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Chapter 2. अम्ल, क्षार एवं लवण Class 10 Science CBSE notes in hindi लवण - CBSE Study

Chapter 2. अम्ल, क्षार एवं लवण Science Class 10 cbse notes लवण in hindi, all chapters and exercises are covered the ncert latest syllabus 2026 - 27.

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Chapter 2. अम्ल, क्षार एवं लवण Class 10 Science CBSE notes in hindi लवण - CBSE Study

कक्षा 10 Science के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण 2. अम्ल, क्षार एवं लवण को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक लवण को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन Science में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Class 10 English Medium Science All Chapters:

2. अम्ल, क्षार एवं लवण

4. लवण

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लवण (Salts):  

लवण : लवण अम्ल एवं क्षारक के उदासीनीकरण अभिक्रिया का आयनिक उत्पाद है |

(i) अम्लीय लवण : अम्लीय लवण प्रबल अम्ल एवं दुर्बल क्षारक के आपसी अभिक्रिया के फलस्वरूप प्राप्त होता है | 

अम्लीय लवण (Acidic Salt): NH4Cl 

HCl       +    NH4​OH      →     NH4Cl   +   H2
प्रबल अम्ल             दुर्बल क्षारक               अम्लीय लवण  

(ii) उदासीन लवण :  उदासीन लवण प्रबल अम्ल एवं दुर्बल क्षारक के आपसी अभिक्रिया से प्राप्त होता है | 

उदासीन लवण (Neutral Salt): NaCl  

HCl     +    NaOH      →     NaCl     +     H2

प्रबल अम्ल    प्रबल क्षारक      उदासीन लवण  

(iii) क्षारकीय लवण :  क्षारकीय लवण प्रबल क्षारक एवं दुर्बल अम्ल की आपसी अभिक्रिया से प्राप्त  होता है | 

क्षारकीय लवण (Basic Salt): NaC2H3O2 

HC2H3O2    +  NaOH    →   NaC2H3O2   +   H2

दुर्बल अम्ल    प्रबल क्षारक      क्षारकीय लवण  
 

तनुकरण (dilution) : जल में अम्ल या क्षारक मिलाने पर आयन की सांद्रता (H3O+/OH-) में प्रति इकाई आयतन में कमी हो जाती है | इस प्रक्रिया तो तनुकरण कहते हैं | अम्ल और क्षारक को तनुकृत किया जाता है | 

pH स्केल : 

किसी विलयन में उपस्थित हाइड्रोजन आयन की सांद्रता ज्ञात करने के लिए एक स्केल विकसित किया गया है जिसे pH स्केल कहते हैं | इस स्केल में 1 से 14 तक अंक अंकित रहते है जो किसी अम्ल या क्षारक की प्रबलता और दुर्बलता के साथ-साथ उनके मान की बताता है | 

यह एक प्रकार का सार्वत्रिक सूचक होता है | 

  • हाइड्रोनियम आयन की सांद्रता जीतनी अधिक होगी उसका pH उतना ही कम होगा | 
  • किसी भी उदासीन विलयन के pH का मान 7 होगा | 
  • यदि pH स्केल में किसी विलयन का मान 7 से कम है तो यह अम्लीय होगा | 7 से कम होने पर H+ आयन की सांद्रता बढती  है | अर्थात अम्ल की शक्ति बढ़ रही है | 
  • यदि pH का मान 7 से अधिक है वह क्षार होगा | 7 से अधिक होने पर OH- की सांद्रता बढती है अर्थात क्षारक की शक्ति बढ़ रही है |  

प्रबल अम्ल : जिस विलयन में अधिक संख्या में H+ आयन उत्पन्न करने वाले अम्ल प्रबल अम्ल कहलाते हैं | 

दुर्बल अम्ल: जबकि कम H+ आयन उत्पन्न करने वाले अम्ल दुर्बल अम्ल कहलायेंगे | 

प्रबल क्षारक : जिस विलयन में OH- आयन अधिक संख्या में होते हैं उसे प्रबल क्षारक कहते हैं |

दुर्बल क्षारक : जिस विलयन में OHसंख्या में होते हैं उन्हें दुर्बल क्षारक कहते हैं |

  • हमारा रक्त 7.35 - 7.45 pH परास के बीच कार्य करता है जो औसतन pH मान 7.4 होता है |
  • यदि रक्त का pH मान 7.45 से अधिक हो जाता है ऐसी अवस्था का एल्केलोसिस (alkalosis) कहते है और यदि रक्त का pH का मान 7.35 से कम हो जाता है, ऐसी अवस्था को एसिडोसिस (acidosis) कहते हैं | 

दैनिक जीवन में pH का महत्व : 

(i) रक्त और हमारा शरीर : हमारा शरीर 7.0 से 7.8 pH परास के बीच कार्य करता है। जीवित प्राणी केवल संकीर्ण pH परास (परिसर) range में ही जीवित रह सकते हैं। वर्षा के जल की pH मान जब 5.6 से कम हो जाती है तो वह अम्लीय वर्षा कहलाती है।

अम्लीय वर्षा के हानियाँ : अम्लीय वर्षा का जल जब नदी में प्रवाहित होता है तो नदी के जल के pH का मान कम हो जाता है। ऐसी नदी में जलीय जीवधारियों की उत्तरजीविता कठिन हो जाती है।

(ii) मिटटी की अम्लीयता : कई बार किन्ही कारणों से अथवा अम्लीय वर्षा के कारण मिटटी का pH मान कम हो जाने से इस भूमि से अच्छी उपज नहीं मिलती है, चूँकि अच्छी उपज के लिए पौधों को एक विशिष्ट pH परास की आवश्यकता होती है | मिटटी में अम्लीय गुण बढ़ जाने से पौधों को नुकसान पहुँचता है, जिससे फसल अच्छी नहीं होती है |

मिटटी के pH परास को ठीक करने से उपाय : मिटटी के अम्लीयता ख़त्म करने के लिए मिटटी में चाकपाउडर या चूना मिलाया जाता है ताकि इसकी अम्लीयता ख़त्म करके मिटटी की प्रकृति क्षारीय बन जाय | 

(iii) अम्लीय माध्यम में भोजन का पचना : pH का महत्व हमारे आमाशय से उत्पन्न हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) से भी है | यह भी एक विशिष्ट pH पर उदर (पेट) को बिना हानि पहुँचाये भोजन के पाचन में सहायता करता है | समान्यत: हमारा उदर का pH परास लगभग 1.5 - 3.5 के बीच कार्य करता है | इनमें भी ये निम्न दो स्थितियाँ होती हैं |

(a) अल्प अम्लता (Hypoacidity) : कुछ व्यक्तियों में HCl का स्राव बहुत कम होता है जिससे उनके भोजन नहीं पचता अथवा कम पचता है | ऐसी अवस्था को अल्प-अम्लता (अपच) कहते है | ऐसे व्यक्ति को अपने भोजन के साथ अम्लीय पदार्थ जैसे निम्बू या सिरका लेना पड़ता है, अथवा पाचक-रस उत्पन्न करने वाली औषधीयाँ लेना पड़ता है |

(b) अति-अम्लता (Hyperacidity) : उदर में अत्यधिक अम्ल उत्पन्न होने की स्थिति में व्यक्ति उदर में दर्द एवं जलन का अनुभव करता है | इस दर्द या जलन से मुक्त होने के लिए ऐन्टासिड (antacid) लेना पड़ता है | 

Antacid (प्रति-अम्ल औषधि) : ऐन्टासिड अम्ल के प्रभाव को कम करने वाले दुर्बल क्षारक होते है | जैसे - मिल्क ऑफ़ मैग्नेशिया (मैग्नेशियम हाइड्रोऑक्साइड), एल्युमीनियम हाइड्रोऑक्साइड तथा सोडियम हाइड्रोऑक्साइड जैसे दुर्बल क्षारक ऐन्टासिड के संघटक में शामिल होते है | ये अम्लीय प्रभाव को उदासीन कर देते हैं |

(iv) दन्त-क्षय (tooth-caries/tooth-decay) : समान्यत: मुँह का pH 5.5 रहता है | यदि इसका मान 5.5 से कम हो जाए तो दन्त-क्षय प्रारंभ हो जाता है | दाँतों का इनैमल (दत्तवल्क) कैल्शियम फोस्फेट का बना होताहै जो शरीर का सबसे कठोर पदार्थ है | यह दाँतों की बाहर से बचाव करता है | जब मुँह का pH 5.5 से कम हो जाता है तो यह धीरे-धीरे संक्षारित होने लगता है | 

मुँह का pH कम होने का कारण : जब हम भोजन या कोई मीठी चीज खाते हैं तो भोजन के पश्चात् मुँह में अवशिष्ट शर्करा एवं खाद्य पदार्थ रह जाते है जिस पर मुँह में उपस्थित बैक्टीरिया उसका निम्नीकरण करते है और उससे अम्ल उत्पन्न करते है | यह अम्ल इनेमल को नष्ट कर देता है जो दंत-क्षय का प्रमुख कारण बनता है |

दन्त-क्षय से बचाव (Protection from Tooth-Decay) : भोजन के बाद मुँह साफ करने से इससे बचाव किया जा सकता है। मुँह की सफाई के लिए क्षारकीय
दंत-मंजन का उपयोग करने से अम्ल की आधिक्य मात्रा को उदासीन किया जा सकता
है जिसके परिणामस्वरूप दंत क्षय को रोका जा सकता है।

क्लोर-क्षार प्रक्रिया (Chlor-Alkali Process) :

जब सोडियम क्लोराइड (साधारण नमक) के जलीय विलयन से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो यह वियोजित होकर सोडियम हाइड्रोऑक्साइड, क्लोरीन गैस और हाइड्रोजन गैस प्रदान करता है | इस प्रक्रिया को क्लोर-क्षार प्रकिया कहते हैं | 

इस प्रक्रिया का रासायनिक समीकरण निम्न है : 

2NaCl(aq) + 2H2O(l) → 2NaOH(aq) + Cl2 (g) + H2(g) 

electrolysis of sodium chloride

सोडियम क्लोराइड का विद्युत अपघटन 

जब सोडियम क्लोराइड के जलीय विलयन से विद्युत प्रवाहित की जाती है तो इसके एनोड से क्लोरीन गैस और कैथोड से हाइड्रोजन गैस उत्पन्न करता है | सोडियम हाइड्रोऑक्साइड विलयन इसके कैथोड के पास बनता है |

क्लोर-क्षार प्रक्रिया के उत्पाद (Products of chlor-alkali Process): 

(1)  सोडियम हाइड्रोऑक्साइड (Sodium Hydroxide)

(2)  क्लोरीन गैस (Chlorine Gas)

(3)  हाइड्रोजन गैस (Hydrogen Gas)

सोडियम हाइड्रोऑक्साइड का उपयोग (Uses of Sodium Hydroxide): 

(i)   इसका उपयोग धातुओं से ग्रीज हटाने के लिए किया जाता है |

(ii)  साबुन और अपमार्जक बनाने में किया जाता है |

(iii)  इसका उपयोग कागज बनाने में भी किया जाता है | 

(iv)  और इसका उपयोग कृत्रिम फाइबर बनाने में किया जाता है | 

क्लोरीन गैस का उपयोग (Uses of Chlorine gas): 

(i)   क्लोरीन गैस का उपयोग जल की स्वच्छता के लिए किया जाता है |

(ii)  स्विमिंग पूल में  

(iii)  PVC, CFCs और कीटाणुनाशक बनाने ने किया जाता है |

(iv)  और इसका उपयोग रोगाणुनाशक बनाने में भी किया जाता है | 

हाइड्रोजन गैस का उपयोग (Uses of hydrogen):

(i)  इसका उपयोग ईंधन के लिए किया जाता है |

(ii)  इसका उपयोग मार्गरीन बनाने के लिए किया जाता है |

(iii) और इसका उपयोग खाद के लिए अमोनिया बनाने के लिए किया जाता है | 

हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का उत्पादन (Production of Hydrochloric acid): क्लोरीन और हाइड्रोजन क्लोर-क्षार प्रक्रिया के महत्वपूर्ण उत्पादन है, जिनका उपयोग हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के उत्पादन में किया जाता है | हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एक महत्वपूर्ण रसायन है जिसका उपयोग निम्न पदार्थों के उत्पादन में किया जाता है |

(i) दवाइयों के निर्माण में,

(ii) सौन्दर्य प्रसाधन के निर्माण में,

(iii) अमोनियम क्लोराइड के निर्माण में और

(iv) इस्पात के सफाई के लिए प्रयोग होता है | 

विरंजक चूर्ण का उत्पादन (Production of Bleaching powder): क्लोर-क्षार प्रक्रिया से प्राप्त क्लोरीन और सुखे बुझे हुए चूने की क्रिया से विरंजक चूर्ण का निर्माण होता है | 

इस प्रक्रिया का रासायनिक समीकरण निम्नलिखित है : 

Ca(OH)2 + Cl2 → CaOCl2 + H2O

विरंजक चूर्ण का उपयोग (Used of Bleaching powder) :

(i) वस्त्र उद्योग में सूती एवं लिनेन के विरंजन के कागज़ की पैफक्ट्री में लकड़ी के मज्जा एवं लाउंड्री में साफ कपड़ों के विरंजन के लिए
(ii) कई रासायनिक उद्योगों में एक उपचायक के रूप में, एवं
(iii) पीने वाले जल को जीवाणुओं से मुक्त करने के लिए रोगाणुनाशक के रूप में 

बेकिंग सोडा का उत्पादन (Production of Baking soda): 

इस यौगिक का रासायनिक नाम सोडियम हाइड्रोजनकार्बोनेट (NaHCO3) है। कच्चे पदार्थों में सोडियम क्लोराइड का उपयोग कर इसका निर्माण किया जाता है।.

इसका रासायनिक समीकरण निम्न है :  

NaCl + H2O + CO2 + NH3 →  NH4Cl + NaHCO3

                       (अमोनियम क्लोराइड)     (सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट) 

इस प्रकिया के दो महत्वपूर्ण उत्पाद है (i) अमोनियम क्लोराइड और (ii) बेकिंग सोडा 

बेकिंग सोडा का उपयोग :

(i) सोडा का उपयोग आमतौर पर रसोईघर में स्वादिष्ट खस्ता पकौड़े बनाने के लिए किया जाता है।

(ii) कभी-कभी इसका उपयोग खाने को शीघ्रता से पकाने के लिए भी किया जाता
है। 

(iii) यह एक दुर्बल क्षारक भी है जिसका उपयोग कई बार अति-अम्लता की स्थिति में की जाती है | यह ऐन्टैसिड का संघटक भी है |

(iv) इसका उपयोग सोडा-अम्ल अग्निशामक में भी किया जाता है | 

(v) इसका उपयोग बेकिंग पाउडर को बनाने में किया जाता है |  

खाना पकाते समय जब इसे गर्म किया जाता है तो निम्न अभिक्रिया होती है : 

बेकिंग पाउडर का निर्माण : बेकिंग सोडा एवं टार्टरिक अम्ल जैसा मंद खाध्य अम्ल के मिश्रण से बेकिंग पाउडर का निर्माण होता है | 

जब बेकिंग पाउडर को जल में मिलाकर गर्म किया जाता है तो यह कार्बन डाइऑक्साइड जल और अम्ल का सोडियम लवण प्रदान करता है जिसकी निम्न अभिक्रिया होती है :

NaHCO3 + H+  CO2 + H2O + अम्ल का सोडियम लवण  

इस अभिक्रिया से कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होता है जो ब्रेड या केक को फुलाने, स्पोंजी बनाने या मुलायम बनाता है |

धोने का सोडा का निर्माण : 

बेकिंग सोडा को गर्म करके सोडियम कार्बोनेट प्राप्त किया जा सकता है। सोडियम कार्बोनेट के पुनः क्रिस्टलीकरण से धोने का सोडा प्राप्त होता है। यह भी एक क्षारकीय लवण है। निर्माण का सूत्र है - 

धोने का सोडा का उपयोग: 

धोने के सोडे के उपयोग निम्नलिखित है - 
(i) सोडियम कार्बोनेट का उपयोग काँच, साबुन एवं कागज़ उद्योगों में होता है।
(ii) इसका उपयोग बोरेक्स जैसे सोडियम यौगिक के उत्पादन में होता है।
(iii) सोडियम कार्बोनेट का उपयोग घरों में साफ सफाई के लिए होता है।
(iv) जल की स्थायी कठोरता को हटाने के लिए इसका उपयोग होता है।

क्रिस्टलन का जल : लवण के एक सूत्र इकाई में जल के निश्चित अणुओं की संख्या को क्रिस्टलन का जल कहते हैं। 

जैसे - कॉपर सल्फेट के एक सूत्र इकाई में जल के पाँच अणु उपस्थित होते है जलीय कॉपर सल्फेट का रासायनिक सूत्र CuSO4.5H2O है | यही पाँच अणु जल के क्रिस्टलन के जल है | 

जिप्सम (Gypsum) : जिप्सम एक रासायनिक लवण है जिसका रासायनिक सूत्र CaSO4.2H2O है, इसमें दो क्रिस्टलन का जल पाया जाता है | यह एक कठोर पदार्थ है जिसका उपयोग सीमेंट और प्लास्टर ऑफ़ पेरिस में किया जाता है | \

प्लास्टर ऑफ पेरिस का निर्माण:

जिप्सम को 373 k पर गर्म करने पर यह जल के अणुओं का त्याग कर कैल्शियम सल्फेट अर्धहाइड्रेट/हेमिहाइड्रेट (CaSO4 .1/2HO2 ) बनाता है। इसे प्लास्टर ऑफ पेरिस कहते हैं।

प्लास्टर ऑफ पेरिस का उपयोग:

प्लास्टर ऑफ पेरिस का उपयोग निम्नलिखित है - 

(i) प्लास्टर ऑफ पेरिस का उपयोग डॉक्टर टूटी हुई हड्डियों को सही जगह पर स्थिर रखने के लिए करते हैं।

(ii) प्लास्टर ऑफ पेरिस का उपयोग खिलौना बनाने के लिए किया जाता है,
(iii) सजावट का सामान एवं सतह को चिकना बनाने के लिए किया जाता है।

प्लास्टर ऑफ पेरिस का जल से अभिक्रिया: 

प्लास्टर ऑफ पेरिस एक सफ़ेद चूर्ण है जो जल मिलाने पर यह एक कठोर ठोस पदार्थ प्रदान करता है जिसका नाम जिप्सम है |

इस अभिक्रिया का समग्र समीकरण निम्नलिखित है - 

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