Chapter Chapter 4. नियोजन Class 12 Business Study CBSE notes in hindi पेज 3 - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 12 English Medium Business Study All Chapters:
Chapter 4. नियोजन
3. पेज 3
नियोजन की सीमाएं -
1. नियोजन दृढ़ता उत्पन्न करता है - एक व्यवसाय के सभी कार्य नियोजन में निर्धारित विधि के अनुसार ही किए जाते हैं परन्तु बदलते वातावरण के अनुसार व्यवसाय को भी उद्येश्य प्राप्ति की क्रियाओं में भी बदलाव करना पड़ता हैं | जिसकें लिए नियोजन के कार्य को भी बदलने की आवश्यकता पड़ती हैं | परन्तु नियोजन कार्यों में दृढ़ता लता हैं जिसको शीघ्र बदलना संभव नहीं हैं |
2. नियोजन रचनात्मकता को कम करता है - क्योंकि नियोजन के अंतर्गत पूर्व निर्धारित मानकों के अनुसार ही कार्य किए जाते हैं | इससें व्यवसाय में प्रत्येक व्यक्ति पहले से निर्धारित स्पष्ट योजन के अनुसार ही कार्य करता हैं जिससें उनमें रचनात्मकता में कमी आती हैं |
3. नियोजन बदलते वातावरण में प्रभावी नहीं रहता - नियोजन भविष्य पर आधारित होता हैं क्योंकि भविष्य अनिश्चित व परिवर्तनशील होता है इसलिए नियोजन की क्रिया में बदलाव की आवश्यकता पड़ती हैं और इस कारण नियोजन बदलते हुए वातावरण में प्रभावी नहीं रहता हैं |
4. नियोजन खर्चीली प्रक्रिया है - नियोजन एक खर्चीली प्रक्रिया हैं क्योंकि नियोजन के अंतर्गत सर्वप्रथम कार्यों का निर्धारण किया जाता हैं फिर इन कार्यों को करने के लिए विकल्पों को विकसित करने के लिए सूचनाओं का एकत्रीकरण व विश्लेषण किया जाता हैं जो की एक खर्चीली प्रक्रिया हैं |
5. नियोजन समय नष्ट करने वाली प्रक्रिया है - नियोजन एक अति लम्बी व समय नष्ट करने वाली क्रिया हैं क्योंकि इसमें सबसे पहले उद्येश्य का निर्धारत, विकल्पों का विकास, बेहतर विकल्प का चयन और उसे लागू करना आदि यह सभी कार्य अधिक लम्बे व समय लेने वाले होते हैं |
6. नियोजन सफलता का आश्वासन नहीं है - नियोजन कार्य सफलता का आश्वासन नहीं देता है अतः यदि कोई व्यवसाय इस मान्यता पर नियोजन का कार्य करती हैं कि वह सफ़लता प्राप्त कर ही लेगी, तो यह निश्चित नहीं है क्योंकि नियोजन केवल कार्य करने का मार्ग प्रशस्त करता हैं | सफ़लता प्राप्ति के लिए कई बार नियोजन के विपरीत भी जाना पड़ सकता हैं |
नियोजन प्रक्रिया के चरण -
1. उद्देश्यों का निर्धारण - उद्येश्य एक अंतिम बिन्दु हैं जिसको प्राप्त करने लिए एक व्यवसाय में सभी कार्य किए जाते हैं | नियोजन उद्येश्य को परिभाषित कर कर्मचारियों की भागीदारी को सुनिश्चित करता हैं |
2. परिकल्पनाओं का विकास - नियोजन के दूसरे चरण में किसी कार्य को करने के लिए परिकल्पनाओं का विकास किया जाता हैं | जैसे - यदि कोई कंपनी अपने व्यवसाय का विस्तार करना चाहती है तो वह किसी अन्य कंपनी का क्रय का सकती हैं परन्तु इससें पहले उस कंपनी की बाज़ार में स्थिति ,देनदारी आदि की जानकारी का भी पता होना चाहिए | उसके अनुसार परिकल्पना का निर्माण करना चाहिए |
3. कार्यवाही की वैकल्पिक विधियों की पहचान - नियोजन की आगे की प्रक्रिया में किसी कार्य को करने के एक से अधिक विकल्पों की खोज की जाती हैं | जैसे- यदि एक कंपनी अपनी बिक्री को बढ़ाना चाहती हैं तो इसके कई विकल्प हैं जैसे (i) अपने मुख्य उत्पाद के साथ कुछ मुफ्त प्रदान करना (ii) अधिक विज्ञापन के द्वारा (iii) उत्पाद की कीमत में कमी करके |
4. विकल्पों का मूल्यांकन - नियोजन के चौथे चरण में विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन किया जाता हैं | सभी विकल्पों के गुण व दोष का पता लगाया जाता हैं | कई बार किसी दो विकल्पों के बीच विरोधाभाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं इस स्थिति में दोनों विकल्पों का मिश्रण एक नया विकल्प का निर्माण करता हैं |
5. विकल्पों का चुनाव - इस चरण में विभिन्न विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन किया जाता हैं | किसी विकल्प का चयन उसकें गुण व दोष के आधार पर किया जाता हैं | जो विकल्प किसी विशेष कार्य को करने के लिए अधिक गुणकारी होता हैं उसका चयन किया जाता हैं |
6. योजना को लागू करना - नियोजन के पांचवे चरण में निर्धारित विकल्प को इस चरण में लागू किया जाता हैं | जिसके बाद कार्यों का क्रम व कौन-सा कार्य किसके द्वारा किया जाना हैं यह निर्धारित किया जाता हैं |
7. समीक्षा करना - योजन/विकल्प के लागू किए जाने के बाद कार्य के दौरान इसकी समीक्षा की जाती हैं | समीक्षा से अभिप्राय कार्य के दौरान उसकी देख-परख करना हैं | समीक्षा किसी कार्य की प्रगति को मापने का कार्य करती हैं |