चुनाव Class 9 Social Science [LATEST] Solutions Chapter Review and Key Points in hindi - CBSE Study
NCERT Solutions for Class 9 Social Science are carefully prepared according to the latest CBSE syllabus and NCERT textbooks to help students understand every concept clearly. These solutions cover all important चुनाव with detailed explanations and step-by-step answers for better exam preparation. Each Chapter Review and Key Points is explained in simple language so that students can easily grasp the fundamentals and improve their academic performance. The study material is designed to support daily homework, revision practice, and final exam preparation for Class 9 students. With accurate answers, concept clarity, and structured content, these NCERT solutions help learners build confidence and score higher marks in their examinations. Whether you are revising a specific topic or preparing an entire chapter, this resource provides reliable and syllabus-based guidance for complete success in Social Science.
Class 9 English Medium Social Science All Chapters:
चुनाव
1. Chapter Review and Key Points
Chapter 7. Elections
अध्याय समीक्षा (Chapter Review)
1. चुनाव का अर्थ और महत्व
चुनाव लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में से एक हैं। नियमित और समय-समय पर होने वाले चुनाव लोकतंत्र के मूल में होते हैं। चुनावों के माध्यम से नागरिक अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं, जो उनकी ओर से निर्णय लेते हैं। निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं और समय-समय पर होने वाले चुनाव जनता को उन्हें चुनने तथा उनके कार्यों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का अवसर देते हैं।
चुनाव वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से नागरिक अपने मत देने के अधिकार का प्रयोग करते हैं और नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। चुनाव लोकतांत्रिक सरकार के गठन में नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करते हैं।
लोकतंत्र में चुनाव के प्रमुख महत्व हैं:
- प्रतिनिधित्व: नागरिक अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं।
- जवाबदेही: निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह रहते हैं।
- वैधता: चुनाव सरकार को लोकतांत्रिक वैधता प्रदान करते हैं।
- समानता: चुनाव नागरिकों को राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर देते हैं।
2. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव
प्रत्यक्ष चुनाव (Direct Elections): ऐसे चुनाव जिनमें नागरिक अपने प्रतिनिधियों या नेताओं को सीधे मतदान करके चुनते हैं।
भारत में लोकसभा, विधान सभा तथा स्थानीय निकायों जैसे पंचायतों और नगर निगमों के सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने जाते हैं।
अप्रत्यक्ष चुनाव (Indirect Elections): ऐसे चुनाव जिनमें नागरिक पहले प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और फिर वे प्रतिनिधि किसी नेता या पदाधिकारी का चुनाव करते हैं।
भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष निर्वाचन की प्रक्रिया से होता है।
3. निर्वाचन प्रणाली (Electoral System)
निर्वाचन प्रणाली वह व्यवस्था है जिसके द्वारा चुनाव में डाले गए मतों को विधानमंडल की सीटों में बदला जाता है। अलग-अलग निर्वाचन प्रणालियों में मतों को सीटों में बदलने की प्रक्रिया अलग हो सकती है।
भारतीय संविधान निर्माताओं ने विभिन्न निर्वाचन प्रणालियों पर विचार किया और लोकसभा तथा विधान सभा के लिए बहुलता प्रणाली (Plurality System), जिसे First-Past-The-Post (FPTP) प्रणाली भी कहा जाता है, को अपनाया।
भारत में विभिन्न चुनावों के लिए अलग-अलग निर्वाचन प्रणालियों का प्रयोग किया जाता है:
- लोकसभा: First-Past-The-Post (FPTP) प्रणाली।
- विधान सभा: First-Past-The-Post (FPTP) प्रणाली।
- राज्यसभा: आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation)।
- राष्ट्रपति: आनुपातिक प्रतिनिधित्व।
- उपराष्ट्रपति: आनुपातिक प्रतिनिधित्व।
- विधान परिषद: एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व।
4. First-Past-The-Post (FPTP) प्रणाली
FPTP प्रणाली में प्रत्येक मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक उम्मीदवार को वोट देता है। जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत प्राप्त होते हैं, वह चुनाव जीत जाता है। इसके लिए उम्मीदवार का 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करना आवश्यक नहीं है।
उदाहरण के लिए, यदि तीन उम्मीदवारों को क्रमशः 40%, 35% और 25% मत प्राप्त होते हैं, तो 40% मत पाने वाला उम्मीदवार विजेता होगा क्योंकि उसे अन्य उम्मीदवारों की तुलना में सबसे अधिक मत प्राप्त हुए हैं।
5. बहुमत प्रणाली (Majority System)
बहुमत प्रणाली में किसी उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करना आवश्यक होता है। यदि पहले चरण में कोई उम्मीदवार 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त नहीं करता है, तो शीर्ष उम्मीदवारों के बीच दूसरा चरण कराया जा सकता है।
अध्याय में काल्पनिक देश रत्नद्वीप (Ratnadweep) के उदाहरण से इस प्रणाली को समझाया गया है। यदि पहले चरण में कोई उम्मीदवार 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त नहीं करता, तो शीर्ष दो उम्मीदवार दूसरे चरण में प्रतिस्पर्धा करते हैं।
6. आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation)
आनुपातिक प्रतिनिधित्व में राजनीतिक दलों को प्राप्त मतों के अनुपात में सीटें आवंटित की जाती हैं। अध्याय में उदाहरण के माध्यम से दिखाया गया है कि किसी दल को प्राप्त कुल मतों के अनुपात में संसद की सीटें वितरित की जा सकती हैं।
भारत में राज्यसभा तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली का प्रयोग किया जाता है। विधान परिषद के चुनाव भी एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर होते हैं।
7. एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote)
एकल संक्रमणीय मत प्रणाली में मतदाता उम्मीदवारों के लिए अपनी प्राथमिकताएँ अंकित करते हैं। इसकी प्रमुख प्रक्रिया इस प्रकार है:
- मतदाता अपनी प्राथमिकताएँ अंकित करते हैं।
- पहली प्राथमिकता के मतों की गणना की जाती है।
- आवश्यक कोटा प्राप्त करने वाले उम्मीदवार निर्वाचित घोषित किए जाते हैं।
- सबसे कम मत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को बाहर किया जाता है।
- उस उम्मीदवार के मतों को मतपत्र पर अंकित अगली प्राथमिकता के अनुसार स्थानांतरित किया जाता है।
- यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक आवश्यक संख्या में उम्मीदवार निर्वाचित नहीं हो जाते।
8. भारत में चुनाव संबंधी प्रमुख कानून
अध्याय में भारत में चुनावों के संचालन को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानूनों का उल्लेख किया गया है:
- Representation of the People Act, 1950 (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950)
- Representation of the People Act, 1951 (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951)
- Presidential and Vice-Presidential Elections Act, 1952
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 मुख्य रूप से सीटों के आवंटन, निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन, मतदाता सूचियों की तैयारी और संशोधन तथा 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को बिना भेदभाव मतदान का अधिकार सुनिश्चित करने से संबंधित है।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 चुनावों के संचालन तथा चुनाव के बाद के विवादों से जुड़े अन्य विषयों से संबंधित है। इसमें उम्मीदवारों के नामांकन, चुनाव अभियान, मतदान की प्रक्रिया और विवादों के समाधान से संबंधित नियम शामिल हैं।
ये कानून मिलकर भारत की चुनावी प्रक्रिया की अखंडता, पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने में सहायता करते हैं।
9. चुनावी अपराध और भ्रष्ट आचरण
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में चुनावी अपराधों और भ्रष्ट आचरण के बारे में प्रावधान दिए गए हैं। अध्याय में इनके कुछ उदाहरण दिए गए हैं:
- किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने, चुनाव से हटने, वोट देने या वोट न देने के लिए प्रभावित करने के उद्देश्य से उपहार, प्रस्ताव या वादा करना।
- धर्म, जाति, नस्ल, समुदाय या भाषा के आधार पर लोगों से किसी उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में मतदान करने की अपील करना।
- उम्मीदवार के पक्ष में सरकारी कर्मचारियों से प्रतिबंधित सहायता लेना। इसमें राजपत्रित अधिकारी, न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, सशस्त्र बलों के कर्मचारी, पुलिस कर्मचारी और आबकारी अधिकारी आदि शामिल हैं।
10. परिसीमन (Delimitation)
परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोकसभा और विधान सभा के चुनावों के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या निर्धारित की जाती है तथा उनकी भौगोलिक सीमाएँ तय की जाती हैं।
निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ स्थायी नहीं होतीं क्योंकि समय के साथ जनसंख्या का घनत्व बदलता रहता है। परिसीमन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में सीटों और जनसंख्या का अनुपात यथासंभव समान रहे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 82 परिसीमन आयोग की स्थापना का प्रावधान करता है।
अध्याय में चार परिसीमन आयोगों का उल्लेख किया गया है, जो 1952, 1963, 1973 और 2002 में गठित हुए थे।
11. भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India)
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) एक स्वायत्त स्थायी संवैधानिक संस्था है। संविधान ने इसे भारत में चुनावों के संचालन की पूरी प्रक्रिया के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी है।
भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी। संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 निर्वाचन आयोग की स्थापना, शक्तियों और कर्तव्यों से संबंधित हैं।
ECI निम्नलिखित चुनावों का संचालन करता है:
- लोकसभा
- राज्यसभा
- विधान सभा
- विधान परिषद
- राष्ट्रपति
- उपराष्ट्रपति
12. भारत निर्वाचन आयोग के प्रमुख कार्य
मतदाता सूची तैयार करना और संशोधित करना: ECI पात्र मतदाताओं की जानकारी एकत्र करके प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए मतदाता सूची तैयार करता है। सामान्यतः केवल उन्हीं व्यक्तियों को मतदान की अनुमति होती है जिनका नाम मतदाता सूची में होता है।
ECI Special Intensive Revision (SIR) भी करता है। इसका उद्देश्य मतदाता सूचियों को अपडेट करना, सत्यापित करना और गलतियों को सुधारना है। इससे पात्र नागरिकों को सूची से बाहर रहने से बचाने तथा अपात्र व्यक्तियों को सूची में शामिल होने से रोकने में सहायता मिलती है।
SIR के दौरान मृत्यु, निवास स्थान बदलने, दोहरी प्रविष्टि तथा स्थायी रूप से पता न चलने वाले मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं। पात्र नागरिकों को दावे और आपत्तियाँ प्रस्तुत करने का अवसर भी दिया जाता है।
चुनाव कार्यक्रम और तिथि निर्धारित करना: ECI चुनाव की तिथियाँ और कार्यक्रम निर्धारित करता है। भारत जैसे बड़े और विविध देश में चुनाव कार्यक्रम बनाते समय मौसम, कृषि चक्र, स्कूल एवं विश्वविद्यालय की परीक्षाओं तथा त्योहारों जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाता है।
राजनीतिक दलों का पंजीकरण और प्रतीक आवंटन: ECI राजनीतिक दलों को पंजीकृत और निर्धारित मानदंडों के अनुसार मान्यता देता है तथा चुनाव चिह्न आवंटित करता है। यह राजनीतिक दलों की मान्यता और चुनाव चिह्नों से संबंधित विवादों में अर्ध-न्यायिक संस्था के रूप में भी कार्य करता है।
13. स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनाव
लोकतंत्र में चुनाव तभी सार्थक होते हैं जब पूरी चुनाव प्रक्रिया स्वतंत्र, निष्पक्ष, पारदर्शी, समावेशी, निष्पक्षतापूर्ण और विश्वसनीय हो। केवल चुनाव आयोजित कर देना पर्याप्त नहीं है; नागरिकों को बिना अनुचित बाधा या दबाव के अपने मतदान अधिकार का प्रयोग करने का अवसर भी मिलना चाहिए।
अध्याय में चुनावी प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने के लिए विशेष रूप से निम्नलिखित समूहों के लिए किए गए प्रयासों का उल्लेख किया गया है:
- दिव्यांगजन (Persons with Disabilities)
- वरिष्ठ नागरिक
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति
- विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs)
2024 के आम चुनावों के दौरान 85 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों तथा 40% बेंचमार्क दिव्यांगता वाले दिव्यांगजनों के लिए पूरे भारत में पहली बार घर से मतदान की सुविधा का विस्तार किया गया।
14. चुनावों में डिजिटल पहल
ECI चुनावी सेवाओं और मतदाता सहभागिता को सुविधाजनक बनाने के लिए सूचना एवं संचार तकनीक तथा विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रयोग करता है।
ETPBS: Electronically Transmitted Postal Ballot System सेवा मतदाताओं (Service Voters) को उनके मूल निर्वाचन क्षेत्र से बाहर रहते हुए इलेक्ट्रॉनिक रूप से डाक मतपत्र प्राप्त करने और मतदान करने की सुविधा देता है।
Voter Helpline App: यह मतदाता पंजीकरण, स्थानांतरण (transposition), सत्यापन आदि जैसी विभिन्न सेवाएँ उपलब्ध कराता है। इसके माध्यम से चुनाव संबंधी जानकारी, समाचार और अपडेट भी प्राप्त किए जा सकते हैं।
cVIGIL App: मतदाता इसके माध्यम से Model Code of Conduct के उल्लंघन तथा चुनावी कदाचार की सूचना दे सकते हैं।
ERONET: यह फॉर्मों के प्रसंस्करण, डेटाबेस के प्रबंधन और इलेक्ट्रॉनिक मतदाता सूचियों के रखरखाव में सहायता करता है।
Sugam: यह चुनावी कार्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले वाहनों के प्रबंधन से संबंधित वेब-आधारित एप्लिकेशन है।
Suvidha: यह उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के लिए विशेष एप्लिकेशन है। इसके माध्यम से नामांकन संबंधी फॉर्म तथा बैठक, रैली, वाहन और लाउडस्पीकर आदि के लिए अनुमति संबंधी सेवाएँ उपलब्ध होती हैं।
Saksham App: यह दिव्यांगजनों के लिए अनुकूलित सेवाएँ उपलब्ध कराता है, जैसे मतदान के लिए पंजीकरण और मतदान केंद्र खोजने में सहायता।
15. “No Voter to Be Left Behind”
अध्याय में “No Voter to Be Left Behind” की अवधारणा के माध्यम से चुनावों को अधिक समावेशी बनाने पर बल दिया गया है।
पुस्तक में Braille वाली EVM और वरिष्ठ नागरिकों के लिए घर से मतदान जैसे उदाहरण दिए गए हैं। इन उपायों का उद्देश्य अधिक से अधिक पात्र नागरिकों को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने में सक्षम बनाना है।
अध्याय के अनुसार 2024 में भारत में 96.8 करोड़ से अधिक पात्र मतदाता थे। देश के विभिन्न क्षेत्रों और भौगोलिक परिस्थितियों में चुनाव का संचालन ECI द्वारा किया जाता है।
16. राष्ट्रीय मतदाता दिवस
प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस (National Voters’ Day) मनाया जाता है।
अध्याय में दिए गए मतदाता संकल्प में लोकतंत्र, स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनावों की गरिमा को बनाए रखने तथा धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय, भाषा या किसी प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना मतदान करने की प्रतिबद्धता पर बल दिया गया है।
17. राजनीतिक दल
राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। वे नागरिकों को चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों, उनकी नीतियों, विकास संबंधी दृष्टिकोण तथा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर उनके विचारों के बारे में जानकारी प्राप्त करने में सहायता करते हैं।
राजनीतिक दलों के प्रमुख कार्य हैं:
- जनमत का निर्माण और संगठन करना।
- विशिष्ट मुद्दों पर चुनाव अभियान चलाना।
- मतदाताओं को सार्थक विकल्प उपलब्ध कराना।
- मतदाताओं को सूचित निर्णय लेने में सहायता करना।
- चुनावी घोषणापत्र तैयार करना।
- चुनाव लड़ना।
- जीतने पर सरकार बनाना।
- नीतियाँ बनाना और लागू करना।
- विपक्ष में रहते हुए सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना।
- बहसों और समितियों में भाग लेना।
18. भारत की बहुदलीय व्यवस्था
भारत में बहुदलीय व्यवस्था (Multi-Party System) है। इसका अर्थ है कि अनेक राजनीतिक दल अस्तित्व में हैं और चुनावों में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। अध्याय इस व्यवस्था को भारत की भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक और क्षेत्रीय विविधता से जोड़ता है।
निर्वाचन आयोग निर्धारित मानदंडों के आधार पर राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दल, राज्य दल या पंजीकृत-अमान्यताप्राप्त दल के रूप में वर्गीकृत करता है।
19. दल-बदल (Defection)
दल-बदल का अर्थ उस राजनीतिक दल को छोड़ना या उससे अलग होकर किसी अन्य राजनीतिक दल में जाना है जिसके टिकट पर कोई उम्मीदवार निर्वाचित हुआ था। इसमें किसी अन्य दल में शामिल होना या विशेष रूप से विधानमंडल में मतदान के मामलों में पार्टी के निर्णयों से स्वतंत्र रूप से कार्य करना शामिल हो सकता है।
अध्याय में बताया गया है कि पार्टी अनुशासन और राजनीतिक स्थिरता के संदर्भ में दल-बदल को राजनीतिक अवसरवाद के रूप में देखा जा सकता है। दूसरी ओर, इसे अंतरात्मा के अनुसार कार्य करने या बदलती जन अपेक्षाओं के प्रति प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा जा सकता है।
20. दल-बदल विरोधी कानून
भारत में दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से पारित किया गया। इसका उद्देश्य दल-बदल को रोकना और निर्वाचित सरकार में स्थिरता प्रदान करना है।
इस कानून के अनुसार संसद या राज्य विधानसभा का कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ने या पार्टी के निर्देश (whip) के विरुद्ध मतदान करने पर संबंधित सदन की सदस्यता से अयोग्य ठहराया जा सकता है, जो कानून के प्रावधानों के अधीन है। ऐसे मामलों में सदन के अध्यक्ष या सभापति निर्णय लेते हैं।
21. राजनीतिक दलों की मान्यता
निर्वाचन आयोग निर्धारित मानदंडों के आधार पर राजनीतिक दलों को मान्यता देता है। राष्ट्रीय और राज्य दलों के लिए अलग-अलग मानदंड हैं, जिनमें मतों का प्रतिशत और जीती गई सीटों जैसी शर्तें शामिल हैं।
Registered Unrecognised Political Parties (RUPP) में ऐसे दल शामिल हो सकते हैं जिन्होंने विधानसभा या आम चुनावों में आवश्यक मत प्रतिशत प्राप्त नहीं किया है या ऐसे दल जिन्होंने पंजीकरण के बाद कभी चुनाव नहीं लड़ा है।
22. गठबंधन और गठबंधन सरकार
अध्याय के अनुसार 1967 में भारत में एक-दलीय प्रभुत्व वाले चुनावों के युग का अंत हुआ और विभिन्न राज्यों में गठबंधन की राजनीति का दौर शुरू हुआ।
1977 में राष्ट्रीय आपातकाल (1975–1977) की पृष्ठभूमि में विभिन्न राजनीतिक दलों ने जनता पार्टी के रूप में गठबंधन बनाया। जनता पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर पहली गठबंधन सरकार बनाई, जिसे लोकप्रिय रूप से जनता सरकार कहा गया।
अध्याय में 1990 के दशक के उत्तरार्ध से भारतीय चुनावों में प्रमुख राजनीतिक गठबंधनों के रूप में NDA तथा UPA और 2023 में UPA के विघटन के बाद उसके पुनर्गठन के रूप में Indian National Developmental Inclusive Alliance का उल्लेख भी किया गया है।
23. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की चुनौतियाँ
भारत में चुनाव कराना एक बहुत बड़ा और जटिल कार्य है। अध्याय के अनुसार 2024 में 96.8 करोड़ से अधिक मतदाताओं, हजारों मतदान केंद्रों और सैकड़ों राजनीतिक दलों के कारण चुनावों का संचालन विभिन्न भौगोलिक और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में बड़ी चुनौती है।
अध्याय में प्रमुख चुनौतियों के रूप में निम्नलिखित का उल्लेख है:
- भ्रामक सूचना (Misinformation)
- फेक न्यूज़ (Fake News)
- धमकी या डराना-धमकाना (Intimidation)
- मतदान की पहुँच से संबंधित कठिनाइयाँ
- मतों की सही गणना सुनिश्चित करना
- चुनावी संस्थाओं में जनता का विश्वास बनाए रखना
24. चुनावी चुनौतियों से निपटने के उपाय
निर्वाचन आयोग चुनावी चुनौतियों से निपटने के लिए कानून, नियम, तकनीक और जागरूकता से संबंधित विभिन्न उपाय करता है। अध्याय में निम्नलिखित का उल्लेख किया गया है:
- Representation of the People Act, 1950
- Representation of the People Act, 1951
- Model Code of Conduct
- Electronic Voting Machines (EVMs)
- Voter Verifiable Paper Audit Trail (VVPAT)
- मतदाता जागरूकता अभियान
- तकनीक आधारित चुनावी सेवाएँ
- नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और सतर्कता
25. चुनावों में नागरिकों की भूमिका
नागरिक चुनावी प्रक्रिया के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। अध्याय में मतदान को नागरिक का संवैधानिक अधिकार तथा कर्तव्य दोनों बताया गया है।
नागरिकों को जिम्मेदारीपूर्वक मतदान करना चाहिए, उम्मीदवारों और मुद्दों के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए तथा धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय, भाषा या किसी प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना मतदान करना चाहिए।
नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और सतर्कता चुनावों को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने तथा लोकतंत्र को मजबूत करने में सहायता कर सकती है।
26. चुनाव और लोकतंत्र
चुनाव लोकतंत्र के केंद्र में हैं क्योंकि इनके माध्यम से नागरिकों को सरकार के गठन में भाग लेने और अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अवसर मिलता है। चुनाव निर्वाचित प्रतिनिधियों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हालाँकि, लोकतंत्र के लिए केवल चुनाव कराना पर्याप्त नहीं है। चुनावी प्रक्रिया स्वतंत्र, निष्पक्ष, पारदर्शी, समावेशी, निष्पक्षतापूर्ण और विश्वसनीय भी होनी चाहिए। निर्वाचन आयोग, चुनाव संबंधी कानून, राजनीतिक दल, मतदाता और अन्य हितधारक मिलकर चुनावी प्रक्रिया की लोकतांत्रिक प्रकृति को बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।
अध्याय का संक्षिप्त सार
अध्याय 7 “Elections – चुनाव” में बताया गया है कि लोकतंत्र में चुनाव क्यों आवश्यक हैं और किस प्रकार विभिन्न निर्वाचन प्रणालियाँ मतों को प्रतिनिधित्व में बदलती हैं। इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव, First-Past-The-Post प्रणाली, बहुमत प्रणाली तथा आनुपातिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन किया गया है।
अध्याय में Representation of the People Acts, परिसीमन, भारत निर्वाचन आयोग के कार्य, मतदाता सूचियाँ, Special Intensive Revision, चुनाव चिह्न और समावेशी मतदान की विभिन्न पहलों को समझाया गया है।
इसके साथ ही राजनीतिक दलों की भूमिका, भारत की बहुदलीय व्यवस्था, दल-बदल, दल-बदल विरोधी कानून, राष्ट्रीय एवं राज्य दलों की मान्यता तथा राजनीतिक गठबंधनों पर चर्चा की गई है। अंत में भ्रामक सूचना, फेक न्यूज़ और धमकी जैसी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की चुनौतियों तथा उन्हें दूर करने के लिए कानून, संस्थाओं, तकनीक, जागरूकता और नागरिक भागीदारी के महत्व को समझाया गया है।