Chapter 13. विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव Class 10 Science CBSE notes in hindi वैद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electro Magnetic Induction) - CBSE Study
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CBSE NOTES:
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13. विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव
4. वैद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electro Magnetic Induction)
वैद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electro Magnetic Induction) :
वह प्रक्रम जिसके द्वारा किसी चालक के परिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र के कारण अन्य
चालक में विद्युत धारा प्रेरित होती है, वैद्युतचुंबकीय प्रेरण कहलाता है |
वैद्युतचुंबकीय प्रेरण की खोज माइकल फैराडे ने किया था |
फैराडे की इस खोज ने कि ‘किसी गतिशील चुंबक का उपयोग किस प्रकार विद्युत धारा उत्पन्न करने के लिए किया जा सकता है’ |

चुंबक को कुंडली की ओर ले जाने पर कुंडली के परिपथ में विद्युत धरा उत्पन्न होती है, जिसे गैल्वेनोमीटर की सुई के विक्षेप द्वारा इंगित किया जाता है। कुंडली के सापेक्ष चुंबक की गति एक प्रेरित विभवांतर उत्पन्न करती है, जिसके कारण परिपथ में प्रेरित विद्युत धारा प्रवाहित होती है।
गैल्वानोमीटर (Galvanometer) : गैल्वनोमीटर एक ऐसा उपकरण है जो किसी परिपथ में विद्युत
धारा की उपस्थिति संसूचित करता है।

यदि इससे प्रवाहित विद्युत धारा शून्य है तो इसका संकेतक शून्य पर रहता है। यह अपने शून्य चिन्ह के या तो बाई ओर अथवा दाईं ओर विक्षेपित हो सकता है, यह विक्षेप विद्युत धरा की दिशा पर निर्भर करता है।
किसी कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित करने के विभिन्न तरीके :
किसी कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित करने के दो तरीके हैं :
(i) कुन्डली को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में गति कराकर ।
(ii) कुन्डली के चारों ओर के चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन कराकर ।
कुन्डली को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में गति कराकर प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न करना अधिक सुविधाजनक हैं ।
फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम (Flemming's Right Hand Law):

इस नियम के अनुसार, अपने दाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा तथा अँगूठे को इस प्रकार फैलाइए कि ये तीनों एक-दूसरे के परस्पर लंबवत हों |यदि तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा और मध्यमा चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा की ओर संकेत करती है तो अँगूठा चालक की गति की दिशा अथवा चालक पर आरोपित बल की दिशा की ओर संकेत करेगा। इसी नियम को फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम कहते है |
विद्युत जनित्र (Electric Generator) :
विद्युत जनित्र का सिद्धांत : विद्युत जनित्र में यांत्रिक ऊर्जा का उपयोग चुंबकीय क्षेत्र में रखे किसी चालक को घूर्णी गति प्रदान करने में किया जाता है जिसके फलस्वरूप विद्युत धारा उत्पन्न होती है।

विद्युत जनित्र में एक घूर्णी आयताकार कुंडली ABCD होती है जिसे किसी स्थायी चुंबक के दो ध्रुवों के बीच रखा जाता है | इस कुंडली के दो सिरे दो वलयों R1 तथा R2 से संयोजित होते हैं। दो स्थिर चालक ब्रुशों B1 तथा B2 को पृथक-पृथक रूप से क्रमशः वलयों R1 तथा R2 पर दबाकर रखा जाता है। दोनों वलय R1 तथा R2 भीतर से धुरी होते हैं। चुंबकीय क्षेत्र के भीतर स्थित कुंडली को घूर्णन गति देने के लिए इसकी धुरी को यांत्रिक रूप से बाहर से घुमाया जा सकता है। स्थायी चुम्बक द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र में, गति करती है तो कुंडली चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को काटती है | जब कुंडली ABCD को दक्षिणावर्त घुमाया जाता है फ्लेमिंग के दक्षिण-हस्त नियम लागु करने पर इन भुजाओं में AB तथा CD दिशाओं के अनुदिश प्रेरित विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है |
प्रत्यावर्ती धारा (Alternate Current) : ऐसी विद्युत धरा जो समान काल-अंतरालों के पश्चात अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती है, उसे प्रत्यावर्ती धरा (A.C) कहते हैं। विद्युत उत्पन्न करने की इस युक्ति को प्रत्यावर्ती विद्युत धरा जनित्र (ac जनित्र) कहते हैं।
दिष्ट धारा (Direct Current) : ऐसी विद्युत धारा जिसका प्रवाह एक ही दिशा में होती है दिष्ट धारा (D.C) कहते है |

प्रत्यावर्ती धारा और दिष्टधारा में अंतर :
प्रत्यावर्ती धारा (a.c) :
(i) यह एक निश्चित समय के अंतराल पर अपनी दिशा बदलती रहती है।
(ii) इसे विद्युत जनित्र द्वारा उत्पन्न किया जाता है।
दिष्टधारा (d.c) :
(i) यह सदैव एक ही दिशा में प्रवाहित होती है।
(ii) इसे सेल या बैटरी द्वारा उत्पन्न किया जाता है।
दिष्टधारा (d.c) - सेल या बैटरी से उत्पन्न होता है |
प्रत्यावर्ती धारा (a.c) - विद्युत जनित्र
प्रत्यावर्ती धारा का लाभ : प्रत्यवर्ती धारा का लाभ यह है कि विद्युत शक्ति को सुदूर स्थानों तक बिना अधिक ऊर्जा क्षय के प्रेषित किया जा सकता है ।
भारत में प्रत्यावर्ती धारा की आवृति :
(i) भारत में प्रत्यावर्ती धारा की आवृति 50 हाटर्ज है |
(ii) भारत में उत्पादित प्रत्यावर्ती विद्युत धारा 1/100 s पश्चात् अपनी दिशा उत्क्रमित करती है |