Your Complete CBSE Learning Hub

Free NCERT Solutions, Revision Notes & Practice Questions

Notes | Solutions | PYQs | Sample Papers — All in One Place

Get free NCERT solutions, CBSE notes, sample papers and previous year question papers for Class 6 to 12 in Hindi and English medium.

Advertise:

1000 ईस्वी तक राज्य और समाज Class 9 Social Science [LATEST] Solutions NCERT Textbook Questions & Answers in hindi - CBSE Study

1000 ईस्वी तक राज्य और समाज Social Science Class 9 exercise - [LATEST] Solutions NCERT Textbook Questions & Answers cbse board school study materials like cbse notes in 1 medium, all chapters and exercises are covered the ncert latest syllabus 2026 - 27.

• Hi Guest! • Login • Register •

Class 6

NCERT Solutions

Class 7

NCERT Solutions

Class 8

NCERT Solutions

Class 9

NCERT Solutions

Class 10

NCERT Solutions

Class 11

NCERT Solutions

Class 12

NCERT Solutions

Class 6

CBSE Notes

Class 7

CBSE Notes

Class 8

CBSE Notes

Class 9

CBSE Notes

Class 10

CBSE Notes

Class 11

CBSE Notes

Class 12

CBSE Notes

1000 ईस्वी तक राज्य और समाज Class 9 Social Science [LATEST] Solutions NCERT Textbook Questions & Answers in hindi - CBSE Study

NCERT Solutions for Class 9 Social Science are carefully prepared according to the latest CBSE syllabus and NCERT textbooks to help students understand every concept clearly. These solutions cover all important 1000 ईस्वी तक राज्य और समाज with detailed explanations and step-by-step answers for better exam preparation. Each NCERT Textbook Questions & Answers is explained in simple language so that students can easily grasp the fundamentals and improve their academic performance. The study material is designed to support daily homework, revision practice, and final exam preparation for Class 9 students. With accurate answers, concept clarity, and structured content, these NCERT solutions help learners build confidence and score higher marks in their examinations. Whether you are revising a specific topic or preparing an entire chapter, this resource provides reliable and syllabus-based guidance for complete success in Social Science.

Class 9 English Medium Social Science All Chapters:

1000 ईस्वी तक राज्य और समाज

3. NCERT Textbook Questions & Answers

Chapter 5. State and Society up to 1000 CE

NCERT Textbook Solutions

प्रश्न 1. वैदिक काल से मौर्य और गुप्त जैसे बड़े साम्राज्यों के युग तक राजनीतिक संगठन में किस प्रकार परिवर्तन आया? प्रारंभिक भारतीय राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था समझाइए।

उत्तर: वैदिक काल में राजनीतिक संगठन मुख्यतः कुल (kula), ग्राम (grāma), विश (viśha) और जन (jana) जैसी सामाजिक एवं जनजातीय इकाइयों पर आधारित था। राजा (rājā) जन का प्रमुख संरक्षक होता था। उसकी शक्ति पूरी तरह निरंकुश नहीं थी और सभा (sabhā), समिति (samiti) तथा अन्य सामुदायिक संस्थाएँ शासन में भूमिका निभाती थीं।

समय के साथ छोटे जन-आधारित संगठनों का विकास बड़े क्षेत्रीय राजनीतिक संगठनों में हुआ। जनपद और बाद में महाजनपद अस्तित्व में आए। लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक उत्तरी भारत में राजतंत्रात्मक राज्यों के साथ-साथ गणों या संघों (gaṇas/saṁghas) का भी अस्तित्व था। मगध का विस्तार हुआ और आगे चलकर मौर्य साम्राज्य जैसा विशाल साम्राज्य बना। इसके बाद गुप्तों तथा दक्षिण भारत में चोलों जैसे बड़े राजनीतिक राज्यों का विकास हुआ।

प्रारंभिक भारतीय राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था में राजा के साथ मंत्री और विभिन्न अधिकारी कार्य करते थे। बड़े राज्यों को विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में बाँटा जाता था। गाँव प्रशासन की सबसे छोटी इकाई था और कई क्षेत्रों में वह स्थानीय कार्यों के लिए काफी हद तक स्वायत्त था। मौर्य प्रशासन में कर-संग्रह, सेना, न्याय, आर्थिक गतिविधियों और कृषि पर विशेष ध्यान दिया गया। बाद के चोल प्रशासन में मण्डलम्, वलनाडु, नाडु और उर जैसी प्रशासनिक इकाइयाँ थीं तथा ग्राम सभाएँ स्थानीय कार्यों का प्रबंधन करती थीं।

इस प्रकार राजनीतिक संगठन ने छोटे जन-आधारित समूहों से विकसित होकर अधिक जटिल, क्षेत्रीय और साम्राज्यात्मक प्रशासन का रूप लिया, जबकि स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी बनी रही।

प्रश्न 2. राजा की भूमिका, महत्वपूर्ण अधिकारियों तथा बड़े क्षेत्रों को शासित करने के लिए अपनाई गई विधियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: प्रारंभिक भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में राजा राज्य का प्रमुख होता था। उसका प्रमुख दायित्व प्रजा की रक्षा करना, न्याय सुनिश्चित करना और राज्य की व्यवस्था बनाए रखना था। ग्रंथों जैसे महाभारत और अर्थशास्त्र में राजा के कर्तव्यों पर विशेष बल दिया गया है।

राजा अकेले शासन नहीं करता था। उसके सहयोग के लिए मंत्रिपरिषद (mantri-pariṣhad) होती थी। इसमें महत्वपूर्ण अधिकारी शामिल होते थे, जैसे—

  • कोषाध्यक्ष
  • मुख्य कर-संग्रह अधिकारी
  • मुख्य कानूनी सलाहकार
  • सेनापति

कौटिल्य के अनुसार राज्य सात प्रमुख अंगों से मिलकर बना था, जिन्हें सप्ताङ्ग कहा गया—राजा, मंत्री/अधिकारी, राज्य का क्षेत्र और जनसंख्या, दुर्ग, कोष, सेना तथा मित्र/सहयोगी। इससे पता चलता है कि प्रभावी शासन के लिए विभिन्न संस्थाओं और अधिकारियों के बीच समन्वय आवश्यक माना जाता था।

बड़े क्षेत्रों को नियंत्रित करने के लिए राज्य को विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में बाँटा जाता था। प्रांतों, जिलों और गाँवों के माध्यम से प्रशासन चलाया जाता था। कर-संग्रह, सेना, न्याय, कृषि, सिंचाई और व्यापार पर राज्य का ध्यान रहता था। स्थानीय स्तर पर गाँवों को अनेक व्यावहारिक कार्यों में पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त थी।

चोलों के समय प्रशासन का एक उदाहरण मिलता है, जिसमें साम्राज्य को मण्डलम् → वलनाडु → नाडु → उर में विभाजित किया गया था। उत्तरमेरूर अभिलेख से पता चलता है कि ग्राम सभाएँ सिंचाई, भूमि-प्रबंधन, कर-संग्रह, न्याय और अभिलेखों जैसे कार्यों का संचालन करती थीं।

प्रश्न 3. इस अध्याय के अध्ययन के बाद, 1000 ईस्वी से पहले भारत में राज्य और समाज की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएँ क्या थीं?

उत्तर: 1000 ईस्वी से पहले भारतीय राज्य और समाज की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—

  • राजनीतिक संगठन का विकास जन और कुल जैसी प्रारंभिक इकाइयों से जनपद, महाजनपद और बड़े साम्राज्यों तक हुआ।
  • राजतंत्र के साथ-साथ कुछ क्षेत्रों में गण और संघ जैसी राजनीतिक व्यवस्थाएँ भी थीं।
  • राजा को प्रजा की रक्षा, न्याय और राज्य की व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व दिया गया था।
  • राज्य प्रशासन में मंत्रियों और विभिन्न अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
  • गाँव प्रशासन की महत्वपूर्ण और सबसे छोटी इकाई था तथा कई स्थानों पर स्थानीय स्तर पर पर्याप्त स्वायत्तता थी।
  • धर्म, ऋत और नैतिक आचरण सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन के महत्वपूर्ण आधार थे।
  • वर्ण और जाति जैसी सामाजिक संरचनाएँ समय के साथ विकसित हुईं और उनमें परिवर्तन भी हुआ।
  • महिलाएँ शिक्षा, कृषि, कला, धार्मिक गतिविधियों, व्यापार तथा शासन से जुड़े विभिन्न कार्यों में भाग लेती थीं।
  • शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि नैतिकता, अनुशासन और चरित्र-निर्माण पर भी बल देती थी।
  • कृषि अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार थी तथा सिंचाई के लिए बाँध, नहर, झील और तालाब बनाए जाते थे।
  • व्यापार मार्गों, बंदरगाहों और श्रेणियों (guilds) ने आर्थिक गतिविधियों को संगठित किया।
  • भक्ति परंपरा तथा विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक विचारों का विकास हुआ।

इस प्रकार इस काल में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और ज्ञान परंपराओं का निरंतर विकास हुआ।

प्रश्न 4. ऋग्वेद, अर्थशास्त्र और महाभारत जैसे प्रारंभिक ग्रंथ राजनीतिक और सामाजिक जीवन के बारे में क्या बताते हैं?

उत्तर: प्रारंभिक भारतीय ग्रंथ राजनीतिक और सामाजिक जीवन की विभिन्न विशेषताओं को समझने में महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

ऋग्वेद से हमें प्रारंभिक वैदिक समाज, जन-आधारित संगठन, राजा, सभा, समिति, सामाजिक संबंधों और धार्मिक विचारों की जानकारी मिलती है। इसमें विभिन्न व्यवसायों और सामाजिक भूमिकाओं का भी उल्लेख मिलता है।

अर्थशास्त्र राज्य-व्यवस्था और प्रशासन का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। इसमें राजा के कर्तव्यों, मंत्रियों, अधिकारियों, कर-संग्रह, सेना, कोष, व्यापार, कृषि, कानून-व्यवस्था और राज्य के संगठन पर चर्चा मिलती है।

महाभारत में राजधर्म, न्याय, कर्तव्य, शासन और प्रजा के कल्याण जैसे विषयों पर विचार मिलता है। इसमें आदर्श शासक को ऐसा व्यक्ति माना गया है जो लोगों तथा सभी प्राणियों के कल्याण के लिए कार्य करे।

इन ग्रंथों से यह भी पता चलता है कि उस समय राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाता था, बल्कि उसे कर्तव्य, नैतिकता, न्याय और सामाजिक व्यवस्था से जोड़ा जाता था।

प्रश्न 5. प्रारंभिक भारतीय समाज से हमें वर्ण और महिलाओं की भूमिका के बारे में क्या जानकारी मिलती है?

उत्तर: प्रारंभिक भारतीय समाज में चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—का उल्लेख मिलता है। अध्याय के अनुसार प्रारंभिक वैदिक समाज में सामाजिक पहचान केवल जन्म पर आधारित कठोर व्यवस्था नहीं थी। व्यवसायों में कुछ लचीलापन दिखाई देता है। ऋग्वेद के एक उदाहरण में एक ही परिवार के अलग-अलग सदस्यों के अलग-अलग व्यवसायों का उल्लेख मिलता है।

समय के साथ वर्णों से संबंधित भूमिकाएँ अधिक स्पष्ट हुईं। ब्राह्मणों का संबंध अध्ययन-अध्यापन और यज्ञों से, क्षत्रियों का शासन और रक्षा से, वैश्यों का कृषि, पशुपालन और व्यापार से तथा शूद्रों का सहायता के साथ-साथ कृषि, पशुपालन, व्यापार और शिल्प जैसे कार्यों से जुड़ाव बताया गया है। आगे चलकर विभिन्न कारणों से जातियों (jātis) का विकास हुआ।

महिलाओं की भूमिका भी विभिन्न कालों में अलग-अलग रही। वैदिक परंपरा में महिलाओं के शिक्षा और विद्वत्ता से जुड़े उदाहरण मिलते हैं। ऋग्वेद में अपाला, विश्ववारा, घोषा और लोपामुद्रा जैसी महिलाओं से संबंधित परंपराएँ मिलती हैं। बाद के कालों में भी महिलाएँ कृषि, पशुपालन, शिल्प, व्यापार, धार्मिक गतिविधियों और कला में सक्रिय रहीं।

गुप्त-वाकाटक काल में प्रभावती गुप्त ने वाकाटक राज्य में एक रीजेंट के रूप में शासन किया और अपने नाम से भूमि-अनुदान जारी किए। संगम साहित्य में भी महिलाओं की आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी का उल्लेख मिलता है। चोल काल में सेम्बियन महादेवी ने मंदिर निर्माण और धार्मिक संस्थाओं को समर्थन दिया।

प्रश्न 6. सभा और समिति जैसी सभाओं ने राजा की शक्ति को किस प्रकार सीमित किया? आज कौन-सी आधुनिक संस्थाएँ समान कार्य करती हैं?

उत्तर: वैदिक समाज में सभा और समिति जैसी संस्थाएँ सामुदायिक विचार-विमर्श और निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। इनके अस्तित्व से यह संकेत मिलता है कि राजा की सत्ता हमेशा पूर्णतः निरंकुश नहीं थी। समुदाय के महत्वपूर्ण लोग तथा अन्य सदस्य विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श करते थे और शासन से संबंधित मामलों में भाग लेते थे।

इन संस्थाओं ने राजा को समाज से अलग होकर मनमाने ढंग से शासन करने के बजाय सामुदायिक विचार और परामर्श को महत्व देने की व्यवस्था प्रदान की। अध्याय में यह भी उल्लेख है कि कुछ प्रारंभिक स्रोतों में राजाओं के चुने जाने या हटाए जाने के संकेत मिलते हैं।

आधुनिक भारत में कुछ संस्थाएँ इसी व्यापक विचार—सत्ता पर नियंत्रण, प्रतिनिधित्व और विचार-विमर्श—से जुड़ी हैं। उदाहरण के लिए संसद, राज्य विधानसभाएँ, स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ और ग्राम सभाएँ जनता के प्रतिनिधित्व और शासन में भागीदारी के माध्यम प्रदान करती हैं।

प्रश्न 7. प्रारंभिक भारतीय समाज में वर्ण और जाति शब्द किसके लिए प्रयुक्त होते थे? इनमें क्या अंतर था और विभिन्न जातियों के निर्माण में कौन-से कारक योगदान दे सकते हैं?

उत्तर: वर्ण प्रारंभिक भारतीय समाज की चार व्यापक सामाजिक श्रेणियों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—के लिए प्रयुक्त अवधारणा थी। अध्याय के अनुसार यह विभाजन प्रारंभ में कार्य और सामाजिक भूमिकाओं से जुड़ा हुआ था।

जाति एक अधिक विशिष्ट सामाजिक समूह था। समय के साथ अनेक जातियाँ विकसित हुईं। अध्याय में जातियों के निर्माण के लिए कई कारकों का उल्लेख किया गया है, जैसे—

  • विभिन्न वर्णों के बीच अंतर्विवाह
  • प्रवास करने वाले समुदायों का अंतर्विवाही समूह बन जाना
  • क्षेत्रीय या भौगोलिक अंतर
  • नए व्यवसायों और सामाजिक समूहों का विकास

इस प्रकार चार वर्णों की संख्या निश्चित मानी गई, जबकि जातियों की संख्या निश्चित नहीं थी। अलग-अलग समुदायों और व्यवसायों के विकास के साथ अनेक जातियाँ अस्तित्व में आ सकती थीं।

प्रश्न 8. आपके विचार में प्रारंभिक भारत में शिक्षा में ज्ञान और नैतिक मूल्यों दोनों पर बल क्यों दिया जाता था? इससे समाज को क्या लाभ हुआ होगा?

उत्तर: प्रारंभिक भारतीय शिक्षा का उद्देश्य केवल किसी विशेष व्यवसाय के लिए प्रशिक्षण देना नहीं था। शिक्षा को व्यक्ति के समग्र विकास से जोड़ा गया था। विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ सत्य, धैर्य, नियमितता, विनम्रता, आत्म-संयम और अच्छे आचरण की शिक्षा दी जाती थी।

गुरुकुल में विद्यार्थी वेदों के साथ व्याकरण, तर्क, दर्शन, नैतिकता, गणित, विज्ञान, चिकित्सा और खगोलशास्त्र जैसे विषयों का अध्ययन करते थे। साथ ही योग, ध्यान, सेवा, शारीरिक शिक्षा तथा विभिन्न कलाओं का प्रशिक्षण भी दिया जाता था। गुरु-शिष्य संबंध को पवित्र माना जाता था।

ज्ञान के साथ नैतिक मूल्यों पर बल देने से ऐसे व्यक्तियों के निर्माण का उद्देश्य था जो अपने कर्तव्यों को समझें, माता-पिता और गुरु का सम्मान करें, समाज के प्रति जिम्मेदार रहें और उचित आचरण करें। इस प्रकार शिक्षा को व्यक्ति और समाज दोनों के कल्याण से जोड़ा गया था।

प्रश्न 9. प्रारंभिक भारत के प्रमुख व्यापार मार्गों ने वस्तुओं, कौशल, विश्वासों और सांस्कृतिक प्रथाओं के आदान-प्रदान में किस प्रकार सहायता की?

उत्तर: प्रारंभिक भारत में व्यापार के लिए महत्वपूर्ण स्थल और मार्ग विकसित हुए। लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक दक्षिणापथ (Dakṣiṇāpatha) और उत्तरापथ (Uttarāpatha) जैसे प्रमुख मार्ग विकसित हो चुके थे। ये मार्ग आंतरिक क्षेत्रों को विभिन्न नगरों तथा समुद्री बंदरगाहों से जोड़ते थे।

इन मार्गों से कपड़ा, धातु, रत्न, मोती, नमक, कृषि उत्पाद और अन्य वस्तुओं का परिवहन होता था। व्यापारी, कारीगर और अन्य लोग इन मार्गों से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक जाते थे। इस आवागमन से केवल वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि कौशल, विचार, धार्मिक विश्वास, भाषा और सांस्कृतिक प्रथाओं का भी आदान-प्रदान हुआ।

मसुलीपट्टनम, मुज़िरिस, कावेरीपट्टिनम और अरिकामेडु जैसे बंदरगाह समुद्री व्यापार से जुड़े थे। इस प्रकार व्यापार मार्गों ने विभिन्न क्षेत्रों को आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 10. आधुनिक संचार प्रणालियों के अभाव में बड़े साम्राज्य पर शासन करने के क्या लाभ और चुनौतियाँ रही होंगी?

उत्तर: बड़े साम्राज्य का विस्तार शासक को विशाल क्षेत्र, संसाधनों और व्यापार मार्गों पर राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने का अवसर देता था। इससे अलग-अलग क्षेत्रों के बीच व्यापार और प्रशासनिक संबंध विकसित किए जा सकते थे। राज्य कृषि, सिंचाई, व्यापार, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को बड़े क्षेत्र में व्यवस्थित कर सकता था।

लेकिन आधुनिक संचार साधनों के अभाव में बड़े साम्राज्य पर शासन करना कठिन भी रहा होगा। राजधानी से दूर स्थित क्षेत्रों तक आदेश पहुँचने में समय लगता होगा। स्थानीय अधिकारियों और प्रशासनिक इकाइयों पर अधिक निर्भरता आवश्यक रही होगी। दूर-दराज क्षेत्रों में विद्रोह, सीमा-सुरक्षा, कर-संग्रह तथा प्रशासनिक नियंत्रण जैसी समस्याएँ भी अधिक कठिन रही होंगी।

इसीलिए बड़े राज्यों में प्रांतों, जिलों और गाँवों जैसी प्रशासनिक इकाइयों तथा स्थानीय अधिकारियों की व्यवस्था महत्वपूर्ण रही होगी।

प्रश्न 11. शासन के बारे में अनेक विचार राजा के विद्वानों और सलाहकारों द्वारा लिखे गए ग्रंथों से मिलते हैं। केवल ऐसे स्रोतों पर निर्भर रहने की क्या सीमाएँ हो सकती हैं?

उत्तर: राजा के विद्वानों और सलाहकारों द्वारा लिखे गए ग्रंथ शासन, प्रशासन और राजनीतिक विचारों की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, लेकिन केवल इन्हीं स्रोतों पर निर्भर रहने की कुछ सीमाएँ हैं।

  • इन ग्रंथों में अक्सर शासक और प्रशासन के दृष्टिकोण को अधिक महत्व मिल सकता है।
  • इनमें आदर्श शासन का वर्णन वास्तविक परिस्थितियों से अलग हो सकता है।
  • साधारण लोगों, महिलाओं, श्रमिकों और विभिन्न स्थानीय समुदायों के दैनिक जीवन की जानकारी सीमित हो सकती है।
  • लेखक के अपने विचार और उद्देश्य सामग्री को प्रभावित कर सकते हैं।
  • किसी एक ग्रंथ से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के सभी क्षेत्रों की सामाजिक स्थिति को समझना उचित नहीं होगा।

इसलिए इतिहासकारों के लिए साहित्यिक ग्रंथों के साथ पुरातात्त्विक प्रमाण, अभिलेख, सिक्के, स्थापत्य, यात्रावृत्तांत और अन्य स्रोतों को भी देखना आवश्यक है। अलग-अलग स्रोतों की तुलना करके अतीत को अधिक अच्छी तरह समझा जा सकता है।

प्रश्न 12. दिए गए नासिक गुफा अभिलेख को पढ़कर प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(क) यह स्रोत हमें श्रेणियों के आर्थिक महत्व के बारे में क्या बताता है?

उत्तर: नासिक गुफा अभिलेख से पता चलता है कि प्रारंभिक भारत में श्रेणियाँ (śhreṇīs/guilds) केवल व्यापारियों या कारीगरों के संगठन नहीं थीं, बल्कि वे आर्थिक और वित्तीय संस्थाओं के रूप में भी कार्य करती थीं। अभिलेख में धनराशि श्रेणियों के पास जमा किए जाने और उस पर निश्चित ब्याज मिलने का उल्लेख है। इस ब्याज से धार्मिक संस्थाओं के रख-रखाव में सहायता मिलती थी।

इससे पता चलता है कि श्रेणियाँ धन को सुरक्षित रखने, निवेश करने और उससे नियमित आय उत्पन्न करने में सक्षम थीं।

(ख) श्रेणियों पर धन जमा करने के लिए विश्वास क्यों किया जाता था?

उत्तर: श्रेणियाँ संगठित पेशेवर संस्थाएँ थीं और उनके पास आर्थिक गतिविधियों को व्यवस्थित करने की क्षमता थी। वे अपने सदस्यों के व्यावसायिक आचरण, गुणवत्ता और अनुशासन को नियंत्रित करती थीं। वे बैंक, वित्तदाता और ट्रस्टी के रूप में भी कार्य करती थीं।

नासिक अभिलेख में जमा धन पर निश्चित ब्याज देने का उल्लेख मिलता है। इससे संकेत मिलता है कि श्रेणियों पर धन का प्रबंधन करने के लिए पर्याप्त विश्वास किया जाता था।

(ग) दिए गए स्रोत के अनुसार दाता और प्राप्तकर्ता कौन थे?

उत्तर: इस अभिलेख में दाता उषवदात (Uṣhavadāta) थे, जो राजा नहपान के दामाद थे। उन्होंने गुफा को सामान्य रूप से संघ (Saṁgha) को प्रदान किया तथा धनराशि का स्थायी अनुदान भी दिया। इस धन को गोवर्धन की श्रेणियों में जमा किया गया था। प्राप्तकर्ता/लाभार्थी के रूप में संघ तथा उस धन से संबंधित धार्मिक संस्था का उल्लेख मिलता है।

प्रश्न 13. भारत के मानचित्र पर निम्नलिखित महत्वपूर्ण केंद्रों को चिह्नित और नामांकित कीजिए—पाटलिपुत्र, नासिक, उज्जयिनी, विक्रमशिला, कांचीपुरम, मथुरा और राजगृह।

उत्तर: मानचित्र में इन स्थानों को निम्न प्रकार पहचानकर अंकित किया जा सकता है—

  • पाटलिपुत्र: वर्तमान पटना, बिहार
  • नासिक: वर्तमान महाराष्ट्र
  • उज्जयिनी: वर्तमान उज्जैन, मध्य प्रदेश
  • विक्रमशिला: वर्तमान बिहार के भागलपुर क्षेत्र के निकट
  • कांचीपुरम: वर्तमान तमिलनाडु
  • मथुरा: वर्तमान उत्तर प्रदेश
  • राजगृह: वर्तमान राजगीर, बिहार

प्रश्न 14. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर छोटा प्रस्तुतीकरण या पोस्टर तैयार कीजिए।

(क) वैदिक समाज का जीवन

उत्तर: वैदिक समाज में परिवार, ग्राम और जन जैसी सामाजिक-राजनीतिक इकाइयाँ महत्वपूर्ण थीं। राजा जन का प्रमुख संरक्षक था। सभा और समिति जैसी संस्थाएँ सामुदायिक विचार-विमर्श में भूमिका निभाती थीं। समाज में विभिन्न व्यवसाय थे और कृषि, पशुपालन तथा अन्य आर्थिक गतिविधियाँ जीवन का महत्वपूर्ण आधार थीं। धार्मिक जीवन में यज्ञ, प्रार्थना और प्रकृति से जुड़े देवताओं की पूजा का महत्व था। शिक्षा में वेदों के साथ नैतिक मूल्यों और व्यावहारिक ज्ञान पर भी बल दिया जाता था।

(ख) प्रारंभिक शिक्षा प्रणाली (गुरुकुल)

उत्तर: प्रारंभिक भारतीय शिक्षा में गुरु-शिष्य परंपरा का महत्वपूर्ण स्थान था। गुरुकुल में विद्यार्थी गुरु के साथ रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। शिक्षा में वेद, व्याकरण, तर्क, दर्शन, गणित, विज्ञान, चिकित्सा और खगोलशास्त्र के साथ संगीत, नृत्य, चित्रकला, शारीरिक शिक्षा, योग और ध्यान भी शामिल थे। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं बल्कि अच्छे चरित्र, अनुशासन, आत्म-संयम और कर्तव्य-बोध का विकास करना भी था।

(ग) प्रारंभिक भारत में व्यापार और श्रेणियाँ

उत्तर: प्रारंभिक भारत में व्यापार के लिए उत्तरापथ और दक्षिणापथ जैसे मार्ग महत्वपूर्ण थे। विभिन्न नगर और बंदरगाह व्यापारिक नेटवर्क से जुड़े हुए थे। श्रेणियाँ समान व्यवसाय या शिल्प से जुड़े व्यापारियों और कारीगरों के संगठन थे। वे वस्तुओं की गुणवत्ता, कीमत और पेशेवर अनुशासन को नियंत्रित करती थीं। कुछ श्रेणियाँ बैंक, वित्तदाता और ट्रस्टी के रूप में भी कार्य करती थीं। नासिक अभिलेख से पता चलता है कि धन श्रेणियों में जमा किया जाता था और उस पर ब्याज मिलता था।

(घ) प्रारंभिक भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका

उत्तर: प्रारंभिक भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देती है। वैदिक परंपरा में कुछ महिलाओं के विदुषी होने तथा धार्मिक और बौद्धिक गतिविधियों में भाग लेने के उदाहरण मिलते हैं। बाद के कालों में महिलाएँ कृषि, पशुपालन, शिल्प, कताई, मछली पकड़ने, नमक उत्पादन और माला बेचने जैसे कार्यों में भी शामिल थीं। साहित्य में अव्वैयार और वेन्निकुयत्तियार जैसी महिलाओं का उल्लेख मिलता है। प्रभावती गुप्त ने वाकाटक राज्य में रीजेंट के रूप में शासन किया, जबकि चोल काल की सेम्बियन महादेवी ने मंदिर निर्माण और धार्मिक संस्थाओं को समर्थन दिया।

Other Topics List Of This Chapter 1000 ईस्वी तक राज्य और समाज:

Disclaimer:

This website's domain name has included word "CBSE" but here we clearly declare that we and our website have neither any relation to CBSE and nor affliated to CBSE organisation.