Chapter Chapter 3. नियोजित विकास की राजनीति Class 12 Political Science-II CBSE notes in hindi विकास की बुनियाद - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 12 English Medium Political Science-II All Chapters:
Chapter 3. नियोजित विकास की राजनीति
3. विकास की बुनियाद
विकास की रणनीति के लिए उठाए गए कदम :
(i) भारतीय अर्थव्यवस्था के नियोजन में खाद्यान्न के उत्पादन को बढ़ाने की रणनीति अपनाई गई |
(ii) राज्य ने भूमि-सुधार और ग्रामीण निर्धनों के बीच संसाधन के बँटवारे के लिए कानून बनाए गए |
(iii) नियोजन में सामुदायिक विकास के कार्यक्रम तथा सिंचाई परियोजनाओं पर बड़ी रकम खर्च की बात मानी गई |
विकास को लेकर सरकार की आलोचना :
कुछ ऐसे आलोचक भी थे जो सोंचते थे कि सरकार को जितना करना चाहिए था उतना उसने नहीं किया |
(i) जनता की शिक्षा और स्वास्थ्य के मद में सरकार ने कुछ खास नहीं किया |
(ii) सरकार ने केवल उन्ही क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया जहाँ निजी क्षेत्र जाने के लिए तैयार नहीं थे |
(iii) सरकार ने जरुरत से ज्यदा चीजों पर अपना नियंत्रण रखा जिससे भ्रष्टाचार और अकुशलता बढ़ी है |
(iv) सरकार ने निजी क्षेत्र को मुनाफा कमाने में मदद की |
(v) गरीबों की संख्या में कोई कमी नहीं आई बल्कि गरीबी और बढ़ गई, गरीबों की मदद होनी चाहिए थी |
विकास की बुनियाद : विकास की बुनियाद ढाँचागत संरचना से होती है जिसके लिए भारत के आगामी विकास की बुनियाद पड़ी |
(i) भारत के इतिहास की कुछ सबसे बड़ी विकास-परियोजनाएँ इसी अवधि में शुरू हुई |
(ii) सिंचाई और बिजली-उत्पादन के लिए शुरू की गई भाखड़ा-नांगल और हीराकुंड जैसी विशाल बाँध परियोजनाओं की शुरुआत हुई |
(iii) सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ भरी उद्योग जैसे - इस्पात-संयत्र, तेल-शोधक कारखाने, विनिर्माण इकाइयाँ, रक्षा उत्पादन आदि इसी अवधि में शुरू किए गए |
(iv) परिवहन और संचार के लिए आधारभूत ढाँचे बनाए गए |
भूमि-सुधार के लिए उठाए गए कदम :
कृषि के क्षेत्र में इस दौरान भूमि-सुधार के लिए गंभीर प्रयास किए गए जो निम्नलिखित है -
(i) जमीदारी प्रथा को समाप्त की गई |
(ii) कोई व्यक्ति अधिकतम कितनी जमींन रख सकता है इसके लिए भी कानून बनाए गए |
(iii) जो काश्तकार किसी और की जमीन बटाई पर जोत-बो रहे थे, उन्हें भी ज्यादा क़ानूनी सुरक्षा प्रदान की गई |
(iv) भूमि-सुधार के अनेक प्रस्ताव या तो कानून का रूप नहीं ले सके या कानून बन कर भी कागजों पर बने रहे |
जमींदारी प्रथा समाप्त करने के परिणाम :
(i) चूँकि जमींदारी प्रथा अंग्रेजों के ज़माने से चली आ रही थी, इस कदम से जमीन उस वर्ग के हाथ से मुक्त हुई जिनकी कृषि में कोई दिलचस्पी नहीं थी |
(ii) राजनितिक दबदबा कायम रखने वाले जमींदारों की क्षमता घटी |
(iii) इससे जमीनों के छोटे-छोटे टुकड़ों को एक साथ करने प्रयास किए गए ताकि खेती का काम सुविधाजनक हो सके |
(iv) छोटे किसानों का फायदा हुआ और जमीनों का सही से वितरण हुआ | यह भी तय हुआ की कौन अधिकतम कितनी जमींन रख सकता है |
खाद्य संकट : 1960 के दशक में कृषि की दशा बद से बदतर होती गई | 1965 और 1967 के बीच देश के अनेक हिस्सों में सुखा पड़ा | इसी अवधि में देश ने दो युद्धों का सामना किया और देश विदेशी मुद्रा की कमी से जूझने लगा | इन सभी परिस्थितियों के कारण देश में भारी खाद्यान्न की संकट उत्पन्न हो गई |
खाद्यान्न संकट से उबरने के लिए सरकार द्वारा उठाया गया कदम
अथवा
भारत में हरित क्रांति का कारण :
: खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने एक नई रणनीति अपनाई | जिससे भारत में हरित क्रांति का उद्भव हुआ |
(i) जो इलाके या किसान खेती के मामले में पिछड़े हुए थे, शुरू-शुरू में उन्हें ज्यादा सहयता दी गई थी इस निति को छोड़ कर इन इलाकों में ज्यादा संसाधन लगाने का फैसला किया गया |
(ii) जहाँ सिंचाई सुविधा मौजूद थी वहां के किसान समृद्ध थे, इसलिए वहां सिंचाई से साधन को मजबूत किया गया जहाँ सिंचाई सुविधा नहीं थी |
(iii) सरकार ने उच्च गुणवता के बीज, उर्वरक, कीटनाशक और बेहतर सिंचाई सुविधा बड़े अनुदानित मूल्य पर मुहैया कराया |
(iv) सरकार ने ये भी गारंटी दी की उपज को एक निर्धारित मूल्य पर खरीद लिया जायेगा |
1960 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था में आए बदलाव :
(i) 1960 के दशक में सरकार द्वारा यह फैसला लिया गया कि अर्थव्यवस्था के नियंत्रण और निर्देशन में राज्य और बड़ी भूमिका निभाएगा |
(ii) 1967 के बाद निजी क्षेत्र के उद्योग पर और बाधाएँ आयद हुई | 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया |
(iii) सरकार ने गरीबों की भलाई के लिए अनेक कार्यक्रमों की घोषणा की |
(iv) इन परिवर्तनों के साथ सरकार का विचारात्मक रुझान समाजवादी नीतियों की तरफ बढ़ा |
1960 के दशक में हुए आर्थिक बदलावों के दुस्परिणाम :
(i) सरकार द्वरा नियोजन का कम तो जारी रहा लेकिन इसके महत्व में कमी आई |
(ii) भारत की अर्थव्यवस्था सालाना 3-3.5 प्रतिशत की धीमी रफ़्तार से बढ़ने लगा |
(iii) सार्वजानिक क्षेत्र के उद्योगों में भ्रष्टाचार और अकुशलता बढ़ने लगा |
(iv) नौकरशाही भी आर्थिक विकास में ज्यादा सकारात्मक भूमिका नहीं निभा रही थी |
(v) 1980 के दशक के बाद निति-निर्माताओं ने अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को कम कर दिया |