Chapter 5. जीवन की मौलिक इकाई Class 9 Science CBSE notes in hindi कोशिकांग (Cell Organelles) | माइटोकोंड्रिया का कार्य | माइटोकोंड्रिया का कार्य | प्लैस्टिड (Plastids) - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 9 English Medium Science All Chapters:
5. जीवन की मौलिक इकाई
4. कोशिकांग (Cell Organelles) | माइटोकोंड्रिया का कार्य | माइटोकोंड्रिया का कार्य | प्लैस्टिड (Plastids)
कोशिकांग (Cell Organelles) :
1. अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) (ER):
अंतर्द्रव्यी जालिका झिल्ली युक्त नलिकाओं तथा शीट का बहुत बड़ा तंत्र है | ये लंबी नलिका अथवा गोल या आयताकार थैलों (sac) कि तरह दिखाई देती हैं | अंतर्द्रव्यी जालिका की रचना भी प्लाज्मा झिल्ली के समरूप होती है |
अंतर्द्रव्यी जालिका दो प्रकार कि होती है :
(I) खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका (RER) :
(a) RER तैयार प्रोटीन को ER के द्वारा कोशिका के अन्य भागों में भेज देता है |
(b) इसमें राइबोसोम उपस्थित रहता है |
(II) चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (SER) :
(a) SER वसा अथवा लिपिड अणुओं के बनाने में सहायता करती है |
(b) इसमें राइबोसोम उपस्थित रहता है |
अंतर्द्रव्यी जालिका का कार्य :
(i) यह कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रक के मध्य जालिका तंत्र (network system) का निर्माण करता है |
(ii) यह कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रक के मध्य प्रोटीन के परिवहन के लिए नलिका के रूप में कार्य करता है |
(iii) ER कोशिका की कुछ जैव रासायनिक क्रियाओं के लिए कोशिकाद्रव्यी ढाँचे का कार्य करता है |
(iv) यकृत कोशिकाओं में SER विष एवं दवाओं के विषाक्त प्रभाव को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है |
(v) SER वसा अथवा लिपिड अणुओं के बनाने में सहायता करती है |
झिल्ली जीवात-जनन (membrane biogenesis): कुछ प्रोटीन तथा वसा कोशिका झिल्ली को बनाने में सहायता करते हैं | इस प्रक्रिया को झिल्ली जीवात-जनन (membrane biogenesis) कहते हैं |
2. गाल्जी उपकरण/बॉडी (Golgi aparatus/बॉडी) :
यह झिल्ली युक्त पुटिका है जो एक दुसरे के ऊपर समांतर रूप से सजी रहती हैं | जिन्हें कुण्डिका कहते है |
गाल्जी उपकरण का कार्य :
(i) यह ER की झिल्लियों से जुड़कर जटिल झिल्ली तंत्र के दुसरे भाग को बनाती है |
(ii) ER में संश्लेषित पदार्थों के लिए पैकेजिंग का कार्य करता है |
(iii) गोल्जी उपकरण में सामान्य शर्करा से जटिल शर्करा बनती है |
(iv) इसके द्वारा लाइसोसोम को भी बनाया जाता है |
ब्लैक रिएक्शन : कैमिलो गाल्जी ने अकेली तंत्रिका तथा कोशिका संरचनाओं को अभिरंगित करने की क्रन्तिकारी विधि प्रदान की | इस विधि को ब्लैक रिएक्शन के नाम से जाना जाता है | इस विधि में उन्होंने सिल्वर नाइट्रेट के तनु घोल का उपयोग किया था और विशेषत: यह कोशिकाओं कि कोमल शाखाओं कि प्रक्रियाओं का मार्ग पता लगाने में महत्वपूर्ण था |
3. राइबोसोम (Ribosome):
राइबोसोम कोशिका द्रव्य में मुक्त अवस्था में पाई जाने वाली गोल आकृति कि संरचना होती है | ये कोशिका द्रव्य में मुक्त रूप से पाई जा सकती है अथवा अंतर्द्रव्य जालिका (ER) से जुडी हो सकती हैं | राइबोसोम को कोशिका का प्रोटीन-फैक्ट्री भी कहा जाता है, क्योंकि यह प्रोटीन बनाता है |
राइबोसोम का कार्य:
(i) यह RNA (Ribonucleic-acid) का बना होता है |
(ii) यह एमिनो-अम्ल से प्रोटीन का निर्माण करता है |
(iii) ये कोशिका के जैव-रासायनिक क्रिया-कलापों के लिए सतह प्रदान करता है |
4. लाइसोसोम (Lysosome):
लाइसोसोम कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तंत्र है | यह झिल्ली से घिरी हुई संरचना है | लाइसोसोम बाहरी पदार्थों के साथ -साथ कोशिकांगों के टूटे-फूटे भागों को पाचित करके साफ करता है |लाइसोसोम में बहुत शक्तिशाली पाचनकारी एंजाइम होते है जो सभी कार्बनिक पदार्थों को तोड़ सकने में सक्षम है |
लाइसोसोम एक आत्मघाती थैली :
कोशिकीय चयापचय (Metabolism) में व्यवधान के कारण जब कोशिका क्षतिग्रस्त या मृत हो जाती है, to लाइसोसोम फट जाते हैं और इनके शक्तिशाली एंजाइम अपनी ही कोशिकाओं को पाचित कर देते हैं इसलिए लाइसोसोम को आत्मघाती (sucidal) बैग कहते है |
लाइसोसोम का कार्य:
(i) यह कोशिका के अपशिष्टों को पाचित कर कोशिका को साफ रखता है |
(ii) इसके शक्तिशाली एंजाइमस कोशिकांगो के अलावा जीवाणु, भोजन एवं कृमियों का पाचन करती है |
(iii) यह मृत एवं क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को हटाता है |
5. माइटोकोंड्रिया (Mitochondriya):
माइटोकोंड्रिया दोहरी झिल्ली वाली कोशिकांग है बाहरी झिल्ली छिद्रित होती है एवं भीतरी झिल्ली बहुत अधिक वलित (rounded) होती है | इसमें उसका अपना DNA तथा राइबोसोम होते हैं | अत: माइटोकोंड्रिया अपना कुछ प्रोटीन स्वयं बनाते हैं | इसलिए माइटोकोंड्रिया अदभुत अंगक है |
माइटोकोंड्रिया कोशिका का बिजली घर है :
जीवन के लिए आवश्यक विभिन्न रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकोंड्रिया ATP (एडिनोसिन ट्राई फॉस्फेट) के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं | ATP कोशिका कि वह ऊर्जा है जिसका निर्माण एवं संचयन माइटोकोंड्रिया में होता है | इस ऊर्जा का उपयोग नए रासायनिक यौगिकों को बनाने में तथा यांत्रिक कार्यों के लिए शरीर अथवा कोशिका द्वारा होता है | चूँकि ATP जैसे कोशिकीय ऊर्जा का निर्माण एवं संचयन माइटोकोंड्रिया में होता है इसलिए इसे कोशिका का बिजली घर कहते है |
माइटोकोंड्रिया का कार्य:
(i) यह ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करता है |
(ii) इसमें कोशिकीय श्वसन के लिए एंजाइम होते हैं |
(iii) यह अपना कुछ प्रोटीन स्वयं बनाता है |
(iv) कोशिकीय ऊर्जा का संचयन एवं निर्माण माइटोकोंड्रिया के द्वारा ही होता है |
6. प्लैस्टिड (Plastids):
प्लैस्टिड केवल पादप कोशिकाओं में स्थित होते है | प्लैस्टिड की भीतरी रचना में बहुत-सी झिल्ली वाली परतें होती है जो स्ट्रोमा में स्थित होती है | प्लैस्टिड बाह्य रचना में माइटोकोंड्रिया कि तरह होते हैं | माइटोकोंड्रिया कि तरह प्लैस्टिड में भी अपना DNA तथा राइबोसोम होते है |
प्लैस्टिड तीन प्रकार के होते हैं |
(I) क्रोमोप्लास्ट (रंगीन प्लैस्टिड) : इसमें क्लोरोफिल नहीं पाया जाता तथा यह प्रकाश संश्लेषण में भाग नहीं लेता है | इनका प्रमुख कार्य पौधे को सुन्दर बनाना है | यह मुख्यत: फलों एवं फूलों कि पंखुड़ियों में पाया जाता है |
(II) ल्यूकोप्लास्ट (श्वेत एवं रंगहीन प्लैस्टिड) : ल्यूकोप्लास्ट प्राथमिक रूप से अंगक है जिसमें स्टार्च, तेल तथा प्रोटीन जैसे पदार्थ संचित रहते हैं | यह पौधों के जड़ों एवं उन भागों में पाया जाता है जहाँ प्रकाश संश्लेषण कि क्रिया नहीं होती है, क्योंकि इसमें हरा वर्णक क्लोरोफिल नहीं पाया जाता है |
(III) क्लोरोप्लास्ट : जिस प्लैस्टिड में क्लोरोफिल वर्णक (pigment) होता है उसे क्लोरोप्लास्ट कहते है | क्लोरोप्लास्ट में क्लोरोफिल के अतिरिक्त विभिन्न पीले अथवा नारंगी रंग के वर्णक भी होते है | यह प्रकाश संश्लेषण के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है |
क्लोरोफिल : पौधे में पाए जाने वाले हरे वर्णक को क्लोरोफिल कहते हैं | जो प्रकाश संश्लेषण में भाग लेता है |
प्लैस्टिड का कार्य :
(i) प्लैस्टिड के विभिन्न प्रकारों के कारण ही पौधों के विभिन्न भागों में विभिन्न रंग होते है |
(ii) प्रकाश संश्लेषण की क्रिया हरे वर्णक प्लैस्टिड क्लोरोफिल कि उपस्थिति में होती है |
(iii) ल्यूकोप्लास्ट मंड (स्टार्च), चर्बी और प्रोटीन को संचित उत्पाद के रूप में संचय करता है |
रसधानियाँ (Vacuoles):
रसधानियाँ ठोस अथवा तरल पदार्थों कि संग्राहक थैलियाँ हैं | जंतु कोशिकाओं में रसधानियाँ छोटी होती हैं जबकि पादप कोशिकाओं में रासधानियाँ बहुत बड़ी होती है | कुछ पौधों कि कोशिकाओं कि केंद्रीय रसधानी की माप कोशिका के आयतन का 50% से 90 तक होता है |
पादप कोशिकाओं कि रसधानियाँ कोशिका द्रव्य से भरी रहती हैं जो कोशिकाओं को स्फीति एवं कठोरता प्रदान करती हैं |
रसधानियाँ (Vacuoles) के कार्य :
(i) ये कोशिकाओं को स्फीति एवं कठोरता प्रदान करती हैं |
(ii) पौधों के लिए आवश्यक पदार्थ जैसे अमीनो अम्ल, शर्करा, विभिन्न कार्बनिक अम्ल तथा प्रोटीन आदि रसधानियों में ही संचित रहता है |
(iii) कुछ एक कोशिकीय जीवों में विशिष्ट रसधानियाँ अतितिक्त जल एवं अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने में सहायता करता है |
Topic Lists Page Wise:
- 1. कोशिका का परिभाषा | कोशिका के प्रकार | कोशिका का कार्य
- 2. कोशिका के भाग | कोशिकांग | विसरण | परासरण | कोशिका विभाजन
- 3. जीवद्रव्य कुंचन | कोशिका भित्ति | उपापचयी क्रिया | सांद्रता के आधार पर विलयन का प्रकार
- 4. कोशिकांग (Cell Organelles) | माइटोकोंड्रिया का कार्य | माइटोकोंड्रिया का कार्य | प्लैस्टिड (Plastids)
- 5. Assignment