Chapter Chapter 4. भारत के विदेश संबंध Class 12 Political Science-II CBSE notes in hindi भारत पाकिस्तान संबंध और भारत की परमाणु निति - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 12 English Medium Political Science-II All Chapters:
Chapter 4. भारत के विदेश संबंध
3. भारत पाकिस्तान संबंध और भारत की परमाणु निति
भारत और चीन के संबंधों में सुधार की शुरुआत : 1962 के युद्ध के बाद भारत और चीन के बीच सबंधों में सुधार होने में लगभग 10 वर्ष लग गए | सुधार के लिए निम्नलिखित प्रयास किये गए |
(i) 1976 में दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक सबंध बहाल किये गए | 1979 में पहली बार शीर्ष नेता के तौर पर पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी ने चीन का दौरा किया |
(ii) राजीव गाँधी ने बतौर प्रधानमंत्री चीन के दौरे पर गए |
(iii) इसके बाद चीन के साथ भारत के सबंधों में ज्यादा जोर व्यापारिक मसलों पर दिया गया |
भारत चीन संबंध को लेकर वामपंथी दलों में टूट : भारत चीन संबंध को लेकर इसका बड़ा असर विपक्षी दलों पर हुआ |
(i) 1962 का भारत चीन युद्ध और चीन-सोवियत संघ के बीच बढ़ते मतभेद से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के अन्दर उठा-पटक मची | इनमे दो खेमे बन गए एक खेमा जो सोवियत संघ का पक्षधर था उसने कांग्रेस से नजदीकी बढाई |
(ii) दूसरा खेमा जो चीन समर्थक था वह खेमा कांग्रेस से नजदीकी के खिलाफ था | जिसके कारण 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी टूट गई और यह खेमा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सी.पी.आई.एम.- माकपा) पार्टी बनाई |
(iii) बहुत से माकपा के नेताओं को चीन का पक्ष लेने के कारण गिरफ्तार किया गया |
राष्ट्रीय एकता और अखंडता के प्रयास : भारत चीन यूद्ध के बाद पूर्वोत्तर की स्थिति थोड़ी डावांडोल होने लगी | राष्ट्रीय एकता और अखंडता की स्थिति चुनौतीपूर्ण थी | इसलिए पूर्वोत्तर में निम्नलिखित कार्य किये गये -
(i) नागालैंड को प्रान्त का दर्जा दिया गया |
(ii) मणिपुर और त्रिपुरा जो पहले से ही केंद्र-शासित प्रदेश थे लेकिन उन्हें अपनी विधान-सभा के निर्वाचन का अधिकार मिला |
पाकिस्तान के साथ युद्ध : पाकिस्तान और भारत के संबंध शुरू से ही कश्मीर को लेकर विवादित रहा है | जो निम्नलिखित है |
(i) 1947 में ही कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच छदम युद्ध शुरू हो गया | यह युद्ध पूर्णव्यापी बने इससे पहले यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र संघ के पाले में चला गया |
(ii) 1965 में एक बार फिर भारत और पाकिस्तान सैन्य-संघर्ष के लिए आमने-सामने थे | उस समय भारत के प्रधान-मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री थे | 1965 के अप्रैल में पाकिस्तान ने गुजरात के कच्छ इलाके के रन में सैनिक हमला बोल दिया | इसके बाद जम्मू-कश्मीर में उसने अगस्त-सितम्बर के महीने में बड़े पैमाने पर हमला किया | पाकिस्तान को विश्वास था की जम्मू-कश्मीर की जनता उनका समर्थन करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ |
(iii) पाकिस्तान की सेना की बढ़त को रोकने के लिए तात्कालिक प्रधान-मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने पंजाब की सीमा की तरफ एक नया मोर्चा खोल दिया | दोनों देशों की सेनाओं के बीच घनघोर लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने बढ़त हासिल करते हुए पाकिस्तान के लाहौर तक पहुँच गई | संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप के बाद इस लड़ाई का अंत हुआ |
(iv) 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक और युद्ध हुआ जिसके परिणाम स्वरुप बंगला देश का निर्माण हुआ | यह युद्ध भी दो मोर्चों पर लड़ा गया | एक राजस्थान की सीमा के पास और दूसरा बंगला देश की सीमा के पास | इस युद्ध मे भारत ने बंगला देश के 'मुक्ति संग्राम' को नैतिक समर्थन और भौतिक सहयता दी थी |
1965 भारत पाकिस्तान युद्ध : 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान को मुँह की खानी पड़ी | जहाँ पाकिस्तान ने गुजरात और जम्मू-कश्मीर में मोर्चा खोला था तो भारत ने भी जबाबी करवाई में पंजाब की सीमा से हमला बोल दिया और भारत की सेना लाहौर तक पहुँच गई | संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से इस लड़ाई का अंत हुआ। बाद में, भारतीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के जनरल अयूब खान के बीच 1966 में ताशकंद-समझौता हुआ। सोवियत संघ ने इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाई। हालाँकि 1965 की लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को बहुत ज्यादा सैन्य क्षति पहुँचाई लेकिन इस युद्ध से भारत की कठिन आर्थिक स्थिति पर और ज्यादा बोझ पड़ा।
ताशकंद समझौता : भारत एवं पाकिस्तान के बीच हुए 1965 के युद्ध को रुकवाने में सोवियत संघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से इस लड़ाई का अंत हुआ। बाद में, भारतीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के जनरल अयूब खान के बीच 1966 में एक रूस के एक शहर ताशकंद में समझौता हुआ जिसे ताशकंद-समझौता के नाम से जाना जाता है ।
ताशकंद समझौता के मुख्य प्रावधान :
(i) दोनों पक्षों का यह प्रयास रहेगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा-पत्र के अनुसार दोनों में मधुर संबंध बने |
(ii) दोनों पक्ष इस बात पर सहमत थे कि दोनों की सेनाएं 5 फ़रवरी 1966 से पहले उस स्थान पर पहुँच जाए, जहाँ वे 5 अगस्त, 1965 से पहले थे |
(iii) दोनों एक दुसरें के विरुद्ध प्रचार नहीं करेंगे |
(iv) दोनों देश एक दुसरे के आन्तरिक विषयों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे |
(v) दोनों देशों के उच्चायुक्त एक-दुसरे के देश में वापिस आयेंगे |
शिमला समझौता और उसके मुख्य प्रावधान :
1972 के युद्ध में पाकिस्तान की बुरी हार के बाद भारत के तात्कालिक प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने पाकिस्तान की हार का कोई अनुचित लाभ न उठाते हुए दोनों देशों की समस्याओं पर विचार करने के लिए जून 1972 में शिमला में एक शिखर सम्मलेन बुलाया | इस सम्मेलन में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री भुट्टो ने श्रीमती इंदिरा गाँधी के बीच 3 जुलाई को एक समझौता हुआ जिसे शिमला समझौता कहते हैं | इस समझौता की प्रमुख बातें निम्नलिखित है |
(i)
कारगिल संघर्ष : 1999 के शुरुआती महीनों में भारतीय इलाके की नियंत्रण सीमा रेखा के कई ठिकानों जैसे द्रास, माश्कोह, काकसर और बतालिक पर अपने को मुजाहिद्दीन बताने वालों ने कब्ज़ा कर लिया था। पाकिस्तानी सेना की इसमें मिलीभगत भाँप कर भारतीय सेना इस कब्जे के खिलाफ हरकत में आयी। इससे दोनों देशों के बीच संघर्ष छिड़ गया। इसे ‘करगिल की लड़ाई’ के नाम
से जाना जाता है। 1999 के मई-जून में यह लड़ाई जारी रही। 26 जुलाई 1999 तक भारत अपने अधिकतर ठिकानों पर पुनः अधिकार कर चुका था। करगिल की लड़ाई ने पूरे विश्व का ध्यान खींचा था क्योंकि इससे ठीक एक साल पहले दोनों देश परमाणु हथियार बनाने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर चुके थे।
सी०टी०बी०टी० : सीटीबीटी का पूरा नाम कॉम्प्रेहेंसिव टेस्ट बैन ट्रीटी अर्थात परमाणु परिक्षण प्रतिबन्ध संधि है |
भारत के सीटीबीटी के विरोध करने का कारण/ भारत के सीटीबीटी पर हस्ताक्षर न करने का कारण :
(i) सीटीबीटी जैसी संधियाँ उन्ही देशों पर लागू होने को थी जो परमाणु शक्ति से हीन थे | इन संधियों के द्वारा परमाणु संपन्न देश को परमाणु शक्ति पर एकाधिकार दी जा रही थी |
(ii) परमाणु संपन्न देशों की निति भेदभावपूर्ण थी, जिसका भारत ने विरोध किया | इस संधि पर हस्ताक्षर करना भारत के हित में नहीं था |
(iii) 1995 में जब परमाणु-अप्रसार संधि को अनियमितकाल के लिए बढ़ा दिया गया तो भारत ने इसका विरोध किया और सीटीबीटी पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया |
(iv) भारत के दो पडोसी देश परमाणु संपन्न है और ये देश भारत पर कई बार हमला कर चुके है इसलिए भारत अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दिया |
बीस वर्षीय शांति और मित्रता संधि
भारत का परमणु संपन्न बनने का कारण:
अथवा
भारत द्वारा परमाणु निति और कार्यक्रम चलाने का कारण:
भारत द्वारा परमाणु निति और कार्यक्रम चलाने के कारण निम्नलिखित है -
(i) आत्मनिर्भर राष्ट्र बनना : विश्व में जितने परमाणु संपन्न राष्ट्र है वे सभी आत्मनिर्भर राष्ट्र माने जाते है | भारत परमाणु उर्जा के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनना चाहता है |
(ii) आत्म-सुरक्षा करना : आज़ादी के बाद से भारत ने 1947, 1962, 1965, 1971 और 1999 का कारगिल युद्ध देख चूका है जिससे भारत को बहुत बड़ी जान-माल की हानि उठानी पड़ी है | ऐसे में भारत की मज़बूरी बन जाती है कि वो अपनी आत्मरक्षा के लिए जरुरी कदम उठाए |
(iii) भारत के पडोसी राष्ट्रों का परमाणु संपन्न होना : भारत के दो प्रमुख पडोसी और प्रतिद्वंदी देश चीन और पाकिस्तान परमाणु संपन्न देश है जिससे भारत कई बार युद्ध कर चूका है | ऐसे देशों से सामंजस्य की स्थिति लाने के लिए जरुरी है कि भारत भी एक परमाणु संपन्न राष्ट्र हो |
(iv) न्यूनतम अवरोध की स्थिति को प्राप्त करना : भारत अपने परमाणु निति और परमाणु हथियारों से दुसरे देशों के आक्रमण की स्थिति से बचने के लिए न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना चाहता है | हमारे पडोसी बार-बार परमाणु हमले की धमकी देते रहते है | ऐसे में भी भारत कभी भी पहले परमाणु हमले की हिमायती नहीं रहा है |
(v) दुसरे शक्तिशाली राष्ट्रों की तरफ शक्ति संपन्न बनना : आज विश्व में जितने भी परमाणु हथियार संपन्न देश है सभी की गिनती शक्तिशाली देशों में होती है | इससे भारत की केन्द्रीय शक्ति मजबूत हुई है ऐसा देखा गया है जब भी भारत की केन्द्रीय शक्ति कंजोर हुई है भारत को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है |
(vi) विश्व समुदाय में प्रतिष्ठा प्राप्त करना : विश्व के लगभग सभी परमाणु संपन्न देशों को आदर और प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता है | भारत भी विश्व बिरादरी में अपनी प्रतिष्ठा को बनना चाहता है |
(vii) परमाणु संपन्न राष्ट्रों की विभेदपूर्ण निति : विश्व के परमाणु संपन्न राष्ट्रों ने 1968 में परमाणु अप्रसार संधि (N.P.T.) तथा 1996 के व्यापक परमाणु निषेध संधि (C.T.B.T.) को इस प्रकार से लागु करना चाहा जिससे कि कोई भी अन्य देश परमणु हथियार न बना सके | भारत ने इन दोनों संधियों को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर विभेदपूर्ण बताया और इस पर हस्ताक्षर नहीं किए और अपने शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को जारी रखा |
भारतीय परमाणु निति की विशेषताएँ :
(i) आत्मनिर्भर राष्ट्र बनना : भारत परमाणु उर्जा के क्षेत्र में सदा से ही आत्म-निर्भर बनने की रही है |
(ii) आत्म-सुरक्षा करना : भारत एक बहुत विशाल देश है और इसकी सुरक्षा एक बहुत बड़ी चुनौती है | इसकी सीमाएँ भी बहुत जटिल है | ऐसे में भारत कई बार युद्ध की मार झेल चूका है | आत्म-रक्षा भारत की परमाणु निति की एक प्रमुख विशेषता है |
(iii) शांतिपूर्ण परमाणु निति और कार्यक्रम : भारत पहले ही कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों से घोषणा कर चूका है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण उदेश्यों के लिए है |
(iv) प्रथम प्रयोग से निषेध : भारत के परमाणु संपन्न राष्ट्रों द्वारा बार-बार परमाणु हमले की धमकी के बावजूद भारत ने पहले परमाणु हमले से निषेध किया है | उसने हमेशा कहा है कि वो कभी भी किसी पर पहले परमाणु हथियारों से हमला नहीं करेगा |