Chapter स्थलरूप एवं जीवन Class 6 Social Science CBSE notes in hindi मैदानी भाग और उसका निर्माण - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 6 English Medium Social Science All Chapters:
स्थलरूप एवं जीवन
3. मैदानी भाग और उसका निर्माण
अध्याय 3. स्थलरूप एवं जीवन
मैदान
- मैदान – विस्तृत, सपाट या हल्के तरंगित धरातल वाले स्थलरूप को मैदान कहते हैं।
- मैदानों में सामान्यतः ऊँची पहाड़ियाँ या गहरी घाटियाँ नहीं होती हैं।
- सामान्यतः मैदानों की ऊँचाई समुद्र तल से 300 मीटर से अधिक नहीं होती है।
- मैदान मानव निवास और कृषि के लिए सबसे अनुकूल स्थलरूपों में से एक हैं।
मैदानों का निर्माण
- अनेक मैदानों का निर्माण पर्वतों से निकलने वाली नदियों द्वारा किया जाता है।
- नदियाँ अपने साथ रेत, चट्टानों के छोटे कण और गाद बहाकर लाती हैं।
- नदियों द्वारा लाए गए इन पदार्थों के लंबे समय तक जमा होने से उपजाऊ मैदानों का निर्माण होता है।
तलछट
- तलछट – नदियों द्वारा बहाकर लाए गए रेत, चट्टानों के कण और गाद जैसे पदार्थों को तलछट कहते हैं।
- नदियाँ तलछट को मैदानी क्षेत्रों में जमा करती हैं।
- तलछट के जमाव के कारण मैदानी मिट्टी उपजाऊ बनती है।
मैदान और कृषि
- उपजाऊ मिट्टी के कारण मैदान कृषि के लिए अत्यंत अनुकूल होते हैं।
- मैदानी क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं।
- कृषि मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की प्रमुख आर्थिक गतिविधियों में से एक है।
- समतल भूमि के कारण सिंचाई और कृषि कार्य अपेक्षाकृत आसान होते हैं।
मैदानी जीवन
- मैदान मानव निवास के लिए अनुकूल होते हैं, इसलिए यहाँ बड़ी संख्या में लोग रहते हैं।
- प्राचीन काल की अनेक सभ्यताएँ नदियों के उपजाऊ मैदानों के आसपास विकसित हुई थीं।
- आज भी विश्व की बड़ी जनसंख्या मैदानी क्षेत्रों में निवास करती है।
- मैदान कृषि के साथ-साथ परिवहन और अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए भी अनुकूल होते हैं।
गंगा का मैदान
- गंगा का मैदान भारत का एक विशाल और उपजाऊ मैदानी क्षेत्र है।
- भारत की कुल जनसंख्या का एक बड़ा भाग गंगा के मैदान में निवास करता है।
- इस क्षेत्र में कृषि और मत्स्य पालन प्रमुख व्यवसाय हैं।
- गंगा और उसकी सहायक नदियाँ इस मैदान को जल और उपजाऊ तलछट प्रदान करती हैं।
गंगा के मैदान की प्रमुख फसलें
- खाद्य फसलें – चावल, गेहूँ, मक्का, जौ, ज्वार, बाजरा और रागी।
- रेशेदार फसलें – कपास, जूट और सन।
- पारंपरिक कृषि मुख्यतः वर्षा पर निर्भर रही है।
- नहरों और भूमिगत जल के उपयोग से सिंचाई की सुविधाओं में वृद्धि हुई है।
सिंचाई
- सिंचाई – फसलों को कृत्रिम साधनों द्वारा जल उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को सिंचाई कहते हैं।
- नहरें और भूमिगत जल सिंचाई के महत्वपूर्ण साधन हैं।
- सिंचाई की सहायता से कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है।
भूमिगत जल की समस्या
- कृषि के लिए भूमिगत जल का अधिक उपयोग किया जा रहा है।
- भूमिगत जल के अत्यधिक उपयोग से कई क्षेत्रों में जलस्तर नीचे जा रहा है।
- भूमिगत जल का संतुलित उपयोग भविष्य के लिए आवश्यक है।
मैदानी क्षेत्रों की चुनौतियाँ
- बढ़ती जनसंख्या मैदानी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव डालती है।
- भूमिगत जल का अत्यधिक उपयोग जलस्तर में गिरावट का कारण बन सकता है।
- प्रदूषण भी मैदानी क्षेत्रों की प्रमुख समस्याओं में से एक है।
नदियाँ और मानव जीवन
- नदियाँ मनुष्य को जल उपलब्ध कराती हैं और कृषि में सहायता करती हैं।
- नदियों के आसपास उपजाऊ मैदान विकसित होते हैं।
- नदियाँ मत्स्य पालन तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
- मैदानी क्षेत्रों में हल्की ढलान के कारण नदियों में नौका-संचालन अपेक्षाकृत आसान होता है।
नदियाँ और संस्कृति
- विश्व की अनेक नदियाँ केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।
- भारत में अनेक नदियों को पवित्र माना जाता है।
- नदियों के स्रोत और संगम स्थलों को कई समुदाय पवित्र मानते हैं।
- नदियों के पवित्र स्थलों पर त्योहार, समारोह और धार्मिक क्रियाएँ आयोजित की जाती हैं।
संगम स्थल
- संगम स्थल – दो या दो से अधिक नदियों के मिलने के स्थान को संगम स्थल कहते हैं।
- भारत में अनेक संगम स्थल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
मरुस्थल
- मरुस्थल – ऐसे विस्तृत और शुष्क क्षेत्र जहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
- मरुस्थलों में जल की उपलब्धता बहुत कम होती है।
- मरुस्थलों की वनस्पति और जीव-जंतु वहाँ की कठिन परिस्थितियों के अनुकूल होते हैं।
- मरुस्थल गर्म और ठंडे दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
गर्म मरुस्थल
- गर्म मरुस्थलों में तापमान बहुत अधिक हो सकता है और वर्षा बहुत कम होती है।
- सहारा – अफ्रीका का प्रसिद्ध गर्म मरुस्थल है।
- थार – भारत का प्रमुख गर्म मरुस्थल है।
ठंडे मरुस्थल
- ठंडे मरुस्थलों में तापमान बहुत कम रहता है और वर्षा भी कम होती है।
- गोबी – एशिया का प्रसिद्ध ठंडा मरुस्थल है।
- कुछ विशेषज्ञ अंटार्कटिका को भी बहुत कम वर्षण के कारण मरुस्थल मानते हैं।
मरुस्थलीय जीवन
- मरुस्थलों की कठिन परिस्थितियों के बावजूद मनुष्य ने वहाँ के पर्यावरण के अनुसार स्वयं को ढाल लिया है।
- मरुस्थलीय समुदाय उपलब्ध जल और प्राकृतिक संसाधनों का सावधानीपूर्वक उपयोग करते हैं।
- थार मरुस्थल के समुदायों की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएँ हैं।
- लोकगीत, किंवदंतियाँ और लोककथाएँ थार की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण भाग हैं।
प्राकृतिक दृश्यभूमि और मानव जीवन
- अलग-अलग प्राकृतिक दृश्यभूमियों में रहने वाले लोगों के जीवन और व्यवसाय अलग-अलग होते हैं।
- पर्वतीय क्षेत्रों में आखेट और संग्रह जैसी गतिविधियाँ देखने को मिल सकती हैं।
- घास के मैदानों में पशुपालन प्रमुख गतिविधि हो सकती है।
- उपजाऊ मैदानों में कृषि और तटीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन प्रमुख व्यवसाय हो सकते हैं।
टिनै
- प्राचीन तमिल संगम साहित्य में प्राकृतिक दृश्यभूमियों और उनसे जुड़े मानव जीवन का विस्तृत वर्णन मिलता है।
- इन दृश्यभूमियों को टिनै कहा गया है।
- टिनै में प्राकृतिक पर्यावरण के साथ वहाँ के लोगों के व्यवसाय और जीवन-पद्धति को भी जोड़ा गया है।
- पाँच प्रमुख टिनै – कुरिंजी, मुल्लई, मरुदम, नेयदल और पालै हैं।
पाँच टिनै
| टिनै |
दृश्यभूमि |
मुख्य व्यवसाय / जीवन |
| कुरिंजी |
पर्वतीय क्षेत्र |
आखेट और संग्रह करना |
| मुल्लई |
घास के मैदान और वन |
पशुपालन |
| मरुदम |
उपजाऊ कृषि के मैदान |
कृषि |
| नेयदल |
तटीय क्षेत्र |
मत्स्य पालन और समुद्री यात्रा |
| पालै |
शुष्क और मरुस्थल जैसा क्षेत्र |
घुमंतू और योद्धा |
मानव अनुकूलन
- अनुकूलन – पर्यावरण और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता को अनुकूलन कहते हैं।
- मनुष्य ने पर्वत, पठार, मैदान और मरुस्थल जैसी अलग-अलग स्थलाकृतियों के अनुसार जीवन के तरीके विकसित किए हैं।
- स्थलरूप के अनुसार लोगों के व्यवसाय, भोजन, आवास और जीवन-शैली में अंतर दिखाई देता है।
लचीलापन
- लचीलापन – चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करने तथा उनके अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता है।
- मनुष्य का लचीलापन उसे कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों में भी जीवन-यापन करने में सहायता करता है।
स्थलरूप और प्रमुख आर्थिक गतिविधियाँ
| स्थलरूप |
प्रमुख गतिविधियाँ |
| पर्वत |
पशुपालन, वेदिका कृषि और पर्यटन |
| पठार |
खनन और कृषि |
| मैदान |
कृषि, मत्स्य पालन और अन्य आर्थिक गतिविधियाँ |
| मरुस्थल |
स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार पशुपालन तथा अन्य गतिविधियाँ |
महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
| शब्द |
परिभाषा |
| मैदान |
विस्तृत, सपाट या हल्के तरंगित धरातल वाले स्थलरूप को मैदान कहते हैं। |
| तलछट |
रेत, चट्टानों के कण और गाद जैसे पदार्थ जो नदियों द्वारा बहाकर जमा किए जाते हैं। |
| सिंचाई |
फसलों को कृत्रिम साधनों द्वारा जल उपलब्ध कराने की प्रक्रिया। |
| संगम स्थल |
दो या दो से अधिक नदियों के मिलने का स्थान। |
| मरुस्थल |
विस्तृत और शुष्क क्षेत्र जहाँ बहुत कम वर्षा होती है। |
| टिनै |
प्राचीन तमिल साहित्य में प्राकृतिक दृश्यभूमि और उससे जुड़े मानव जीवन का वर्गीकरण। |
| अनुकूलन |
परिस्थितियों और पर्यावरण के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता। |
| लचीलापन |
चुनौतियों का सामना करने और उनके अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता। |
पर्वत, पठार और मैदान में अंतर
| आधार |
पर्वत |
पठार |
मैदान |
| धरातल |
ऊँचा और खड़ी ढलानों वाला |
ऊँचा और प्रायः चपटा |
सपाट या हल्का तरंगित |
| कृषि |
सीमित, वेदिका कृषि की जाती है |
कई क्षेत्रों में कम अनुकूल |
अत्यधिक अनुकूल |
| प्रमुख गतिविधि |
पशुपालन और पर्यटन |
खनन |
कृषि |
| जनसंख्या |
अपेक्षाकृत कम |
क्षेत्र के अनुसार भिन्न |
अधिक |
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- मैदान सामान्यतः समुद्र तल से 300 मीटर से अधिक ऊँचे नहीं होते हैं।
- नदियों द्वारा लाई गई तलछट मैदानों को उपजाऊ बनाती है।
- गंगा का मैदान भारत का प्रमुख उपजाऊ और घनी आबादी वाला क्षेत्र है।
- गंगा के मैदान में कृषि और मत्स्य पालन प्रमुख व्यवसाय हैं।
- सहारा और थार गर्म मरुस्थलों के उदाहरण हैं।
- गोबी ठंडे मरुस्थल का उदाहरण है।
- टिनै की पाँच दृश्यभूमियाँ – कुरिंजी, मुल्लई, मरुदम, नेयदल और पालै।
- कुरिंजी – पर्वतीय क्षेत्र।
- मुल्लई – घास के मैदान और वन।
- मरुदम – उपजाऊ कृषि के मैदान।
- नेयदल – तटीय क्षेत्र।
- पालै – शुष्क और मरुस्थल जैसा क्षेत्र।
त्वरित पुनरावृत्ति
- मैदान विस्तृत और लगभग सपाट स्थलरूप हैं।
- नदियाँ तलछट जमा करके उपजाऊ मैदानों का निर्माण करती हैं।
- उपजाऊ मिट्टी के कारण मैदान कृषि और मानव निवास के लिए अनुकूल होते हैं।
- नदियों का आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों प्रकार का महत्व है।
- मरुस्थलों में वर्षा बहुत कम होती है।
- मरुस्थल गर्म और ठंडे दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
- प्राचीन तमिल साहित्य में पाँच प्राकृतिक दृश्यभूमियों को टिनै कहा गया है।
- मनुष्य विभिन्न स्थलरूपों के अनुसार अपने जीवन और व्यवसाय को ढालता है।
- अनुकूलन और लचीलापन मनुष्य को कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों में जीवन-यापन करने में सहायता करते हैं।
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