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Chapter Chapter 3. नियोजित विकास की राजनीति Class 12 Political Science-II CBSE notes in hindi topic-1 - CBSE Study

Chapter Chapter 3. नियोजित विकास की राजनीति Political Science-II Class 12 cbse notes topic-1 in hindi, all chapters and exercises are covered the ncert latest syllabus 2026 - 27.

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Chapter Chapter 3. नियोजित विकास की राजनीति Class 12 Political Science-II CBSE notes in hindi topic-1 - CBSE Study

कक्षा 12 Political Science-II के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण Chapter 3. नियोजित विकास की राजनीति को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक topic-1 को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन Political Science-II में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Class 12 English Medium Political Science-II All Chapters:

Chapter 3. नियोजित विकास की राजनीति

1. topic-1

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नियोजन का अर्थ : नियोजन से अभिप्राय किसी कार्य को व्यवस्थित ढंग से करने के लिए तैयारी है | कुछ विशेष उदेश्यों की प्राप्ति के लिए विधि निर्धारण करना ही नियोजन कहलाता है | 

हडसन के अनुसार नियोजन की परिभाषा : "भावी कार्यक्रम के मार्ग को निश्चित करने के लिए आधार की खोज नियोजन है |"

मिलेट के अनुसार नियोजन की परिभाषा : प्रशासकीय कार्य के उदेश्यों को प्राप्त करना और निर्धारण करने के साधनों पर विचार करना नियोजन कहलाता है | 

हैरिस के अनुसार नियोजन की परिभाषा : आय तथा कीमत के सन्दर्भ की गति में साधनों के बंटवारे को प्राय: नियोजन कहते हैं | 

भारत के विकास का अर्थ : 

(i) आर्थिक संवृद्धि के साथ विकास 

(ii) आर्थिक-सामाजिक न्याय के साथ विकास 

भारत के विकास का मॉडल : 

(i) उदारवादी-पूंजीवादी मॉडल - यह मॉडल यूरोप के अधिकतर देशों और अमेरिका में यह मॉडल अपनाया गया था | 

(ii) समाजवादी मॉडल - यह मॉडल सोवियत रूस में अपनाया था | 

भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल अपनाया जिसमें सार्वजानिक व निजी क्षेत्र दोनों के गुणों का समावेश था | 

राजनितिक टकराव : 

(i) जनता से जुडी समस्याओं पर अंतिम फैसले जन-प्रतिनिधियों को ही लेना चाहिए क्योंकि जन-प्रतिनिधि जनता की भावनाओं को समझते हैं |

(ii) जो फैसले लिए गए उसके राजनितिक परिणाम भी सामने आए |

(iii) राजनितिक फैसलों के लिए राजनितिक दलों से सलाह-मशविरा करना साथ ही जनता की स्वीकृति भी हासिल करना|

(iv) टकराव के पीछे विकास की धारणा का अलग-अलग होना होता है | 

विकास के लिए राजनितिक सहमति : इस बात पर सहमति थी कि आर्थिक विकास और सामाजिक-आर्थिक न्याय को केवल व्यवसायी, उद्योगपति व किसानों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता | सरकार को भूमिका निभानी पड़ेगी | 

विकास की धारणाएँ : 

(i) हर कोई विकास चाहता है परन्तु जनता के विभिन्न तबकों के लिए विकास के अर्थ अलग-अलग है | 

(ii) पश्चिमी देशों के विकास को इस देश में विकास का पैमाना माना गया | 

(iii) विकास का अर्थ था ज्यादा-से-ज्यादा आधुनिक होना और आधुनिक होने का अर्थ था पश्चिमी औद्योगिक देशों की तरह होना | 

(iv) इस तरह के आधुनिकीकरण को संवृद्धि, भौतिक प्रगति और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि का पर्यायवाची माना जाता था | 

(v) इससे विकसित, विकासशील और अविकसित की अवधारणा पैदा हुई | 

भारत में विकास के सोवियत मॉडल के पैरोकार : 

उस वक्त हिंदुस्तान में बहुत से लोग विकास के सोवियत मॉडल से गहरे तौर पर प्रभावित थे | ऐसे लोगों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी और खुद कांग्रेस के नेहरू तक शामिल थे | अमेरिकी तर्ज पर विकास के पूंजीवादी मॉडल के पैरोकार बहुत कम थे | 

विकास के लिए राष्ट्रिय आम सहमति : 

(i) आजाद भारत  की सरकार के आर्थिक सरोकार अंग्रेजी हुकूमत के आर्थिक सरोकारों से एकदम अलग होगी | 

(ii) आजाद भारत की सरकार अंग्रेजी हुकूमत की तरह संकुचित व्यापारिक हितों की पूर्ति के लिए काम नहीं करेगी | 

(iii) गरीबी मिटाने और सामाजिक-आर्थिक पुनर्वितरण के काम का मुख्य जिम्मा सरकार का होगा | 

(iv) कुछ लोग औद्योगीकरण को उचित मानते थे तो कुछ कृषि का विकास करना और ग्रामीण क्षेत्र की गरीबी को दूर करना सर्वाधिक जरुरी मानते थे | 

खुली अर्थव्यवस्था के पैरोकार : कुछ निवेशक मसलन उद्योगपति और बड़े व्यापारिक उद्यमी नियोजन के पक्ष में नहीं थे | वे एक खुली अर्थव्यवस्था चाहते थे जहाँ पूंजी के बहाव में सरकार का कोई अंकुश न हो | लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ | 

बोम्बे प्लान : 1944 में उद्योगपतियों का एक तबका एकजुट होकर देश में नियोजन अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया | इसे बोम्बे प्लान कहा जाता है | 

बोम्बे प्लान का उदेश्य : 

(i) सरकार औद्योगिक तथा अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए | 

(ii) इस तरह चाहे दक्षिणपंथी हो अथवा वामपंथी, उस वक्त सभी चाहते थे कि देश नियोजित अर्थव्यवस्था की राह पर चले | 

(iii) इस समूह ने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया | 

योजना आयोग : भारत के आजाद होते ही योजना आयोग अस्तित्व में आया | प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष बने | भारत अपने विकास के लिए कौन-सा रास्ता और रणनीति अपनाएगा-यह फैसला करने में इस संस्था ने केन्द्रीय और सबसे प्रभावशाली भूमिका निभाई | 

योजना आयोग की कार्यविधि : '

(i) सोवियत संघ की तरह भारत के योजना आयोग ने भी पंचवर्षीय योजनाओं का विकल्प चुना | 

(ii) भारत-सरकार अपनी तरफ से एक दस्तवेज तैयार करेगी जिसमें अगले पांच सालों के ;लिए उसकी आमदनी और खर्च की योजना होगी | 

(iii) इस योजना के अनुसार केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों के बजट को दो हिस्सों में बाँटा गया | 

(iv) एक हिस्सा गैरयोजना-व्यय का था | इसके अंतर्गत सालाना आधार पर दिनदैनिक मदों पर खर्च करना था | दूसरा हिस्सा योजना व्यय था |

प्रथम पंचवर्षीय योजना की विशेषताएँ : (1951-1956) 

(i) यह योजना 1951 से 1956 तक की थी | 

(ii) इसमें ज्यादा जोर कृषि क्षेत्र पर था |

(iii) इसी योजना के अंतर्गत बाँध और सिंचाई के क्षेत्र में निवेश किया गया | 

(iv) भाखड़ा-नांगल जैसी विशाल परियोजनाओं के लिए बड़ी धनराशी आबंटित की गई | 

(v) भूमि सुधार पर जोर दिया गया और इसे देश के विकास के लिए बुनियादी चीज माना गया | 

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