) उपभोक्ता वस्तुओं में मिलावट करना |

b) वस्तुओं व सेवाओं की घटिया किस्म |

c) कम तोलना व कम नापना |

d) वस्तुओं की बनावटी कमी करना |

उपभोक्ताओं को इस तरह हो रहे शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अति आवश्यक है|

B) व्यवसाय के दृष्टिकोण से

1)  व्यवसाय का दीर्घकालीन हित : प्रत्येक व्यवसाय लम्बे समय तक जीवित रहना चाहता है | ऐसा संभव है जबकि व्यवसायी फर्म उपभोक्ताओं को संतुष्टि प्रदान करें | ऐसा करके फर्म अपने ग्राहकों की संख्या बढ़ा सकती हैं | और लम्बे समय तक जीवित रह सकती है | इस तरह फर्म उपभोक्ता संरक्षण का कार्य करने में मदद करती हैं |

2) व्यवसाय द्वारा समाज के संसाधनों का प्रयोग करना : प्रत्येक व्यवसाय अनेक संसाधनों का उपयोग करती है जो उसे समाज से उपलब्ध होते है | इस प्रकार व्यवसाय का यह दायित्व होता है की वह समाज को अच्छी वस्तुएं उपलब्ध करवाए और अपना सामाजिक दायित्व पूरा करे |

3) सामाजिक उतरदायित्व : व्यवसाय के सभी संबंधित पक्षकारों (जैसे कर्मचारी, उपभोक्ता, पूर्ति कर्ता, प्रतियोगी, सरकार, आदि ) को संतुष्टि करने के उत्तरदायित्व को व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व कहते हैं | व्यवसाय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्षकार ग्राहक होता है | इसलिए इनके हितों की सुरक्षा की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए |

4) नैतिक औचित्य : यह व्यवसाय का कर्तव्य है कि वह उपभोक्ताओं को मिलावट, घटिया किस्म, भ्रमपूर्ण विज्ञापन, जमाखोरी, मुनाफाखोरी, काला-बाजार ,कम नाप-तोल, आदि रहित वस्तुएं उपलब्ध कराएं | इस प्रकार व्यवसाय उपभोक्ता संरक्षण के माध्यम से अपने नैतिक कर्तव्य को भी पूरा करता हैं |

5) सरकारी हस्तक्षेप : व्यवसाय को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रहने के लिए उपभोक्ताओं के हितों का ध्यान देना आवश्यक हो जाता हैं | ताकि सरकारी हस्तक्षेप से राहत के साथ- साथ व्यवसाय उपभोक्ता संरक्षण में भी भागीदारी कर सकें |

उपभोक्ताओं को वैधानिक संरक्षण

(1) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986: निम्न उपभोक्ता शोषण के विरुद्ध सुरक्षा :

(i) दोषमुक्त वस्तुओं,

(ii) अपूर्ण सेवाओं, और
(iii) अनुचित व्यापार व्यवहारों आदि | इस अधिनियम में उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के लाभ के लिए तीन स्तरीय तंत्र स्थापित किया गया हैं | ये हैं :- जिला स्तर पर जिला फोरम, राज्य स्तर पर राज्य आयोग तथा राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग | इसके अतिरिक्त उपभोक्ता संरक्षण परिषद् जो उपभोक्ता संरक्षण को बढावा देता हैं |

(2) अनुबंध अधिनियम, 1982 : यह अधिनियम अनुबंध के अंतर्गत पीड़ित पक्षकार को अनुबंध का उल्लंघन करने वाले पक्षकार के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता हैं |

(3) वस्तु बिक्री अधिनियम, 1930 : यह अधिनियम खरीदी गई वस्तुओं की शर्तों के अनुसार न होने पर क्रेता को सुरक्षा प्रदान करता हैं |

(4) आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 : यह अधिनियम आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, पूर्ति एवं वितरण पर नियंत्रण, मूल्यों में वृद्धि की प्रवृति पर नियंत्रण, जमाखोरी तथा काला-बाजारी पर नियंत्रण करता हैं |

(5) कृषि उत्पाद अधिनियम,1937 : इस अधिनियम में उत्पादों की गुणवत्ता की पहचान के लिए उत्पादों को एक निश्चित प्रमापों तथा निश्चित चिन्हों के अंतर्गत अलग- अलग श्रेणी में रखा जाता हैं | जैसे :- कृषि उत्पादों की गुणवत्ता को अगमार्क से सुनिश्चित किया जाता हैं |

(6)खाद्य मिलावट निवारण अधिनियम,1954 : यह अधिनियम खाद्य वस्तुओं में मिलावट के विरुद्ध उपभोक्ताओं को सुरक्षा प्रदान करता हैं |

(7) बाट तथा माप प्रमाप अधिनियम,1976 : इस अधिनियम के अंतर्गत कम माप तथा कम तोलने के विरूद्ध उपभोक्ताओं को संरक्षण प्रदान किया जाता हैं |

(8) ट्रेड मार्क अधिनियम,1999 : यह अधिनियम ट्रेड मार्क के गलत उपयोग के विरुद्ध उपभोक्ताओं को संरक्षण प्रदान कराता हैं | जो ट्रेड एंड मर्कंदिसे मार्क्स एक्ट ,1958 के स्थान पर बनाया गया हैं |

(9) प्रतियोगिता अधिनियम, 2002 : यह अधिनियम बाजार प्रतियोगिता में बाधा डालने वाली कार्यवाहियों के विरुद्ध उपभोक्ताओं को संरक्षण प्रदान करता हैं |

(10) भारतीय मानक अधिनियम,1986 : इस अधिनियम की विशेषताएँ निम्न हैं : (i) विभिन्न उत्पादों के गुणवत्ता प्रमाप निर्धारित करना और इसके  अंतर्गत ' ISI मार्क ' जारी करना ,गो उत्पाद की गुणवत्ता को निर्धारित करना हैं | (ii) ISI उत्पादों के विरुद्ध उपभोक्ताओं की शिकायतों का निवारण करना |

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