प्रारम्भिक मानव और सभ्यता का आरम्भ Class 9 Social Science [LATEST] Solutions Chapter Review and Key Points in hindi - CBSE Study
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Class 9 English Medium Social Science All Chapters:
प्रारम्भिक मानव और सभ्यता का आरम्भ
1. Chapter Review and Key Points
अध्याय 4. प्रारम्भिक मानव और सभ्यता का आरम्भ
अध्याय समीक्षा (Chapter Review)
मानव इतिहास का बहुत बड़ा भाग उस समय का है जब लेखन का आविष्कार नहीं हुआ था। इस काल को मुख्यतः पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर समझा जाता है। औजार, जीवाश्म, हड्डियाँ, मिट्टी के बर्तन, आभूषण, गुफा-चित्र, भवनों के अवशेष तथा अन्य वस्तुएँ प्रारम्भिक मानव जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देती हैं।
लेखन से पहले का इतिहास: मानव इतिहास के 99 प्रतिशत से अधिक समय में लेखन का अस्तित्व नहीं था। लगभग 30 लाख वर्ष पहले से लेकर लगभग 5000 वर्ष पहले तक के अधिकांश इतिहास को पुरातात्त्विक प्रमाणों से समझा जाता है। लेखन के विकास के बाद लिखित दस्तावेजों के साथ-साथ पुरातात्त्विक प्रमाण भी इतिहास को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत बन गए।
पुरातत्त्व (Archaeology): पुरातत्त्व वह अध्ययन है जिसके माध्यम से अतीत के मानव जीवन को भौतिक अवशेषों के आधार पर समझा जाता है। पत्थर के औजार, जीवाश्म, हड्डियाँ, मिट्टी के बर्तन, मनके, आभूषण, गुफा-चित्र, भवन तथा अन्य वस्तुएँ इसके प्रमुख प्रमाण हैं।
प्रारम्भिक मानव: प्रारम्भिक मानवों का विकास अफ्रीका में हुआ और धीरे-धीरे वे दुनिया के अन्य भागों में फैल गए। प्रारम्भिक मानव-जैसे पूर्वजों और आधुनिक मानवों को व्यापक रूप से Hominins कहा जाता है। इस विकासक्रम में Homo habilis, Homo erectus, Homo neanderthalensis और Homo sapiens जैसे समूह शामिल हैं।
जैविक और सांस्कृतिक विकास: मानव विकास को दो प्रमुख रूपों में समझा जा सकता है। जैविक विकास में मानव शरीर और आनुवंशिक संरचना में लंबे समय के दौरान हुए परिवर्तन शामिल हैं। सांस्कृतिक विकास में मनुष्यों द्वारा अपने पर्यावरण के अनुसार जीवन-शैली, तकनीक, औजार, भोजन प्राप्त करने के तरीके और सामाजिक व्यवस्था में किए गए परिवर्तन शामिल हैं।
क्वाटरनरी काल (Quaternary Period): पिछले लगभग 26 लाख वर्षों का काल, जिसमें वर्तमान समय भी शामिल है, मानव विकास के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है। इस दौरान जलवायु और पर्यावरण में अनेक परिवर्तन हुए तथा मनुष्यों ने विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को अनुकूलित किया।
प्रारम्भिक मानवों के औजार: औजार बनाना प्रारम्भिक मानव व्यवहार की प्रमुख विशेषताओं में से एक था। पत्थर के औजारों का उपयोग मांस काटने, कंद-मूल खोदने, पशुओं की खाल खुरचने और हड्डियों से मज्जा निकालने जैसे कार्यों में किया जाता था। पुरातत्त्वविद् इन औजारों का अध्ययन तथा कभी-कभी उनका पुनर्निर्माण करके उनके संभावित उपयोग को समझते हैं।
जीवाश्म (Fossil): अतीत में जीवित रहे जीवों के सुरक्षित अवशेष, उनके निशान या छाप जीवाश्म कहलाते हैं। जीवाश्म प्रारम्भिक मानवों तथा अन्य जीवों के विकास को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
प्रागैतिहासिक काल का विभाजन: प्रारम्भिक मानव इतिहास को औजारों, तकनीक, जीवन-शैली और आर्थिक गतिविधियों में हुए परिवर्तनों के आधार पर अलग-अलग कालों में बाँटा जाता है।
1. पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age): इसे पुराना पाषाण युग भी कहा जाता है। इस काल में मानव मुख्यतः शिकारी और खाद्य-संग्राहक था। साधारण पत्थर के औजारों का प्रयोग किया जाता था। हाथ की कुल्हाड़ी (handaxe), cleaver, chopper और scraper जैसे औजार इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ सबसे पुराने मानव निवास लगभग 20 लाख वर्ष पुराने माने जाते हैं। तमिलनाडु का अत्तिरमपक्कम (Attirampakkam) और कर्नाटक का इसामपुर (Isampur) महत्वपूर्ण पुरापाषाण स्थल हैं।
बाद के चरणों में नुकीले औजार, blades, microblades तथा धनुष-बाण जैसी तकनीकों का विकास हुआ। प्रारम्भिक मानवों ने गुफाओं और खुले शिविरों में निवास किया तथा शिकार और संग्रह पर निर्भर रहे। गुफा-चित्रों और शरीर की सजावट, पत्थर, हड्डी तथा शंख से बने मनकों से उनके प्रतीकात्मक और कलात्मक व्यवहार का भी प्रमाण मिलता है।
2. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age): लगभग 12,000 वर्ष पहले जलवायु गर्म होने लगी। इससे जंगलों और घास के मैदानों का विस्तार हुआ तथा मनुष्यों को छोटे जानवरों, मछलियों और जंगली खाद्यान्नों जैसे नए संसाधन प्राप्त हुए। इस काल में बहुत छोटे पत्थर के औजार बनाए गए जिन्हें सूक्ष्म पाषाण या Microliths कहा जाता है। मछली पकड़ना भी महत्वपूर्ण गतिविधि बन गया।
मध्य प्रदेश का भीमबेटका (Bhimbetka) एक महत्वपूर्ण स्थल है, जहाँ अनेक चित्रित शैलाश्रय पाए गए हैं। यहाँ मध्यपाषाण तथा इससे पहले के मानव निवास के प्रमाण मिले हैं।
3. नवपाषाण काल (Neolithic Age): नवपाषाण या नया पाषाण युग मानव जीवन में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का काल था। इस समय मनुष्य धीरे-धीरे शिकार और खाद्य-संग्रह से आगे बढ़कर कृषि तथा पशुपालन करने लगा। पौधों की खेती और पशुओं का पालतूकरण शुरू हुआ। इससे भोजन के उत्पादन पर मानव का नियंत्रण बढ़ा और स्थायी बस्तियों का विकास हुआ।
इस परिवर्तन को नवपाषाण क्रांति (Neolithic Revolution) कहा जाता है। इस काल में घिसे और अधिक परिष्कृत पत्थर के औजार, मिट्टी के बर्तन, बुनाई तथा खाद्य प्रसंस्करण जैसी गतिविधियों का विकास हुआ। यह परिवर्तन सभी स्थानों पर एक ही समय में नहीं हुआ।
मेहरगढ़ (Mehrgarh): मेहरगढ़ बोलन नदी के किनारे, वर्तमान पाकिस्तान में स्थित एक महत्वपूर्ण नवपाषाण स्थल है। यह उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने नवपाषाण स्थलों में से एक है और इसका समय लगभग 7000 ईसा पूर्व तक जाता है। यहाँ हाथ से बनाए गए धूप में सुखाए गए ईंटों के घर और अनाज रखने के भंडार मिले हैं। लोग गेहूँ और जौ की खेती करते थे तथा भेड़, बकरी और भारतीय मवेशियों, विशेषकर ज़ेबू, को पालते थे।
मेहरगढ़ से लैपिस लाजुली, कार्नेलियन और शंख से बने आभूषणों के प्रमाण भी मिले हैं। बाद के समय में यहाँ तांबे की वस्तुएँ भी मिलने लगीं। लगभग 2500 ईसा पूर्व तक भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भागों में कृषि पर आधारित नवपाषाण समुदाय विकसित हो चुके थे।
4. ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age): इस काल में पत्थर के औजारों के साथ-साथ तांबे का उपयोग भी होने लगा। तांबे की तकनीक ने औजारों, कृषि और शिल्प के विकास में योगदान दिया। यह काल आगे चलकर धातु तकनीक और अधिक विकसित सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण बना।
5. कांस्य युग (Bronze Age): तांबे और टिन को मिलाकर कांस्य बनाया जाता था। कांस्य धातु के उपयोग से अधिक प्रभावी औजार और हथियार बनाए जा सके। व्यापार, शिल्प, नगरों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का विस्तार हुआ तथा प्रारम्भिक सभ्यताओं का विकास हुआ।
6. लौह युग (Iron Age): लौह धातु के व्यापक उपयोग से अधिक मजबूत औजार और हथियार बनाए जाने लगे। इससे कृषि तथा अन्य गतिविधियों में तकनीकी परिवर्तन हुए और अधिक विकसित समाजों के विकास में सहायता मिली।
सिन्धु–सरस्वती सभ्यता की ओर विकास: प्रारम्भिक कृषि समुदायों, तांबे की तकनीक, शिल्प उत्पादन और आर्थिक एकीकरण ने आगे चलकर नगरों के विकास का आधार तैयार किया। सिन्धु और घग्गर–सरस्वती क्षेत्रों में प्रारम्भिक बस्तियों का विकास हुआ। यहाँ मिट्टी के बर्तन, मनके, शंख की चूड़ियाँ, टेराकोटा की वस्तुएँ, तांबे का काम और अन्य शिल्प विकसित हुए।
कालीबंगा: कालीबंगा में जुताई किए हुए खेत के प्रमाण मिले हैं। खेत में क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर दोनों दिशाओं में बनी हुई नालियाँ मिली हैं, जो दोहरी फसल उगाने की व्यवस्था की ओर संकेत करती हैं।
मानकीकृत बाट और माप: हड़प्पाई समुदायों में मानकीकृत बाटों का प्रयोग होता था। छोटे मापों में 1, 2, 4, 8 और 16 जैसे द्विगुणित क्रम तथा बड़े मापों में दस के गुणकों का उपयोग किया जाता था। कई बाट घनाकार पत्थर के बने होते थे।
हड़प्पाई नगर: तकनीकी विकास और आर्थिक एकीकरण के परिणामस्वरूप नगर केन्द्रों का विकास हुआ। हड़प्पाई नगरों में योजनाबद्ध बस्तियाँ, जल प्रबंधन और जल निकासी की व्यवस्था, मानकीकृत बाट-माप, पत्थर के मनके, अभिलेखयुक्त मुहरें और लेखन जैसी विशेषताएँ दिखाई देती हैं। हड़प्पाई लिपि चित्रात्मक स्वरूप की थी, लेकिन अभी तक इसे पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सका है।
कांस्य युग की नदी-घाटी सभ्यताएँ: कांस्य युग में चार प्रमुख नदी-घाटी सभ्यताओं का विकास हुआ—सिन्धु–सरस्वती क्षेत्र में हड़प्पाई सभ्यता, टिगरिस और यूफ्रेटीस नदियों के क्षेत्र में मेसोपोटामिया, नील नदी के किनारे मिस्र तथा हुआंग हे नदी के क्षेत्र में चीनी सभ्यता। इन सभ्यताओं ने कृषि, लेखन, वास्तुकला, प्रशासन, शिल्प और व्यापार के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
मेसोपोटामिया: मेसोपोटामिया शब्द का अर्थ यूनानी भाषा में “दो नदियों के बीच की भूमि” है। यह मुख्यतः टिगरिस और यूफ्रेटीस नदियों के क्षेत्र में स्थित था। आज इसका अधिकांश भाग इराक और कुवैत तथा कुछ भाग तुर्की और दक्षिण-पश्चिमी ईरान में आता है। इसकी उपजाऊ भूमि के कारण इसे Fertile Crescent का हिस्सा माना जाता है।
लगभग 3500 ईसा पूर्व से मेसोपोटामिया में सुमेरियन, अक्कादी, असीरियाई और बेबीलोनियाई जैसी नगर-आधारित सभ्यताओं का विकास हुआ। सुमेरियनों ने सिंचाई के लिए बाँध और नहरें बनाईं तथा उर जैसे नगरों का विकास किया। उनके मंदिर आर्थिक और प्रशासनिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण केन्द्र थे।
जिग्गुरात (Ziggurat): जिग्गुरात सीढ़ीनुमा, पिरामिड जैसी संरचना वाला मंदिर था। इसके कई स्तर होते थे और सबसे ऊपर मुख्य मंदिर स्थित होता था। इनका उपयोग धार्मिक कार्यों के साथ-साथ प्रशासन और भंडारण से संबंधित गतिविधियों में भी किया जाता था।
कीलाक्षर लिपि (Cuneiform): सुमेरियनों ने गीली मिट्टी की पट्टियों पर सरकंडे से कील के आकार के निशान बनाकर लेखन की एक प्रणाली विकसित की, जिसे कीलाक्षर या Cuneiform कहा जाता है। लगभग 3000 ईसा पूर्व तक इसका व्यापक प्रयोग हो रहा था। लेखकों या scribes का समाज में उच्च स्थान था। मिट्टी की पट्टियों पर मिथक, महाकाव्य, स्तुतिगान, कानून, शिक्षा तथा कृषि और शिल्प से संबंधित अभिलेख लिखे जाते थे।
सुमेरियनों ने पहिए वाली गाड़ी और पाल वाली नाव जैसी तकनीकों का विकास किया। उन्होंने 60 पर आधारित संख्या प्रणाली का प्रयोग किया। आज एक घंटे में 60 मिनट, एक मिनट में 60 सेकंड और वृत्त में 360 डिग्री की व्यवस्था में इस प्राचीन प्रणाली की छाप दिखाई देती है।
अक्कादी, असीरियाई और बेबीलोनियाई: अक्कादियों ने लगभग 2334 ईसा पूर्व से शक्ति प्राप्त की। असीरियाई सभ्यता का केन्द्र अस्सुर था। बेबीलोनियाई सभ्यता मध्य मेसोपोटामिया में विकसित हुई। बेबीलोन के शासक हम्मुराबी ने लगभग 1792 ईसा पूर्व सत्ता संभाली और उसके नाम से प्रसिद्ध हम्मुराबी की संहिता (Code of Hammurabi) कानूनों का महत्वपूर्ण संग्रह है।
मिस्र की सभ्यता: मिस्र की सभ्यता नील नदी के किनारे विकसित हुई। नील नदी की वार्षिक बाढ़ उपजाऊ मिट्टी जमा करती थी। मिस्रवासी अपनी भूमि को केमेट (Kemet), अर्थात “काली भूमि”, कहते थे क्योंकि नदी की काली उपजाऊ मिट्टी कृषि के लिए अत्यंत उपयोगी थी।
मिस्रवासियों का कैलेंडर तीन ऋतुओं—Inundation (बाढ़), Peret (फसल उगने का समय) और Shemu (फसल काटने का समय)—पर आधारित था। प्रत्येक ऋतु चार महीनों की होती थी। वर्ष में 365 दिन माने जाते थे।
फराओ और पिरामिड: मिस्र के शासकों को फराओ कहा जाता था। उनके लिए विशाल समाधि संरचनाएँ बनाई जाती थीं। सक्कारा का Step Pyramid इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। मिस्रवासियों का विश्वास था कि शरीर के सुरक्षित रहने से व्यक्ति का आध्यात्मिक रूप या ka मृत्यु के बाद भी जीवित रह सकता है। इसी विश्वास के कारण ममीकरण की प्रक्रिया विकसित हुई।
ममीकरण: ममीकरण में शरीर के आंतरिक अंगों को निकालकर, हृदय को सामान्यतः शरीर में रखते हुए, शरीर को natron से सुखाया जाता था। इसके बाद तेल लगाया जाता और शरीर को लिनन के कपड़ों में लपेटकर ताबूत में रखा जाता था।
मिस्र का सामाजिक ढाँचा: समाज में सबसे ऊपर फराओ था। उसके नीचे सरकारी अधिकारी, कुलीन और पुजारी थे। इनके बाद स्वतंत्र भूमिधारी, कारीगर और व्यापारी तथा फिर कृषक/सेरफ और दास जैसे समूह आते थे। मिस्रवासियों ने Hieroglyphic लेखन प्रणाली का भी विकास किया।
चीनी सभ्यता: प्राचीन चीनी सभ्यता उत्तरी चीन में हुआंग हे नदी के बेसिन में विकसित हुई। यहाँ कृषि, शिल्प, कांस्य धातुकर्म और राजनीतिक संगठन का विकास हुआ। चीनी लेखन प्रणाली मुख्यतः logographic थी। जेड (Jade) की वस्तुएँ, मूर्तियाँ और अनुष्ठानिक वस्तुएँ प्रतिष्ठा और धार्मिक महत्व रखती थीं।
चीनी सभ्यता में कांस्य धातु से हथियार, औजार और धार्मिक पात्र बनाए जाते थे। जेड की नक्काशी तथा संगीत से संबंधित वस्तुओं का भी विकास हुआ।
चीन की महान दीवार: चीन की महान दीवार का निर्माण और विस्तार लगभग 2000 वर्षों तक विभिन्न चरणों में हुआ। प्रारम्भिक दीवारों का निर्माण लगभग 680 ईसा पूर्व से झोऊ तथा अन्य शासकों द्वारा घुमंतू समूहों के हमलों से सुरक्षा के लिए किया गया। बाद के शासकों ने इन दीवारों को जोड़ा, बढ़ाया और मजबूत किया।
रेशम (Silk): रेशम का ज्ञान नवपाषाण काल से ही था और कांस्य युग में यह एक महत्वपूर्ण शिल्प बन गया। बाद में हान काल में रेशम का बाहरी व्यापार बहुत महत्वपूर्ण हुआ और इससे संबंधित व्यापारिक मार्ग को Silk Route कहा गया।
सभ्यताओं के बीच संपर्क: सिन्धु–सरस्वती क्षेत्र और मेसोपोटामिया भौगोलिक रूप से अपेक्षाकृत निकट थे, इसलिए दोनों के बीच व्यापार और संपर्क के मजबूत प्रमाण मिलते हैं। इसके विपरीत, सिन्धु–सरस्वती सभ्यता और मिस्र या चीन के बीच सीधे संपर्क के ठोस भौतिक प्रमाण बहुत कम हैं।
अध्याय का मुख्य निष्कर्ष: मानव सभ्यता का विकास अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह एक लंबी और क्रमिक प्रक्रिया थी। शिकार और खाद्य-संग्रह से कृषि तथा पशुपालन की ओर परिवर्तन, स्थायी बस्तियों का विकास, औजारों और धातुओं की तकनीक, शिल्प, व्यापार, लेखन, प्रशासन और नगरों का विकास—इन सभी परिवर्तनों ने प्रारम्भिक सभ्यताओं के निर्माण में योगदान दिया। सिन्धु–सरस्वती, मेसोपोटामिया, मिस्र और चीन की सभ्यताएँ उपजाऊ नदी-घाटियों में विकसित हुईं और मानव समाज के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।