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Chapter Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें Class 12 History Part-1 CBSE notes in hindi जैन धर्म और उसका विकास - CBSE Study

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Chapter Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें Class 12 History Part-1 CBSE notes in hindi जैन धर्म और उसका विकास - CBSE Study

कक्षा 12 History Part-1 के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक जैन धर्म और उसका विकास को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन History Part-1 में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Class 12 English Medium History Part-1 All Chapters:

Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें

3. जैन धर्म और उसका विकास

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तीर्थकर : जैन के मूल सिद्धांत वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे। जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, उन्हें तीर्थंकर कहा जाता है |

जैन साधू तथा साध्वियों द्वारा पालन किया जाने वाला व्रत : 

ये व्रत पांच थे - 

(i) हत्या न करना 

(ii) चोरी न करना 

(iii) झूठ न बोलना 

(iv) धन इक्कठा न करना 

(v) ब्रह्मचर्य का पालन करना 

जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधरणा : 

(i) अहिंसा : संपूर्ण विश्व प्राणवान है। यह माना जाता है कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है। जीवों के प्रति अहिंसा - खासकर इंसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना जैन दर्शन का केंद्र बिंदु है। वस्तुतः जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परम्परा को प्रभावित किया है।
(ii) संन्यास : जैन मान्यता के अनुसार जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है। कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या की जरूरत होती है। यह संसार के त्याग से ही संभव हो पाता है। इसीलिए
मुक्ति के लिए विहारों में निवास करना एक अनिवार्य नियम बन गया।

वर्धमान महावीर : महावीर अपने युग के एक महान चिंतक थे और वे जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर थे | वह एक क्षत्रिय राजकुमार थे | उनका सबंध वज्जि संघ के लिच्छवी कुल से था | 30 वर्ष की आयु में वे घर-बार छोड़कर जंगल में रहने लगे | जहाँ उन्हें 13 वर्ष तपस्या के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ |

जैन धर्म की शिक्षाएँ : 

(i) जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा यह है कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है। जीवों के प्रति अहिंसा - खासकर इंसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को नही मारना चाहिए |

(ii)  जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है। कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या की जरूरत होती है। यह संसार के त्याग से ही संभव हो पाता है।

(iii) मुक्ति के लिए संसार को त्यागकर विहारों में निवास करना चाहिए |

(iv) इसके साथ इन पांच व्रतों का पालन करना चाहिए - जैसे हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, धन इक्कठा न करना और ब्रह्मचर्य का पालन करना आदि | 

 

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