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Chapter Chapter 3. निजी, सार्वजनिक एवं भूमंडलीय उपक्रम Class 11 Business Study CBSE notes in hindi सार्वजानिक क्षेत्र /उपक्रम - CBSE Study

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Chapter Chapter 3. निजी, सार्वजनिक एवं भूमंडलीय उपक्रम Class 11 Business Study CBSE notes in hindi सार्वजानिक क्षेत्र /उपक्रम - CBSE Study

कक्षा 11 Business Study के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण Chapter 3. निजी, सार्वजनिक एवं भूमंडलीय उपक्रम को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक सार्वजानिक क्षेत्र /उपक्रम को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन Business Study में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Class 11 English Medium Business Study All Chapters:

Chapter 3. निजी, सार्वजनिक एवं भूमंडलीय उपक्रम

2. सार्वजानिक क्षेत्र /उपक्रम

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सार्वजानिक क्षेत्र /उपक्रम :


   

परिभाषा : सार्वजनिक अथवा राजकीय उपक्रमों का अभिप्राय ऐसे उपक्रमों से है  जो सरकार द्वारा स्थापित किये जाते हैं और जिनका स्वामित्व व प्रबंध भी सरकार के हाथों में होता है अत : केवल उन सरकारी संस्थाओं को ही सार्वजनिक उपक्रम कहा जाता है जो आर्थिक अथवा व्यवसायिक क्रियाएँ करती है | 

सार्वजनिक उपक्रमों की विशेषताएँ :

(1) राजकीय स्वामित्व : सार्वजनिक उपक्रमों का स्वामित्व या तो पूर्णतया केन्द्रीय, राज्य या स्थानीय सरकार के पास होता हैं इसमें सरकार की अंशपूंजी का लगभग 51 प्रतिशत भाग होना आवश्यक हैं |  

(2) राजकीय नियंत्रण : सार्वजनिक उपक्रमों का प्रबंध एवंम नियंत्रण सरकार के हाथो में होता हैं कुछ उपक्रमों की स्थापना सरकार अपने ही विभागों के अन्तरगत करती है जैसे डाक-तार सेवा |

(3) वित्तीय स्वतंत्रता : सार्वजनिक उपक्रमों की लगभग सभी वित्तीय आवश्यकताएँ सरकार द्वारा पूंजी विनियोग के माध्यम से पूरी की जाती है |

(4) सेवा उद्देश्य : राजकीय उपक्रमों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य समाज को सेवाएँ प्रदान करना होता है |

(5) जनता के प्रति उत्तरदेयता : राजकीय उपक्रम न केवल सरकार, बल्कि जनता के प्रति भी उत्तरदायी होता है |

(6) सभी वर्गों के लिए उपयोगी : सार्वजनिक उपक्रम समाज के किसी एक वर्ग की ही सेवा नही करते बल्कि ये सबके लिए उपयोगी है |

सार्वजनिक उपक्रम के प्रारूप-

(A) विभागीय उपक्रम : सार्वजनिक उपक्रमों को संचालित करने का यह सबसे अधिक प्रचलित स्वरुप है यह सरकारी स्वामित्व के नियंत्रण में होता है इनका प्रबंध मंत्रालय द्वारा किया जाता है यह उपक्रमों के वर्ष भर कार्य कलापों, प्रगति अन्य सम्बंधित मामलो की रिपोर्ट तैयार करके संसद में प्रस्तुत की जाती है ये संसद के प्रति जवाबदेह होते है इसके अंतर्गत भारतीय डाक तार विभाग आदि समिलित है |

विशेषताएँ -

(1) स्थापना : इनकी स्थापना एक सरकारी विभाग के रूप में सरकार द्वारा की जाती है |

(2) स्वामित्व : इन उपक्रमों पर पूर्ण सरकारी स्वामित्व होता है |

(3) प्रबंध : इनका प्रबंध मंत्रालय द्वारा किया जाता है विभागीय सचिव इनका मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है |

(4) पृथक अस्तित्व नही : इन उपक्रमों कर पृथक अस्तित्व नही होता यह न तो सरकार की अनुमति के बिना किसी पर मुकदमा नही कर सकता और न ही इन पर मुकदमा किया जा सकता है |

लाभ-

(1) सरल स्थापना : इन उपक्रमों की स्थापना बहुत सरल है क्योकि इनको पंजीकरण करवाने की आवश्कता नही होती |

(2) कार भार में कमी : सरकार अपने व्ययों को पूरा करने के लिए जनता पर कर लगाती है जब विभागीय उपक्रमों से आय होने लगती है एसी स्थिति में सरकार आम जनता के कर भार में कमी करती है |

(3) सरल वित व्यवस्था : क्योकि वित व्यवस्था सरकार द्वारा की जाती है इसलिए वित व्यवस्था करना बहुत सरल है :

(4) फंडो का उचित उपयोग : इन उपक्रमों की सभी गतिविधिया सरकारी अनुमति से की जाती है इसलिए इनमे फंडो के दुरूपयोग का प्रश्न ही नही उठता |

सीमाएँ -

(1) शीघ्र कार्यवाही की कमी : केन्द्रीय नियंत्रण व्यवस्था तथा अत्यधिक औपचारिकताओं के कारण प्राय: निर्णय लेने में देरी होती हैं यही कारण हैं की अनेक लाभ के अवसर हाथ से निकल जाते हैं | 

(2) लोचशीलता की कमी : कठोर सरकारी नियमो के कारण लोचशीलता में कमी रहती हैं जबकि एक सफल उपक्रम के लिय लोचशीलता आवश्यक हैं |

(3) कर भार में वृद्धि : भारी हानि की दशा में विभागीय उपक्रमों की हानियों का बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता हैं इसकी भरपायी के लिय सरकार जनता पर अधिक कर लगाती हैं |

(4) अधिक राजनितिक हस्तक्षेप : इसमें मंत्रालय के माध्यम से राजनितिक हस्तक्षेप अधिक होता हैं |

(B) वैधानिक उपक्रम - वैधानिक उपक्रम वे सार्वनिक उधम हैं जिनकी स्थापना संसद के विशेष अधिनियम के द्वारा की जाती हैं यह निगमित संगठन जिसकी स्थापना विधान मंडल द्वारा की जाती हैं तथा यह निर्धारित क्षेत्र पर इनका स्पष्ट नियंत्रण होता हैं यह वित्त मामलों में स्वतंत्र होते हैं और इनमे निजी उधमों के समान परिचालन में पर्याप्त लचीलापन होता हैं |

विशेषताएँ -

(1) स्थापना : इनकी स्थापना संसद द्वारा पारित अधिनियम द्वारा होती हैं इन्ही प्रावधानों के अनुसार इनका संचालन किया जाता हैं |

(2) स्वामित्व : ये पूरी तरह से सरकार के स्वामित्व में होती हैं इनमें लाभ तथा हानि का वहन सरकार ही करती हैं और वित्त के सम्बन्ध में अंतिम उतरदायित्व सरकार का ही होता हैं |

(3) प्रबंध : निगमों का प्रबंध सरकार द्वारा मनोनीत संचालको द्वारा किया जाता हैं |

(4) पृथक वैधानिक अस्तित्व : इनका पृथक वैधानिक अस्तित्व होता हैं अर्थात् यह अपने नाम से सम्पति खरीद सकते हैं और मुकदमा कर सकते हैं आदि |

लाभ -

(1) संचालन में स्वतंत्रता : सार्वजनिक निगमों के संचालन में किसी तरह का सरकारी हस्तक्षेप नहीं होता |

(2) शीघ्र निर्णय : अनावश्यक औपचारिकताओं एवंम लाल फीताशाही न होने के कारण निर्णय शीघ्र लिय जाते हैं |  

(3) समाज सेवा उद्देश्य : समाज सेवा निगमों का मुख्य एवंम लाभ गौण उद्देश्य होता हैं |

(4) समाज के हितों की सुरक्षा : यह संसद के प्रति जवाबदेह होते हैं जवाबदेह से बचने के लिय निगम जनता के धन का अधिकतम सदुपयोग करते हैं परिणामत : समाज के हित सुरक्षित रहते हैं |

सीमायें -

(1) अपूर्ण संचालन स्वतंत्रता : इनमें पूरा सरकारी हस्तक्षेप होता हैं परिणामस्वरूप ये स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय नहीं ले सकते |

(2) प्रतियोगी भावना का आभाव : इनका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता इसलिए ये अपनी गतिविधियों में लापरवाही करते हैं इससे हनी की सम्भावना बनी रहती हैं |

(3) सेवा उद्देश्य को अनदेखा करना : संचालन मंडल के सदस्य अपनी शक्तियों का उपयोग सामाजिक हित में कम और व्यक्तिगत हित में आधिक करते हैं अत : इनका सेवा उद्देश्य मात्र एक दिखावा हैं |

उपयोगिता -

(1) जहाँ आधिक मात्र में पूंजी की आवश्यकता हो |

(2) जहाँ सार्वजनिक हित सर्वोपरि हो |

(C) सरकारी कंपनी - यह एक ऐसी कम्पनी हैं जिसकी चुकता अंश पूंजी का कम से कम 51 प्रतिशत भाग केन्द्रीय या राज्य सरकारों के पास होता हैं तथा इसका पंजीकरण भारतीय कम्पनी अधिनियम ,1956 के अंतर्गत होता हैं |

यह दो प्रकार की होती हैं (1) पूर्ण स्वामित्व वाली  (2) मिश्रित स्वामित्व वाली |

(1) पूर्ण स्वामित्व वाली : सरकारी कंपनियां , जिनकी सम्पूर्ण अंशपूंजी सरकार के पास होती हैं | 

(2) मिश्रित स्वामित्व वाली : सरकारी कंपनियां ,जिनकी अंशपूंजी में सरकार व जनता दोनों भागीदार होते हैं ,परन्तु अधिकांश पूंजी सरकार द्वारा प्रदान की जाती हैं | 

विशेषताएं -

(1) स्थापना : इनकी स्थापना भारतीय कंपनी अधिनियम ,1956 के प्रावधानों के अनुसार होती हैं यदि सरकार चाहे तो इन प्रावधानों के सम्बन्ध में छुट दे सकती है लेकिन यह छुट संसद द्वारा अधिकृत होनी चाहिये |

(2) स्वामित्व : इनकी चुकता अंशपूंजी का कम से कम 51% भाग केन्द्रीय/राज्य सरकार के पास होती है |

(3) प्रबंध : इनका प्रबंध संचालक मंडल द्वारा किया जाता है |

(4) वित्त व्यवस्था : ये कंपनियां सरकार व जनता दोनों से वित्त प्राप्त कर सकती है |

लाभ:-

(1) सरल स्थापना : इनकी स्थापना के लिए विशेष अधिनियम को पास करने की आवश्यक नही है कंपनी अधिनियम के प्रावधानों का पालन करने पर ही इनका पंजीकरण हो सकता है |

(2) शीघ्र निर्णय : अनावश्यक औपचारिकताओं एवं लालफीताशाही न होने के कारण निर्णय शीघ्र लिए जाते है 

(3) लोचशीलता : आवश्कता पड़ने पर ये अपने नियमो में तुरंत बिना किसी कठिनाई के परिवर्तन कर सकते है |

(4) संचालन में स्वतंत्रता : सरकारी हस्तक्षेप न होने के कारण सरकारी कंपनिया अपनी गतिविधियों का संचालन स्वतंत्रतापूर्वक कर सकती है 

सीमाएँ :-

(1) अपूर्ण संचालन स्वतंत्रता : सरकारी कंपनियों के संचालक मंडल में अधिकांश संचालक सरकार द्वारा मनोनीत किये जाते है | ये लोग विभिन्न सरकारी मंत्रालयों से लिए जाते है | विभिन्न मंत्रालय अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से कंपनी के संचालन में हस्तक्षेप करते है की उन्हें पूर्ण संचालन स्वतंत्रता नही होती |

(2)नीतियों में स्थायित्व नही : हर नया व्यक्ति अपने अनुसार कंपनी को चलाना चाहता हैं इस प्रकार बार- बार नीतियों में परिवर्तन से कंपनी के उद्देश्य को पूरा नहीं किया जा सकता | 

(3) पेशेवर कुशलता की कमी : कुशलता प्राय: सरकार द्वारा मन्नोनित संचालको में नही होती|कंपनी एक व्यवसायिक उपकर्म के स्थान पर सरकारी विभाग बन कर रह जाता है| 

4) सार्वजानिक जवाबदेही का डर: सरकारी कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट को संसद में प्रसतुत किया जाता है | संसद में आलोचना के डर से उच्च प्रबंधक जोखिम वाले निर्णय नही लेते | जबकि व्यवसाय को सफलतापूर्वक चलाने के लिए ऐसा करना जरूरी होता है| ये  कंपनिया व्यवसायिक दृष्टिकोण से पिछाड़ी जाती है|

उपयोगिता-

(1) जहाँ सरकार के साथ-साथ निजी भागीदारी भी आवश्यक हो |

(2) जहाँ आर्थिक गतिविधियों को बढावा देना हो: जैसे भारतीय राजकीय व्यापार निगम की स्थापना |

(3) जहाँ विभिन्न पक्षकारो का हित खतरे में हो: जैसे सरकार ने क्रमचारियों, विक्रेताओ व जनता के हित मे स्वदेशी कॉटन मिल्ज के अधिकांश अंश क्रय कर लिए थे |

(4) जहाँ सरकार की इच्छा एक नए उपक्रम करके निजी क्षेत्र में हस्तांतरित करने की हो|

 

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