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Chapter Chapter 7. समकालीन विश्व में सुरक्षा Class 12 Political Science-I CBSE notes in hindi सुरक्षा के पारंपरिक धारणा - CBSE Study

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Chapter Chapter 7. समकालीन विश्व में सुरक्षा Class 12 Political Science-I CBSE notes in hindi सुरक्षा के पारंपरिक धारणा - CBSE Study

कक्षा 12 Political Science-I के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण Chapter 7. समकालीन विश्व में सुरक्षा को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक सुरक्षा के पारंपरिक धारणा को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन Political Science-I में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Class 12 English Medium Political Science-I All Chapters:

Chapter 7. समकालीन विश्व में सुरक्षा

1. सुरक्षा के पारंपरिक धारणा

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सुरक्षा : अवधारणा और परम्परागत दृष्टिकोण

सुरक्षा का अर्थ

सुरक्षा का सामान्य अर्थ है किसी भी प्रकार के खतरे, हिंसा या असुरक्षा से मुक्ति। यह तभी महत्वपूर्ण मानी जाती है जब व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के मूलभूत मूल्य—जैसे स्वतंत्रता, संप्रभुता और जीवन का संरक्षण—खतरे में हों।

सुरक्षा की परंपरागत धारणाएँ

बाहरी सुरक्षा (External Security)

परंपरागत दृष्टिकोण में सुरक्षा मुख्यतः राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी होती है। इसमें सबसे बड़ा खतरा सैन्य आक्रमण माना जाता है, क्योंकि इससे देश की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता को प्रत्यक्ष खतरा होता है।

आंतरिक सुरक्षा (Internal Security)

आंतरिक सुरक्षा से आशय देश के भीतर उत्पन्न खतरों से है—जैसे सामाजिक संघर्ष, विद्रोह, कमज़ोर कानून-व्यवस्था या शासन के प्रति असंतोष। यह देश की आंतरिक शांति और कानून-व्यवस्था पर निर्भर करती है।

युद्ध की स्थिति में सरकार के विकल्प

  • आत्मसमर्पण — प्रत्यक्ष रूप से युद्ध समाप्त करने का सबसे निचला विकल्प।
  • समझौता/सहमति — प्रतिद्वंदी की शर्तें मान लेना या उसे रोकने के लिए इतना प्रतिकार दिखाना कि वह हमला टाल दे।
  • प्रतिरोध और पराजय — आक्रामक पक्ष से लड़ा जाए और उसे पराजित किया जाए।

अपरोध और रक्षा

अपरोध (Deterrence) का उद्देश्य युद्ध की संभावना को ही रोकना है—यानी हमलावर को इतना जोखिम महसूस कराना कि वह हमला न करे। रक्षा (Defence) का उद्देश्य है यदि संघर्ष हो जाए तो उसे सीमित कर के समाप्त करना।

परंपरागत सुरक्षा नीति के तत्व

शक्ति-संतुलन (Balance of Power)

देश अपनी रक्षा योग्य स्थिति बनाए रखने के लिए सैन्य, आर्थिक और तकनीकी ताकत बढ़ाते हैं तथा रणनीतिक फैसले लेते हैं।

गठबंधन (Alliances)

कई देश मिलकर ऐसे गठबंधन बनाते हैं जो हमलों को रोकने या सामूहिक रक्षा के लिए काम करते हैं। ये प्रायः औपचारिक संधियों पर आधारित होते हैं और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप समय के साथ बदल सकते हैं।

नव स्वतंत्र देशों के सामने चुनौतियाँ

विशेषकर एशिया और अफ्रीका के नव स्वतंत्र देशों को यूरोपीय देशों की तुलना में अलग प्रकार की चुनौतियाँ मिलीं:

  • पड़ोसी देशों से सैन्य हमले का डर
  • अंदरूनी विद्रोह और राजनीतिक अस्थिरता

युद्ध नीति — न्याय-युद्ध की परंपरा

  • युद्ध केवल आत्मरक्षा या मानवता की सुरक्षा (जैसे जनसंहार रोकना) के उद्देश्य से ही किया जाना चाहिए।
  • हथियारों और बल का प्रयोग सीमित होना चाहिए; निहत्थे या आत्मसमर्पण कर चुके व्यक्तियों को लक्षित नहीं करना चाहिए।
  • बल का प्रयोग उतना ही कितना आवश्यक हो—अनावश्यक हिंसा से बचना चाहिए।

शीतयुद्ध और तीसरी दुनिया में संघर्ष

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जो संघर्ष हुए उनमें से कई शीतयुद्ध की प्रतिद्वंद्विता के चलते हुए, विशेष रूप से तीसरी दुनिया के देशों में। इसमें उपनिवेशों के विघटन, गुटबंदी और बाहरी हस्तक्षेप शामिल थे।

निरस्त्रीकरण और अस्त्र-नियंत्रण

निरस्त्रीकरण का लक्ष्य खतरनाक हथियारों के निर्माण और भंडारण को रोकना है, जबकि अस्त्र-नियंत्रण में हथियारों के विकास और उपयोग पर नियम बनाये जाते हैं।

  • BWC (1972) — जैविक हथियारों पर प्रतिबंध।
  • CWC (1992) — रासायनिक हथियारों पर प्रतिबंध।
  • ABM (1972) — एंटी-बैलेस्टिक मिसाइलों पर सीमाएँ।
  • NPT (1968) — परमाणु अप्रसार संधि — 1967 तक परमाणु हथियार रख चुके देशों के लिए छूट, अन्य देशों के लिए रोक।

विश्वास बहाली के उपाय (Confidence-Building Measures)

देशों के बीच भरोसा बढ़ाने के लिए सैन्य जानकारी, योजना और तैनाती के बारे में पारदर्शिता बनाए रखी जाती है ताकि औचक हमले की आशंका घटे और गलतफहमियाँ कम हों।

अतिरिक्त वर्तमान और प्रासंगिक बिंदु

  • साइबर सुरक्षा — आधुनिक दौर में साइबर हमले राष्ट्रीय और व्यावसायिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। यह नेटवर्क, बुनियादी ढांचे और संवेदनशील जानकारियों को निशाना बनाते हैं।
  • मानव सुरक्षा (Human Security) — केवल सैन्य सुरक्षा नहीं, बल्कि भोजन, स्वास्थ्य, आवास और शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताएँ भी सुरक्षा की परिभाषा में आती हैं।
  • आर्थिक सुरक्षा — आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा-आपूर्ति में बाधा या आर्थिक दबाव भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं।
  • पर्यावरणीय सुरक्षा — जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएँ और संसाधन-संकट भी दीर्घकालिक सुरक्षा चुनौतियाँ पैदा करते हैं।

परीक्षा-प्रासंगिक (Important Points for Exams)

  • सुरक्षा का अर्थ — जीवन और मूल्यों की रक्षा।
  • बाहरी और आंतरिक सुरक्षा में अंतर स्पष्ट करें।
  • अपरोध और रक्षा के उद्देश्य व अंतरों को समझें।
  • NPT, BWC, CWC जैसे प्रमुख संधियों के उद्देश्यों का संक्षेप में ज्ञान रखें।
  • आधुनिक सुरक्षा में साइबर, मानव और पर्यावरणीय आयामों का उल्लेख करें।

नोट: यह लेख NCERT के विचारों पर आधारित है परंतु भाषा और प्रस्तुति पूरी तरह से परिवर्तित और विस्तारित की गयी है ताकि यह आपके स्वयं के स्वरूप का, उपयोगी और सुरक्षित  बने। धन्यवाद !! सीबीएसई स्टडी Updated On: 03-Oct-2025

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