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Chapter Chapter 9. व्यावसायिक वित्त Class 12 Business Study CBSE notes in hindi पेज 4 - CBSE Study

Chapter Chapter 9. व्यावसायिक वित्त Business Study Class 12 cbse notes पेज 4 in hindi, all chapters and exercises are covered the ncert latest syllabus 2026 - 27.

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Chapter Chapter 9. व्यावसायिक वित्त Class 12 Business Study CBSE notes in hindi पेज 4 - CBSE Study

कक्षा 12 Business Study के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण Chapter 9. व्यावसायिक वित्त को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक पेज 4 को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन Business Study में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Class 12 English Medium Business Study All Chapters:

Chapter 9. व्यावसायिक वित्त

4. पेज 4

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पूंजी ढांचा :- पूंजी ढाचे से अभिप्राय दीर्घकालीन वित्त के विभिन्न स्त्रोतों के पारस्परिक अनुपात से है |

पूंजी संरचना को प्रभावित करने वाले कारक :-

(1) समता पूंजी की लागत : समता पूंजी की लागत ऋण पूंजी के प्रयोग से प्रभावित होती हैं | यही कोई कंपनी अधिक मात्रा में ऋण पूंजी का उपयोग करती है तो कंपनी को उतना ही अधिक समता पूंजी की लागत को वहन करना पड़ेगा | जिससें अंशों की बाज़ार कीमतों में विपरीत प्रभाव पड़ेगा | कंपनी को इस स्थिति से बचाना चाहिए | 

(2) रोकड़ प्रवाह स्थिति : पूंजी संरचना का चयन करते समय कंपनी का भावी रोकड़ प्रवाह भी ध्यान में रखना चाहिए | यदि कोई कंपनी ऋण पूंजी का उपयोग करना चाहती हैं तो उसे अपने रोकड़ प्रवाह को अवश्य ही जाँच लेना चाहिए क्योंकि ऋण पर ब्याज के साथ-साथ निश्चित समय के अंदर मूल राशि की भी वापसी करनी  होती हैं |

(3) ब्याज आवरण अनुपात : यह वह अनुपात है जो यह बतलाता हैं की ब्याज के भुगतान के लिए उपलब्ध राशि ब्याज की राशि से कितना अधिक हैं | यह अनुपात जितना अधिक होगा कंपनी उतना ही अधिक ऋण पूंजी का उपयोग का सकती हैं | यह निम्न प्रकार से ज्ञात किया जाता हैं ;

(4) निवेश पर आय : यदि किसी कंपनी की निवेश पर आय जितनी अधिक होगी कम्पनी उतना ही अधिक ऋण पूंजी का उपयोग का पाएगी | निवेश पर आय को ज्ञात करने का सूत्र ;

(5) ऋण की लागत : किसी कंपनी की ऋण लेने की क्षमता ऋण की लागत पर भी निर्भर करती हैं | यदि ऋण पूंजी पर ब्याज की दर कम हैं तो कंपनी ऋण का चयन का कर सकती है और इसकी विपरीत स्थिति में किसी अन्य विकल्प का चयन कर सकती हैं |

(6) कर की दर एक कंपनी के पूंजी ढाँचे को कर की दर भी प्रभावित करती है | यदि कर की दर अधिक होगी तो ऋण की लागत ही कम होगी | क्योकि ऋण पर ब्याज को कंपनी के खर्चे मान कर लाभ में से घटा दिया जाता है जिससें कर की बचत होती है |

(7) नियंत्रण : यदि कोई कंपनी अपनी कंपनी पर अधिक स्वामित्व नियंत्रण नहीं चाहती है तो उसे ऋण पूंजी पर निवेश करना चाहिए | और यदि कंपनी नियंत्रण की अनुमति के साथ अधिक मात्रा पूंजी की भी प्राप्ति करना चाहती हैं तो उसे समता अंशों में निवेश करना चाहिए |  

(8) स्टॉक बाज़ार की स्थिति : स्टॉक बाज़ार की स्थिति से अभिप्राय मंदीकाल व तेजीकाल से हैं | मंदी काल में अधिक जोखिम के डर से निवेशक प्रायः समता अंशों में निवेश करने से बचते हैं जबकि तेजी काल में निवेशक समता अंशों में अधिक निवेश करते हैं ताकि अनुकूल स्थिति का लाभ उठाया जा सकें |

(9) निर्गमन लागत : निर्गमन लागत से अभिप्राय उस लागत से है | जो प्रतिभूतियों को जारी करने में खर्च होती हैं | ऋण पूंजी की लागत समता अंश से कम होती हैं इसलिए निर्गमन लागत के परिपेक्ष में ऋण पूंजी का उपयोग करना बेहतर हैं |

वित्तीय ढांचा - इसका अभिप्राय चिट्ठे के दायित्व पक्ष की रचना से है अर्थात इसके अंतर्गत दीर्घकालीन व अल्पकालीन दोनों प्रकार की पूंजी स्त्रोतों को सम्मिलित किया जाता है |

पूंजीकरण - इसका अभिप्राय दीर्घकालीन पूंजी स्त्रोतों के योग से है अर्थात् यदि वित्तीय ढांचे में से अल्पकालीन पूंजी स्त्रोतों को कम कर दिया जाए तो शेष पूंजीकरण बचता है |

ऋणपूंजी व पूर्वाधिकार अंश पूंजी : समानता व असमानता

समानता

1. कम्पनी को ऋणपूंजी पर निश्चित दर से ब्याज तथा पूर्वाधिकार अंश पूंजी पर निश्चित दर से लाभांश का भुगतान करना पड़ता है | अतः यह दोनों पूंजी स्त्रोत स्थाई पूंजी लागत वाले है |

2. ये दोनों पूंजी स्त्रोत समता अंश पूंजी से सस्ते होते है |

असमानता

1. कम्पनी को ऋण पूंजी पर ब्याज का भुगतान करना होता है चाहे उसे लाभ हो अथवा हानि | लेकिन पूर्वाधिकार अंश पूंजी पर लाभांश का भुगतान केवल पर्याप्त  लाभ उपलब्ध होने की स्थिति में ही किया जाता है |

2. ऋण पूंजी पर ब्याज के भुगतान पर कर लाभ प्राप्त होता है | जबकि पूर्वाधिकार अंश पूंजी पर दी जाने वाले लाभांश से पहले ही कर की गणना हो चुकी होती है इसीलिए इस पर कर लाभ प्राप्त नही होता है |

स्थायी तथा कार्यशील पूंजी 

स्थायी पूंजी - स्थायी पूंजी का अभिप्राय ऐसी पूंजी से है जिसका प्रयोग स्थायी सम्पत्तिया (भूमि, भवन, मशीनरी, फर्नीचर आदि) क्रय करने के लिए किया जाता है |

स्थायी पूंजी की आवश्यकता को प्रभावित करने वाले घटक -

1. व्यवसाय की प्रकृति : एक निर्माणी उपक्रम को स्थाई सम्पन्त्तियो, संयंत्र, मशीनों आदि की आवश्यकता होती है | जबकि व्यापारिक उपक्रम को स्थाई सम्पतियो, संयंत्रो, मशीनों आदि की आवश्यकता नही होता है | अतः निर्माणी उपक्रम में स्थाई पूंजी की आवश्यकता अधिक होता है |

2. व्यवसाय का आकार : बड़े स्तर पर कार्य करने वाले संगठनो को छोटे स्तर पर कार्य करने वाले संगठनों के मुकाबले अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती है | क्योंकि उन्हें बड़े - बड़े मशीनों की आवश्यकता होती है |

3. तकनीक का विकल्प : पूंजी प्रधान तकनीक का प्रयोग करने वाले संगठनों को श्रम प्रधान तकनीक का प्रयोग करने वाले संगठनों से स्थाई पूनी की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि उन्हें बड़ी - बड़ी मशीने लेनी पड़ती है |

4. विकास प्रत्याशा : ऐसी संस्थाएं जिनके पास उच्च विकास योजना होती है उन्हें अधिक स्थाई पूँजी की आवश्यकता होती है, क्योंकि उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए नई मशीने आदि क्रय करने होते है |

5. विविधिकरण : यदि कोई कंपनी विविधिकरण प्रक्रिया को अपनाती है तो संयंत्रो व मशीनों के लिए उसे अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती है |

6. माध्यमो का चयन : उन संगठनों को, जो अपनी वस्तुए मध्यस्थों यानी की थोक एवं फूटकर व्यापारीयों द्वारा बेचते है, स्थाई पूंजी की आवश्यकता कम पड़ती है |

7. सहयोग का स्तर : यदि कुछ व्यवसाय संगठन आपस में मिलकर एक दुसरे के सूविधाओ की साझेदारी करने पर सहमत हो तो स्थायी पूंजी की कम मात्रा में आवश्यकता होगी | 

(i) व्यवसाय की प्रकृति : किसी व्यवसाय में स्थाई पूंजी की आवश्यक उस व्यवसाय की प्रकृति पर निर्भर करती है | प्रायः व्यवसाय दो प्रकार के होते हैं (a) निर्माण व्यवसाय और (b) व्यापारिक व्यवसाय | निर्माण व्यवसाय में अधिक मात्रा में स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि व्यापारिक व्यवसाय में कम स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं |

(ii) क्रियाओं का पैमान जिस व्यवसाय में जितना अधिक क्रियाओं का फैलाव होगा उस व्यवसाय में उतना ही अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होगी | जबकि छोटे व्यवसाय में कम स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं |

(iii) विविधिकरण : विविधिकरण से अभिप्राय एक से अधिक उत्पाद में व्यापार करना | जो संगठन विविधिकरण को अपनाती हैं उस व्यवसाय में अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जैसे - यदि एक कंपनी कपडे के व्यापार के साथ कागज का भी व्यवसाय करना चाहता हैं तो उसे विभिन्न साधनों (जैसे मशीन, भूमि व भवन आदि ) की आवश्यकता होगी हैं |

(iv) पद्धति का चयन : जो कंपनी आधुनिकता व स्वचालित मशीनों के द्वारा उत्पादन का कार्य करती हैं उन कंपनियों को अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि जो कंपनी मानवीय श्रम का अधिक उपयोग करती हैं उसे कम स्थाई पूंजी की आवश्यकता होगी |

(v) विकास सम्भावनाएँ : विकास की संभावना से व्यवसाय दो प्रकार के होते हैं | (i) वे व्यवसाय जिनके विकास की संभावना नहीं होती हैं इनके लिए स्थाई पूंजी की कम आवश्यकता होती हैं | जबकि वे व्यवसाय जिनकी विकास की संभावना अधिक होती हैं उन्हें अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं |

कार्यशील पूंजी - कार्यशील पूंजी से अभिप्राय उस पूंजी से हैं जो व्यवसाय की अल्पकालीन संपत्तियों में विनियोग की जाती हैं | जैसे - रोकड़ शेष, प्राप्ति बिल, देनदार और कच्चा माल आदि |

कार्यशील पूंजी की आवश्यकता को प्रभावित करने वाले घटक

(i) व्यवसाय की प्रकृति : कार्यशील पूंजी की आवश्यकता व्यवसाय की प्रकृति पर निर्भर करता हैं | निर्माणी व्यवसाय में अधिक कच्चे माल व अर्द्ध कच्चे माल और तैयार माल की आवश्यकता होती हैं इसलिए अधिक मात्रा में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि सेवा क्षेत्र में कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं |

(ii) कच्चे माल की उपलब्धता किसी कंपनी में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता कंपनी में कच्चे माल की उपलब्धता पर भी निर्भर करता हैं | यदि किसी कंपनी द्वारा ऐसे कच्चे माल का उपयोग करता है जो पुरे साल आसानी से उपलब्ध हो तो कंपनी को कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि यदि कंपनी के द्वारा आसानी से न उपलब्ध होने वाले कच्चे माल का उपयोग किया जाता हैं तो अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी |

(iii) व्यावसायिक चक्र : कार्यशील पूंजी की आवश्यकता व्यावसायिक चक्र पर निर्भर करती हैं | तेजी काल में मांग के बढ़ने पर अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि मंदी काल में बिक्री कम होने के कारण कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं |

(iv) उत्पादन चक्र : उत्पादन चक्र से अभिप्राय कच्चे माल को तैयार माल में परिवर्तित करने  में लिए गाए समय से हैं | जिस व्यवसाय का उत्पादन चक्र जितना अधिक होगा उस व्यवसाय में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता उतनी ही अधिक होगी | जबकि छोटी उत्पादन चक्र वाले व्यवसाय में कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी |

(v) उधार बिक्री : जो व्यवसाय अधिक उधार बिक्री करती हैं उसे अधिक मात्रा में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि जो व्यवसाय अधिक नकद बिक्री करती हैं उसे कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं |   

(vi) मौसमी घटक हर व्यवसाय द्वारा अलग-अलग वस्तुओं का उत्पादन किया जाता हैं जैसे कुछ व्यवसाय द्वारा पुरे साल मांग वाली वस्तुओं का उत्पादन किया जाता हैं तो उन्हें अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं तथा जो व्यवसाय द्वारा कुछ विशेष मौसम में मांग वाली वस्तुओं का उत्पादन करती हैं तो उन्हें कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं | 

 

 

         

     

   

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