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Chapter स्थलरूप एवं जीवन Class 6 Social Science CBSE notes in hindi मैदानी भाग और उसका निर्माण - CBSE Study

Chapter स्थलरूप एवं जीवन Social Science Class 6 cbse notes मैदानी भाग और उसका निर्माण in hindi, all chapters and exercises are covered the ncert latest syllabus 2026 - 27.

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Chapter स्थलरूप एवं जीवन Class 6 Social Science CBSE notes in hindi मैदानी भाग और उसका निर्माण - CBSE Study

कक्षा 6 Social Science के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण स्थलरूप एवं जीवन को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक मैदानी भाग और उसका निर्माण को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन Social Science में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Class 6 English Medium Social Science All Chapters:

स्थलरूप एवं जीवन

3. मैदानी भाग और उसका निर्माण

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अध्याय 3. स्थलरूप एवं जीवन

मैदान

  • मैदान – विस्तृत, सपाट या हल्के तरंगित धरातल वाले स्थलरूप को मैदान कहते हैं।
  • मैदानों में सामान्यतः ऊँची पहाड़ियाँ या गहरी घाटियाँ नहीं होती हैं।
  • सामान्यतः मैदानों की ऊँचाई समुद्र तल से 300 मीटर से अधिक नहीं होती है।
  • मैदान मानव निवास और कृषि के लिए सबसे अनुकूल स्थलरूपों में से एक हैं।

मैदानों का निर्माण

  • अनेक मैदानों का निर्माण पर्वतों से निकलने वाली नदियों द्वारा किया जाता है।
  • नदियाँ अपने साथ रेत, चट्टानों के छोटे कण और गाद बहाकर लाती हैं।
  • नदियों द्वारा लाए गए इन पदार्थों के लंबे समय तक जमा होने से उपजाऊ मैदानों का निर्माण होता है।

तलछट

  • तलछट – नदियों द्वारा बहाकर लाए गए रेत, चट्टानों के कण और गाद जैसे पदार्थों को तलछट कहते हैं।
  • नदियाँ तलछट को मैदानी क्षेत्रों में जमा करती हैं।
  • तलछट के जमाव के कारण मैदानी मिट्टी उपजाऊ बनती है।

मैदान और कृषि

  • उपजाऊ मिट्टी के कारण मैदान कृषि के लिए अत्यंत अनुकूल होते हैं।
  • मैदानी क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं।
  • कृषि मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की प्रमुख आर्थिक गतिविधियों में से एक है।
  • समतल भूमि के कारण सिंचाई और कृषि कार्य अपेक्षाकृत आसान होते हैं।

मैदानी जीवन

  • मैदान मानव निवास के लिए अनुकूल होते हैं, इसलिए यहाँ बड़ी संख्या में लोग रहते हैं।
  • प्राचीन काल की अनेक सभ्यताएँ नदियों के उपजाऊ मैदानों के आसपास विकसित हुई थीं।
  • आज भी विश्व की बड़ी जनसंख्या मैदानी क्षेत्रों में निवास करती है।
  • मैदान कृषि के साथ-साथ परिवहन और अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए भी अनुकूल होते हैं।

गंगा का मैदान

  • गंगा का मैदान भारत का एक विशाल और उपजाऊ मैदानी क्षेत्र है।
  • भारत की कुल जनसंख्या का एक बड़ा भाग गंगा के मैदान में निवास करता है।
  • इस क्षेत्र में कृषि और मत्स्य पालन प्रमुख व्यवसाय हैं।
  • गंगा और उसकी सहायक नदियाँ इस मैदान को जल और उपजाऊ तलछट प्रदान करती हैं।

गंगा के मैदान की प्रमुख फसलें

  • खाद्य फसलें – चावल, गेहूँ, मक्का, जौ, ज्वार, बाजरा और रागी।
  • रेशेदार फसलें – कपास, जूट और सन।
  • पारंपरिक कृषि मुख्यतः वर्षा पर निर्भर रही है।
  • नहरों और भूमिगत जल के उपयोग से सिंचाई की सुविधाओं में वृद्धि हुई है।

सिंचाई

  • सिंचाई – फसलों को कृत्रिम साधनों द्वारा जल उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को सिंचाई कहते हैं।
  • नहरें और भूमिगत जल सिंचाई के महत्वपूर्ण साधन हैं।
  • सिंचाई की सहायता से कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है।

भूमिगत जल की समस्या

  • कृषि के लिए भूमिगत जल का अधिक उपयोग किया जा रहा है।
  • भूमिगत जल के अत्यधिक उपयोग से कई क्षेत्रों में जलस्तर नीचे जा रहा है।
  • भूमिगत जल का संतुलित उपयोग भविष्य के लिए आवश्यक है।

मैदानी क्षेत्रों की चुनौतियाँ

  • बढ़ती जनसंख्या मैदानी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव डालती है।
  • भूमिगत जल का अत्यधिक उपयोग जलस्तर में गिरावट का कारण बन सकता है।
  • प्रदूषण भी मैदानी क्षेत्रों की प्रमुख समस्याओं में से एक है।

नदियाँ और मानव जीवन

  • नदियाँ मनुष्य को जल उपलब्ध कराती हैं और कृषि में सहायता करती हैं।
  • नदियों के आसपास उपजाऊ मैदान विकसित होते हैं।
  • नदियाँ मत्स्य पालन तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
  • मैदानी क्षेत्रों में हल्की ढलान के कारण नदियों में नौका-संचालन अपेक्षाकृत आसान होता है।

नदियाँ और संस्कृति

  • विश्व की अनेक नदियाँ केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।
  • भारत में अनेक नदियों को पवित्र माना जाता है।
  • नदियों के स्रोत और संगम स्थलों को कई समुदाय पवित्र मानते हैं।
  • नदियों के पवित्र स्थलों पर त्योहार, समारोह और धार्मिक क्रियाएँ आयोजित की जाती हैं।

संगम स्थल

  • संगम स्थल – दो या दो से अधिक नदियों के मिलने के स्थान को संगम स्थल कहते हैं।
  • भारत में अनेक संगम स्थल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

मरुस्थल

  • मरुस्थल – ऐसे विस्तृत और शुष्क क्षेत्र जहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
  • मरुस्थलों में जल की उपलब्धता बहुत कम होती है।
  • मरुस्थलों की वनस्पति और जीव-जंतु वहाँ की कठिन परिस्थितियों के अनुकूल होते हैं।
  • मरुस्थल गर्म और ठंडे दोनों प्रकार के हो सकते हैं।

गर्म मरुस्थल

  • गर्म मरुस्थलों में तापमान बहुत अधिक हो सकता है और वर्षा बहुत कम होती है।
  • सहारा – अफ्रीका का प्रसिद्ध गर्म मरुस्थल है।
  • थार – भारत का प्रमुख गर्म मरुस्थल है।

ठंडे मरुस्थल

  • ठंडे मरुस्थलों में तापमान बहुत कम रहता है और वर्षा भी कम होती है।
  • गोबी – एशिया का प्रसिद्ध ठंडा मरुस्थल है।
  • कुछ विशेषज्ञ अंटार्कटिका को भी बहुत कम वर्षण के कारण मरुस्थल मानते हैं।

मरुस्थलीय जीवन

  • मरुस्थलों की कठिन परिस्थितियों के बावजूद मनुष्य ने वहाँ के पर्यावरण के अनुसार स्वयं को ढाल लिया है।
  • मरुस्थलीय समुदाय उपलब्ध जल और प्राकृतिक संसाधनों का सावधानीपूर्वक उपयोग करते हैं।
  • थार मरुस्थल के समुदायों की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएँ हैं।
  • लोकगीत, किंवदंतियाँ और लोककथाएँ थार की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण भाग हैं।

प्राकृतिक दृश्यभूमि और मानव जीवन

  • अलग-अलग प्राकृतिक दृश्यभूमियों में रहने वाले लोगों के जीवन और व्यवसाय अलग-अलग होते हैं।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में आखेट और संग्रह जैसी गतिविधियाँ देखने को मिल सकती हैं।
  • घास के मैदानों में पशुपालन प्रमुख गतिविधि हो सकती है।
  • उपजाऊ मैदानों में कृषि और तटीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन प्रमुख व्यवसाय हो सकते हैं।

टिनै

  • प्राचीन तमिल संगम साहित्य में प्राकृतिक दृश्यभूमियों और उनसे जुड़े मानव जीवन का विस्तृत वर्णन मिलता है।
  • इन दृश्यभूमियों को टिनै कहा गया है।
  • टिनै में प्राकृतिक पर्यावरण के साथ वहाँ के लोगों के व्यवसाय और जीवन-पद्धति को भी जोड़ा गया है।
  • पाँच प्रमुख टिनै – कुरिंजी, मुल्लई, मरुदम, नेयदल और पालै हैं।

पाँच टिनै

टिनै दृश्यभूमि मुख्य व्यवसाय / जीवन
कुरिंजी पर्वतीय क्षेत्र आखेट और संग्रह करना
मुल्लई घास के मैदान और वन पशुपालन
मरुदम उपजाऊ कृषि के मैदान कृषि
नेयदल तटीय क्षेत्र मत्स्य पालन और समुद्री यात्रा
पालै शुष्क और मरुस्थल जैसा क्षेत्र घुमंतू और योद्धा

मानव अनुकूलन

  • अनुकूलन – पर्यावरण और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता को अनुकूलन कहते हैं।
  • मनुष्य ने पर्वत, पठार, मैदान और मरुस्थल जैसी अलग-अलग स्थलाकृतियों के अनुसार जीवन के तरीके विकसित किए हैं।
  • स्थलरूप के अनुसार लोगों के व्यवसाय, भोजन, आवास और जीवन-शैली में अंतर दिखाई देता है।

लचीलापन

  • लचीलापन – चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करने तथा उनके अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता है।
  • मनुष्य का लचीलापन उसे कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों में भी जीवन-यापन करने में सहायता करता है।

स्थलरूप और प्रमुख आर्थिक गतिविधियाँ

स्थलरूप प्रमुख गतिविधियाँ
पर्वत पशुपालन, वेदिका कृषि और पर्यटन
पठार खनन और कृषि
मैदान कृषि, मत्स्य पालन और अन्य आर्थिक गतिविधियाँ
मरुस्थल स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार पशुपालन तथा अन्य गतिविधियाँ

महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

शब्द परिभाषा
मैदान विस्तृत, सपाट या हल्के तरंगित धरातल वाले स्थलरूप को मैदान कहते हैं।
तलछट रेत, चट्टानों के कण और गाद जैसे पदार्थ जो नदियों द्वारा बहाकर जमा किए जाते हैं।
सिंचाई फसलों को कृत्रिम साधनों द्वारा जल उपलब्ध कराने की प्रक्रिया।
संगम स्थल दो या दो से अधिक नदियों के मिलने का स्थान।
मरुस्थल विस्तृत और शुष्क क्षेत्र जहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
टिनै प्राचीन तमिल साहित्य में प्राकृतिक दृश्यभूमि और उससे जुड़े मानव जीवन का वर्गीकरण।
अनुकूलन परिस्थितियों और पर्यावरण के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता।
लचीलापन चुनौतियों का सामना करने और उनके अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता।

पर्वत, पठार और मैदान में अंतर

आधार पर्वत पठार मैदान
धरातल ऊँचा और खड़ी ढलानों वाला ऊँचा और प्रायः चपटा सपाट या हल्का तरंगित
कृषि सीमित, वेदिका कृषि की जाती है कई क्षेत्रों में कम अनुकूल अत्यधिक अनुकूल
प्रमुख गतिविधि पशुपालन और पर्यटन खनन कृषि
जनसंख्या अपेक्षाकृत कम क्षेत्र के अनुसार भिन्न अधिक

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • मैदान सामान्यतः समुद्र तल से 300 मीटर से अधिक ऊँचे नहीं होते हैं।
  • नदियों द्वारा लाई गई तलछट मैदानों को उपजाऊ बनाती है।
  • गंगा का मैदान भारत का प्रमुख उपजाऊ और घनी आबादी वाला क्षेत्र है।
  • गंगा के मैदान में कृषि और मत्स्य पालन प्रमुख व्यवसाय हैं।
  • सहारा और थार गर्म मरुस्थलों के उदाहरण हैं।
  • गोबी ठंडे मरुस्थल का उदाहरण है।
  • टिनै की पाँच दृश्यभूमियाँ – कुरिंजी, मुल्लई, मरुदम, नेयदल और पालै।
  • कुरिंजी – पर्वतीय क्षेत्र।
  • मुल्लई – घास के मैदान और वन।
  • मरुदम – उपजाऊ कृषि के मैदान।
  • नेयदल – तटीय क्षेत्र।
  • पालै – शुष्क और मरुस्थल जैसा क्षेत्र।

त्वरित पुनरावृत्ति

  • मैदान विस्तृत और लगभग सपाट स्थलरूप हैं।
  • नदियाँ तलछट जमा करके उपजाऊ मैदानों का निर्माण करती हैं।
  • उपजाऊ मिट्टी के कारण मैदान कृषि और मानव निवास के लिए अनुकूल होते हैं।
  • नदियों का आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों प्रकार का महत्व है।
  • मरुस्थलों में वर्षा बहुत कम होती है।
  • मरुस्थल गर्म और ठंडे दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
  • प्राचीन तमिल साहित्य में पाँच प्राकृतिक दृश्यभूमियों को टिनै कहा गया है।
  • मनुष्य विभिन्न स्थलरूपों के अनुसार अपने जीवन और व्यवसाय को ढालता है।
  • अनुकूलन और लचीलापन मनुष्य को कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों में जीवन-यापन करने में सहायता करते हैं।
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