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वायुमंडल और जलवायु Class 9 Social Science [LATEST] Solutions Chapter Review (अध्याय-समीक्षा) in hindi - CBSE Study

वायुमंडल और जलवायु Social Science Class 9 exercise - [LATEST] Solutions Chapter Review (अध्याय-समीक्षा) cbse board school study materials like cbse notes in 1 medium, all chapters and exercises are covered the ncert latest syllabus 2026 - 27.

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वायुमंडल और जलवायु Class 9 Social Science [LATEST] Solutions Chapter Review (अध्याय-समीक्षा) in hindi - CBSE Study

NCERT Solutions for Class 9 Social Science are carefully prepared according to the latest CBSE syllabus and NCERT textbooks to help students understand every concept clearly. These solutions cover all important वायुमंडल और जलवायु with detailed explanations and step-by-step answers for better exam preparation. Each Chapter Review (अध्याय-समीक्षा) is explained in simple language so that students can easily grasp the fundamentals and improve their academic performance. The study material is designed to support daily homework, revision practice, and final exam preparation for Class 9 students. With accurate answers, concept clarity, and structured content, these NCERT solutions help learners build confidence and score higher marks in their examinations. Whether you are revising a specific topic or preparing an entire chapter, this resource provides reliable and syllabus-based guidance for complete success in Social Science.

Class 9 English Medium Social Science All Chapters:

वायुमंडल और जलवायु

1. Chapter Review (अध्याय-समीक्षा)

अध्याय 3. वायुमंडल और जलवायु

अध्याय समीक्षा

वायुमंडल का परिचय: पृथ्वी को चारों ओर से घेरने वाले वायु के आवरण को वायुमंडल कहते हैं। यह विभिन्न गैसों का मिश्रण है और पृथ्वी पर सभी जीवों के अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण वायुमंडल को पृथ्वी के चारों ओर बनाए रखता है। वायुमंडल सूर्य से आने वाले हानिकारक विकिरण, जिसमें पराबैंगनी विकिरण भी शामिल है, से पृथ्वी की रक्षा करता है। यह सूर्य की कुछ ऊर्जा को रोककर पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में भी सहायता करता है। वायुमंडल पृथ्वी के मौसम और जलवायु तंत्र का एक महत्वपूर्ण घटक है।

वायुमंडल की संरचना: वायुमंडल विभिन्न गैसों से मिलकर बना है। इसमें नाइट्रोजन और ऑक्सीजन सबसे अधिक मात्रा में पाई जाने वाली गैसें हैं। इनके अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन, हीलियम, निऑन, क्रिप्टॉन, जेनॉन, ओजोन और हाइड्रोजन जैसी गैसें कम मात्रा में उपस्थित होती हैं। वायुमंडल में जलवाष्प तथा सूक्ष्म धूल के कण भी पाए जाते हैं। जलवाष्प की मात्रा सामान्यतः 0.1% से 0.4% तक होती है और यह बादलों के निर्माण तथा वर्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऊँचाई के साथ वायुमंडल की संरचना में भी परिवर्तन हो सकता है।

वायुमंडल में गैसों का प्रतिशत:

  • नाइट्रोजन: 78%
  • ऑक्सीजन: 21%
  • आर्गन: 0.93%
  • कार्बन डाइऑक्साइड: 0.04%
  • अन्य गैसें: 0.03%

वायुमंडल की परतें: वायुमंडल की एक परतदार संरचना है। इन परतों का निर्धारण ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान और वायु के घनत्व में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर किया जाता है। पृथ्वी की सतह के निकट वायु का घनत्व सबसे अधिक होता है और ऊँचाई बढ़ने के साथ यह घटता जाता है। वायुमंडल की पाँच प्रमुख परतें हैं—क्षोभमंडल, समतापमंडल, मध्यमंडल, तापमंडल और बहिर्मंडल।

1. क्षोभमंडल: क्षोभमंडल वायुमंडल की सबसे निचली तथा महत्वपूर्ण परत है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 12 किलोमीटर है। इस परत में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता जाता है। हम जिस वायु में साँस लेते हैं, उसका अधिकांश भाग इसी परत में पाया जाता है। अधिकांश जलवाष्प और बादल भी इसी परत में उपस्थित होते हैं। वर्षा, कोहरा और ओले जैसी लगभग सभी मौसम संबंधी घटनाएँ इसी परत में होती हैं। क्षोभमंडल और समतापमंडल के बीच की संक्रमण सीमा को क्षोभसीमा (Tropopause) कहा जाता है।

2. समतापमंडल: समतापमंडल क्षोभमंडल के ऊपर स्थित है और लगभग 50 किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला हुआ है। यह परत बादलों और अन्य मौसम संबंधी अशांतियों से अपेक्षाकृत मुक्त होती है, इसलिए विमान उड़ाने के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इस परत की एक महत्वपूर्ण विशेषता ओजोन परत है। ओजोन सूर्य से आने वाले हानिकारक विकिरण, विशेष रूप से पराबैंगनी विकिरण, को अवशोषित करके पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है। समतापमंडल और मध्यमंडल के बीच की सीमा को समतापसीमा (Stratopause) कहा जाता है।

3. मध्यमंडल: मध्यमंडल समतापमंडल के ऊपर स्थित तीसरी प्रमुख परत है और लगभग 80 किलोमीटर की ऊँचाई तक फैली है। इस परत में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता जाता है। अंतरिक्ष से पृथ्वी की ओर आने वाले अधिकांश उल्कापिंड इसी परत में जलकर नष्ट हो जाते हैं।

4. तापमंडल: तापमंडल लगभग 80 से 700 किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला हुआ है। इस परत में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान बहुत तेजी से बढ़ता है। यहाँ गैस के अणु सूर्य से आने वाली एक्स-किरणों और छोटी तरंगदैर्ध्य वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करते हैं। तापमंडल का एक भाग आयनमंडल (Ionosphere) कहलाता है। यह रेडियो तरंगों के संचार में सहायता करता है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के निकट दिखाई देने वाली रंगीन प्रकाशीय घटनाएँ, जिन्हें ऑरोरा कहा जाता है, भी तापमंडल में होती हैं। उत्तरी गोलार्ध में इसे ऑरोरा बोरेलिस और दक्षिणी गोलार्ध में ऑरोरा ऑस्ट्रेलिस कहा जाता है।

5. बहिर्मंडल: बहिर्मंडल वायुमंडल की सबसे ऊपरी परत है। यहाँ वायु अत्यंत विरल होती है। कमजोर गुरुत्वाकर्षण के कारण हीलियम और हाइड्रोजन जैसी हल्की गैसें इस परत से अंतरिक्ष की ओर चली जाती हैं।

वायुमंडलीय दाब का अनुभव क्यों नहीं होता: वायु हमारे शरीर पर चारों ओर से दाब डालती है। हमारे शरीर के अंदर का दाब भी बाहरी वायुमंडलीय दाब के बराबर होता है। इसलिए शरीर के अंदर और बाहर के दाब एक-दूसरे को संतुलित कर देते हैं और हमें वायुमंडलीय दाब का अनुभव नहीं होता।

मौसम और जलवायु: किसी स्थान की घंटे-घंटे या दिन-प्रतिदिन की वायुमंडलीय दशाओं को मौसम कहते हैं। मौसम में बहुत कम समय में भी परिवर्तन हो सकता है। इसके विपरीत किसी बड़े क्षेत्र की लंबे समय की औसत मौसम दशाओं तथा उनमें होने वाले परिवर्तनों को जलवायु कहते हैं। जलवायु का अध्ययन सामान्यतः 30 वर्ष या उससे अधिक की अवधि के आधार पर किया जाता है।

मौसम और जलवायु के प्रमुख तत्व: तापमान, वर्षण, आर्द्रता, पवन और वायुमंडलीय दाब मौसम तथा जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व हैं।

तापमान: वायुमंडल का तापमान दिन और रात तथा विभिन्न ऋतुओं में बदलता रहता है। तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक सूर्यातप (Insolation) है। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर सूर्यातप की मात्रा घटती जाती है। इसलिए सामान्यतः भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर तापमान भी घटता जाता है।

आर्द्रता: भूमि और विभिन्न जल स्रोतों से पानी वाष्पित होकर जलवाष्प में बदलता है। वायु में जलवाष्प की उपस्थिति को आर्द्रता कहा जाता है। गर्म वायु अधिक जलवाष्प धारण कर सकती है। अधिक आर्द्रता वाले दिनों में कपड़े देर से सूखते हैं और पसीना धीरे-धीरे वाष्पित होता है, जिससे अधिक असुविधा महसूस होती है।

वर्षण: जब वायुमंडल का कोई भाग जलवाष्प से संतृप्त हो जाता है और जलवाष्प संघनित होकर गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी पर गिरती है, तो इसे वर्षण कहते हैं। वर्षण में बूंदाबांदी, वर्षा, हिमपात, ओले तथा अन्य रूप शामिल हो सकते हैं। वर्षण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में प्रचलित पवनें, पर्वत और ऋतुएँ शामिल हैं। जब वर्षण तरल रूप में पृथ्वी पर गिरता है तो उसे वर्षा कहते हैं। लंबे समय तक वर्षा न होने से शुष्क जलवायु उत्पन्न हो सकती है और वर्षा जल भूजल के पुनर्भरण का प्रमुख स्रोत है।

वायुमंडलीय दाब: पृथ्वी की सतह पर वायु के भार द्वारा लगाए गए दबाव को वायुमंडलीय दाब कहते हैं। ऊँचाई बढ़ने के साथ वायुमंडलीय दाब तेजी से घटता है। समुद्र तल पर दाब सबसे अधिक होता है। किसी स्थान पर वायु का तापमान भी वायुदाब के वितरण को प्रभावित करता है। गर्म वायु फैलकर ऊपर उठती है और निम्न दाब का क्षेत्र बनाती है। निम्न दाब सामान्यतः बादलों और नम मौसम से जुड़ा होता है। ठंडी वायु भारी होकर नीचे बैठती है और उच्च दाब का क्षेत्र बनाती है। उच्च दाब सामान्यतः साफ और धूप वाले मौसम से जुड़ा होता है।

पवन: उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र से निम्न वायुदाब वाले क्षेत्र की ओर वायु की गति को पवन कहते हैं। पवन हल्की भी हो सकती है और बहुत तेज भी। पवनों का नाम सामान्यतः उस दिशा के आधार पर रखा जाता है, जहाँ से वे चलती हैं। उदाहरण के लिए पश्चिम से चलने वाली पवन को पश्चिमी पवन कहा जाता है।

स्थानीय पवनें: स्थल समीर और समुद्री समीर जैसी स्थानीय पवनें भी किसी स्थान के मौसम और जलवायु को प्रभावित करती हैं। ये तटीय क्षेत्रों में जलवायु को अपेक्षाकृत सम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

स्थल समीर: रात के समय स्थल समुद्र की तुलना में तेजी से ठंडा होता है। इसलिए रात में पवन स्थल से समुद्र की ओर बहती है। इसे स्थल समीर कहते हैं।

समुद्री समीर: दिन के समय, विशेषकर दोपहर में, स्थल समुद्र की तुलना में अधिक गर्म हो जाता है। स्थल पर निम्न दाब का क्षेत्र बनता है और समुद्र से स्थल की ओर पवन चलती है। इसे समुद्री समीर कहते हैं।

ऋतुएँ: मौसम की सामान्य मासिक दशाओं के आधार पर वर्ष को विभिन्न ऋतुओं में बाँटा जाता है। भारत की जलवायु को व्यापक रूप से उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु माना जाता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भारत में चार प्रमुख ऋतुओं को मान्यता दी है।

  • शीत ऋतु: सामान्यतः दिसंबर से अप्रैल के आरंभ तक रहती है। दिसंबर और जनवरी उत्तर-पश्चिम भारत में सबसे ठंडे महीने होते हैं।
  • ग्रीष्म या मानसून-पूर्व ऋतु: सामान्यतः अप्रैल से जून तक रहती है और उत्तर-पश्चिम भारत में जुलाई तक भी रह सकती है। अधिकांश आंतरिक भारत में औसत तापमान लगभग 32°C से 40°C तक रहता है।
  • मानसून या वर्षा ऋतु: सामान्यतः जून से सितंबर तक रहती है। इस समय दक्षिण-पश्चिमी ग्रीष्म मानसून देश में वर्षा लाता है।
  • मानसूनोत्तर या लौटता मानसून: अक्टूबर से दिसंबर तक रहता है। इस अवधि में उत्तर-पश्चिम भारत में अक्टूबर और नवंबर सामान्यतः बादल रहित होते हैं, जबकि दक्षिण भारत के कुछ भागों में वर्षा होती है।

हिमालयी राज्य अपेक्षाकृत समशीतोष्ण होने के कारण दो अतिरिक्त ऋतुओं—शरद और वसंत—का अनुभव करते हैं। परंपरागत भारतीय व्यवस्था में छह ऋतुओं का उल्लेख मिलता है—वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर।

मानसून: भारत की जलवायु पर मानसूनी पवनों का बहुत गहरा प्रभाव है। मानसून शब्द अरबी शब्द ‘मौसिम’ से निकला है, जिसका अर्थ ऋतु है। मानसून का अर्थ वर्ष के दौरान पवनों की दिशा में होने वाला मौसमी परिवर्तन है। भारत में मानसूनी पवनों को मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून और उत्तर-पूर्व मानसून में बाँटा जाता है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून: दक्षिण-पश्चिम मानसून को ग्रीष्म मानसून भी कहा जाता है। यह सामान्यतः जून से सितंबर के बीच सक्रिय रहता है। गर्मियों में भारतीय स्थलभाग आसपास के समुद्रों की तुलना में तेजी से गर्म होता है। इससे भारतीय उपमहाद्वीप पर निम्न दाब और आसपास के महासागरीय क्षेत्रों पर अपेक्षाकृत उच्च दाब बनता है। वायु उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है। इसलिए समुद्र से नमी वाली हवाएँ स्थल की ओर आती हैं और वर्षा कराती हैं। देश की अधिकांश वार्षिक वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होती है।

उत्तर-पूर्व मानसून: उत्तर-पूर्व या शीतकालीन मानसून अक्टूबर से फरवरी के बीच भारत में सक्रिय होता है। इस समय भारतीय स्थलभाग आसपास के समुद्रों की तुलना में तेजी से ठंडा हो जाता है। इससे स्थल पर उच्च दाब और समुद्र के ऊपर अपेक्षाकृत निम्न दाब बनता है। परिणामस्वरूप ठंडी और शुष्क हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं। ये हवाएँ अधिकांश भारत में सामान्यतः वर्षा नहीं करातीं। लेकिन जब उत्तर-पूर्वी मानसूनी हवाएँ बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे नमी ग्रहण कर लेती हैं और भारत के पूर्वी तट पर वर्षा कराती हैं। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ भाग इस वर्षा से विशेष रूप से प्रभावित होते हैं।

मानसून का जनजीवन पर प्रभाव: भारत में कृषि का एक बड़ा भाग मानसूनी वर्षा पर निर्भर करता है। किसान फसलों की बुआई और वृद्धि के लिए वर्षा पर निर्भर रहते हैं। अच्छा मानसून पर्याप्त खाद्य उत्पादन तथा नदियों, जलाशयों और कुओं में जल उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहायता करता है। मानसून दैनिक जीवन, परिवहन, त्योहारों और विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार को भी प्रभावित करता है। अत्यधिक वर्षा से बाढ़ आ सकती है, जबकि कमजोर मानसून सूखे का कारण बन सकता है। इसलिए मानसून भारत की अर्थव्यवस्था, जीवनशैली और आजीविका को गहराई से प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन का अर्थ तापमान, वर्षा और पवन जैसे मौसम के स्वरूपों में लंबे समय तक होने वाले परिवर्तन से है। अध्याय के अनुसार मानव गतिविधियाँ, जैसे जीवाश्म ईंधन का जलाना, वनों की कटाई और औद्योगिक प्रदूषण, वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ाते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और जलवाष्प जैसी ग्रीनहाउस गैसें ऊष्मा को रोकती हैं और वैश्विक तापमान में वृद्धि में योगदान करती हैं। इसके परिणामस्वरूप अधिक बार बाढ़ और सूखा, हिमनदों का पिघलना, समुद्र तल का बढ़ना और जैव विविधता में कमी जैसी समस्याएँ देखी जा सकती हैं। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पारिस्थितिकी तंत्र, कृषि और आजीविका पर भी पड़ता है।

कार्बन फुटप्रिंट: मानव गतिविधियों, जैसे ऊर्जा के उपयोग, परिवहन तथा वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के परिणामस्वरूप वायुमंडल में छोड़ी जाने वाली कुल ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को कार्बन फुटप्रिंट कहा जाता है। इसे कम करने के लिए ऊर्जा की बचत, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग, पेड़ों की रक्षा और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने जैसे उपाय किए जा सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन को कम करने के उपाय: अध्याय सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल देता है। ऊर्जा की बचत करना, नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना, वनों की रक्षा करना, कार्बन फुटप्रिंट कम करना और टिकाऊ जीवनशैली अपनाना जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहायक हो सकता है।

पंजाब की 2025 की बाढ़ का अध्ययन: अध्याय में पंजाब की 2025 की बाढ़ को एक केस स्टडी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भारी मानसूनी वर्षा और सतलुज, ब्यास तथा रावी जैसी नदियों के जलस्तर बढ़ने से पंजाब के कई क्षेत्रों में गंभीर बाढ़ आई। इस बाढ़ से गाँवों, कृषि क्षेत्रों, घरों, सड़कों और पुलों सहित महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को नुकसान पहुँचा।

पंजाब की बाढ़ के प्राकृतिक कारण: 2025 में पंजाब में बहुत भारी मानसूनी वर्षा हुई। पश्चिमी विक्षोभ ने अतिरिक्त नमी और वर्षा को बढ़ाया। हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर में भी वर्षा हुई। सतलुज, ब्यास, रावी और घग्गर जैसी नदियों का जलस्तर पहले से ही ऊँचा था। अतिरिक्त वर्षा और पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाले पानी के कारण नदियाँ उफान पर आ गईं और कई क्षेत्रों में बाढ़ आ गई।

पंजाब की बाढ़ के मानव-निर्मित कारण: पुराने और कमजोर नदी तटबंध, नदियों के बहुत निकट घरों और खेतों का निर्माण, नदियों तथा बाँधों में गाद और मिट्टी का जमा होना तथा कुछ क्षेत्रों में बाढ़ की चेतावनियों का देर से या स्पष्ट रूप से न पहुँचना बाढ़ के प्रभाव को बढ़ाने वाले कारक थे।

पंजाब की बाढ़ के प्रभाव: बाढ़ में अनेक लोगों की जान गई। हजारों लोगों को सुरक्षा के लिए अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में जाना पड़ा। बड़े कृषि क्षेत्रों में पानी भर गया और धान जैसी फसलों को नुकसान पहुँचा। मुर्गी और डेयरी फार्म भी प्रभावित हुए। सड़कें, पुल, सीमा बाड़ और कुछ सार्वजनिक भवन क्षतिग्रस्त हुए। रुके हुए गंदे पानी से जलजनित रोगों तथा स्वच्छता संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ा।

अध्याय का मुख्य निष्कर्ष: पृथ्वी का वायुमंडल जीवन के लिए आवश्यक गैसों का आवरण है। यह पृथ्वी को हानिकारक सौर विकिरण से बचाता है और तापमान, मौसम तथा जलवायु को प्रभावित करता है। वायुमंडल की पाँच प्रमुख परतें—क्षोभमंडल, समतापमंडल, मध्यमंडल, तापमंडल और बहिर्मंडल—ऊँचाई के साथ तापमान तथा वायु के घनत्व में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर पहचानी जाती हैं। मौसम दैनिक वायुमंडलीय दशाओं को दर्शाता है, जबकि जलवायु लंबे समय की औसत मौसम दशाओं को दर्शाती है।

भारत की जलवायु का सार: भारत की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है और मानसून इसका प्रमुख आधार है। दक्षिण-पश्चिम मानसून देश के अधिकांश भागों में वर्षा लाता है, जबकि उत्तर-पूर्व मानसून विशेष रूप से दक्षिण-पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षा करता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु संबंधी विविधता होने के बावजूद मानसून कृषि, जल संसाधनों, जनजीवन और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करके पूरे देश को एक व्यापक जलवायवीय एकता प्रदान करता है।

जलवायु परिवर्तन का सार: मानव गतिविधियों से बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें जलवायु परिवर्तन में योगदान देती हैं। ऊर्जा की बचत, नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग, वनों की रक्षा और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाकर कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में योगदान दिया जा सकता है।

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