Chapter 11. मानव-नेत्र एवं रंगबिरंगी दुनियाँ Class 10 Science CBSE notes in hindi समंजन क्षमता और नेत्र दोष - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 10 English Medium Science All Chapters:
11. मानव-नेत्र एवं रंगबिरंगी दुनियाँ
2. समंजन क्षमता और नेत्र दोष
अध्याय 11. मानव-नेत्र एवं रंगबिरंगी दुनियाँ
समंजन क्षमता (Power of Accommodation): अभिनेत्र लेंस की वह क्षमता जिसके कारण वह अपनी फोकस दूरी को समायोजित कर लेता हैं समंजन क्षमता कहलाती हैं।
ऐसा नेत्र की वक्रता में परिवर्तन होन पर इसकी फोकस दूरी भी परिवर्तित हो जाती हैं । नेत्र की वक्रता बढ़ने पर फोकस दूरी घट जाती हैं। जब नेत्र की वक्रता घटती हैं तो फोकस दूरी बढ़ जाती है।
मानव नेत्र की देखने कि सीमा (Limitation of vision) : 25 सेमी से अनंत तक होती है |
किसी वस्तु की स्पष्ट देखने कि न्यूनतम दुरी 25 सेमी है और स्पष्ट देखने कि अधिकतम सीमा अनंत (infinity) होती है |
निकट बिंदु (Near Point) : वह न्यूनतम दुरी जिस पर रखी कोई वस्तु बिना किसी तनाव के अत्याधिक स्पष्ट देखि जा सकती है, सुस्पष्ट देखने की इस न्यूनतम दुरी को निकट-बिंदु कहते हैं |
समान्यत: देखने कि यह न्यूनतम दुरी 25 सेमी होती है |
अत: हमें किसी वस्तु को स्पष्ट देखने के लिए उसे नेत्र से 25 सेमी दूर रखा जाना चाहिए |
दूर बिंदु (Far Point) : वह दूरतम बिंदु जिस तक कोई नेत्र वस्तुओं को सुस्पष्ट देख सकता है, नेत्र का दूर-बिंदु (Far Point) कहलाता है। सामान्य नेत्र के लिए यह अनंत दूरी पर होता है।
मोतियाबिंद (Cataract) : कभी कभी अधिक उम्र के कुछ व्यक्तियों में क्रिस्टलीय लेंस पर एक धुँधली परत चढ़ जाती है। जिससे लेंस दूधिया तथा धुँधली हो जाता है। इस स्थिति को मातियाबिन्द कहते हैं।
कारण: मोतियाबिंद क्रिस्टलीय लेंस के दूधियाँ एवं धुंधला होने के कारण होता है |
निवारण : इसे शल्य चिकित्सा (surgeory) के द्वारा दूर किया जाता हैं।
दृष्टि दोष : कभी कभी नेत्र धीरे - धीरे अपनी समंजन क्षमता खो देते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति वस्तुओं को आराम से सुस्पष्ट नही देख पाते हैं। नेत्र में अपवर्तन दोषो के कारण दृष्टि धुँधली हो जाती हैं। इसे दृष्टि दोष कहते हैं।
यह समान्यतः तीन प्रकार के होते हैं। इसे दृष्टि के अपवर्तन दोष भी कहा जाता है |
1. निकट - दृष्टि दोष (मायोपिया)
2. दीर्ध - दृष्टि दोष (हाइपरमायोपिया)
3. जरा - दूरदृष्टिता (प्रेसबॉयोपिया)
1. निकट-दृष्टि दोष (Myopia) : निकट-दृष्टि दोष (मायोपिया) में कोई व्यक्ति निकट की वस्तुओं को स्पष्ट देख तो सकता हैं परन्तु दूर रखी वस्तुओं को वह सुस्पष्ट नहीं देख पाता है। ऐसे व्यक्ति का दूर बिन्दु अनंत पर न होकर नेत्र के पास आ जाता हैं । इसमें प्रतिबिम्ब दृष्टि पटल पर न बनकर दृष्टिपटल के सामने बनता है।
कारण:
(i) अभिनेत्र लेंस की वक्रता का अत्याधिक होना | अथवा
(ii) नेत्र गोलक का लंबा हो जाना।
निवारण: इस दोष को किसी उपयुक्त क्षमता के अपसारी (अवतल ) लेंस के उपयोग द्वारा संशोधित किया जा सकता हैं।
निकट-दृष्टि दोष और प्रकाश किरण आरेख द्वारा संशोधन :
निकट-दृष्टि दोष का प्रकाश किरण आरेख :
स्थिति I - हम जानते है कि दूर बिंदु अनंत पर होता है यह एक समान्य स्थिति है |

(i) समान्य स्थिति
स्थिति II - परन्तु इस प्रकार के दोष में दूर बिंदु अनंत पर न होकर नेत्र के पास आ जाता है | तब इस दोष से ग्रसित व्यक्ति नजदीक रखी वस्तुओं को तो देख पाता है परन्तु दूर रखी वस्तु को सुस्पष्ट नहीं देख पाता है | इसका कारण यह है कि दूर बिंदु आँख के पास आ जाता है | इसके कारण प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर प्रतिबिम्ब रेटिना के सामने बनता है | देखिये प्रकाश किरण आरेख (ii)

(ii) निकट-दृष्टि दोष युक्त नेत्र
स्थिति III - निवारण (संशोधन) : इस स्थिति के निवारण के लिए किसी उपयुक्त क्षमता के अपसारी (अवतल ) लेंस के उपयोग द्वारा संशोधित किया जाता हैं।

2. दीर्घ-दृष्टि दोष (Hypermetropia) : दीर्ध - दृष्टि दोष (हाइपरमायोपिया) में कोई व्यक्ति दूर की वस्तुओं को स्पष्ट देख तो सकता हैं परन्तु निकट रखी वस्तुओं को वह सुस्पष्ट नहीं देख पाता है। ऐसे व्यक्ति का निकट बिन्दु समान्य निकट बिन्दू 25 सेमी पर न होकर दूर हट जाता हैं ।इसमें प्रतिबिम्ब दृष्टिपटल पर न बनकर दृष्टिपटल के पीछे बनता है। ऐसे व्यक्ति को स्पष्ट देखने के लिए पठन सामग्री को नेत्र से 25 सेमी से काफी अधिक दूरी पर रखना पडता हैं ।
कारण:
(i) अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी का अत्याधिक हो जाना अथवा
(ii) नेत्र गोलक का छोटा हो जाना।
निवारण: इस दोष को किसी उपयुक्त क्षमता के अभिसारी (उतल ) लेंस के उपयोग द्वारा संशोधित किया जा सकता हैं।
दीर्घ-दृष्टि दोष एवं प्रकाश किरण आरेख द्वारा संशोधन :
दीर्घ-दृष्टि दोष का प्रकाश किरण आरेख :
स्थिति-I : एक समान्य नेत्र का निकट बिंदु 25 सेमी होता है जो इस दृष्टि दोष में 25 सेमी से हट जाता है |

(i) एक समान्य नेत्र का निकट बिंदु
स्थिति-II : ऐसे दृष्टि दोष वाले व्यक्ति का निकट बिन्दु समान्य निकट बिन्दू 25 सेमी पर न होकर दूर हट जाता हैं ।इसमें प्रतिबिम्ब दृष्टिपटल पर न बनकर दृष्टिपटल के पीछे बनता है।

(ii) दीर्घ-दृष्टि दोष युक्त नेत्र
स्थिति-III- एक उपयुक्त क्षमता के संशोधक लेंस द्वारा इस दृष्टि दोष का निवारण किया जाता है |

(iii) उत्तल लेंस द्वारा संशोधन
3. जरा-दूरदृष्टिता (Presbyopia) : आयु में वृद्धि होने के साथ साथ मानव नेत्र की समंजन - क्षमता घट जाती हैं। अधिकांश व्यक्तियों का का निकट बिन्दु दूर हट जाता हैं इस दोष को जरा दूरदृष्टिता कहते है ।
इस दृष्टि दोष में कुछ व्यक्तियों में कई बार दोनों प्रकार के दृष्टि दोष जैसे - निकट-दृष्टि दोष और दीर्घ-दृष्टि दोष पाए जाते हैं |
कारण: इन्हें पास की वस्तुए अराम से देखने में कठिनाई होती हैं।जिसका निम्न कारण है :
(i) यह दोष पक्ष्माभी पेशियों के धीरे धीरे दुर्बल होने के कारण तथा
(ii) क्रिस्टलीय लेंस की लचीलेपन में कमी के कारण उत्पन्न होता हैं ।
निवारण: इसे द्विफोकसी लेंस के उपयोग से दूर किया जा सकता है।
द्विफोकसी लेंस : सामान्य प्रकार के द्विफोकसी लेंसों में अवतल तथा उत्तल दोनों
लेंस होते हैं। ऊपरी भाग अवतल लेंस होता है। यह दूर की वस्तुओं को सुस्पष्ट देखने
में सहायता करता है। निचला भाग उत्तल लेंस होता है। यह पास की वस्तुओं को सुस्पष्ट
देखने में सहायक होता है।
आजकल संस्पर्श लेंस (contact lens) का प्रयोग से दृष्टि दोषों का संशोधन किया जा रहा है |