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Chapter 6. पुनर्गठन का काल Class 7 Social Science Part-1 CBSE notes in hindi Details Notes - CBSE Study

Chapter 6. पुनर्गठन का काल Social Science Part-1 Class 7 cbse notes Details Notes in hindi, all chapters and exercises are covered the ncert latest syllabus 2026 - 27.

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Chapter 6. पुनर्गठन का काल Class 7 Social Science Part-1 CBSE notes in hindi Details Notes - CBSE Study

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Class 7 English Medium Social Science Part-1 All Chapters:

6. पुनर्गठन का काल

2. Details Notes

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पुनर्गठन का काल

परिचय

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन हुए। इस काल में अनेक नए राज्यों और राजवंशों का उदय हुआ। इसलिए इस युग को “पुनर्गठन का काल” कहा जाता है। यह काल भारतीय इतिहास में नई राजनीतिक व्यवस्थाओं, सांस्कृतिक मेल-जोल, व्यापारिक प्रगति और कला के विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

मौर्य साम्राज्य का पतन

सम्राट अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर होने लगा। लगभग 185 ईसा पूर्व में अंतिम मौर्य शासक की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने कर दी। इसके बाद मौर्य साम्राज्य का विघटन हो गया।

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत के विभिन्न क्षेत्रों में नए राज्यों का उदय हुआ। उत्तर-पश्चिम क्षेत्र कमजोर होने के कारण विदेशी आक्रमणों का खतरा भी बढ़ गया।

पुनर्गठन का काल

इस काल में पुराने क्षेत्रों का पुनर्गठन हुआ और नए राज्यों का निर्माण हुआ। विभिन्न राज्य सत्ता और क्षेत्र विस्तार के लिए एक-दूसरे से संघर्ष कर रहे थे।

राज्य अपने पड़ोसी राज्यों से वैवाहिक संबंध भी स्थापित करते थे ताकि राजनीतिक शक्ति बढ़ाई जा सके।

शुंग वंश

पुष्यमित्र शुंग ने शुंग वंश की स्थापना की। उसने उत्तर और मध्य भारत के कुछ भागों पर शासन किया।

पुष्यमित्र शुंग ने स्वयं को शक्तिशाली शासक सिद्ध करने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया।

अश्वमेध यज्ञ

अश्वमेध यज्ञ वैदिक परंपरा का महत्वपूर्ण अनुष्ठान था। इसमें एक घोड़े को स्वतंत्र रूप से विभिन्न क्षेत्रों में घूमने दिया जाता था।

यदि किसी राजा ने घोड़े को रोक लिया तो युद्ध होता था। यदि घोड़ा बिना चुनौती के लौट आता तो यज्ञकर्ता राजा की सर्वोच्चता स्वीकार की जाती थी।

शुंग काल की विशेषताएँ

  • वैदिक परंपराओं का पुनरुत्थान
  • संस्कृत भाषा का विकास
  • कला और वास्तुकला को संरक्षण
  • बौद्ध कला का विकास

महर्षि पतंजलि ने इसी काल में योग सूत्रों का संकलन किया।

भरहुत स्तूप

मध्य प्रदेश का भरहुत स्तूप शुंगकालीन कला का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

इस स्तूप की वेदिकाओं और शिल्पकृतियों में बुद्ध के जीवन से जुड़ी कथाएँ उकेरी गई हैं।

शुंग कला

शुंग काल में मूर्तिकला और सजावटी कला का विकास हुआ। मिट्टी, पत्थर, हाथीदाँत और धातुओं से सुंदर कलाकृतियाँ बनाई गईं।

सातवाहन वंश

सातवाहन दक्षिण भारत का शक्तिशाली राजवंश था। इन्हें “आंध्र” भी कहा जाता था।

सातवाहन साम्राज्य वर्तमान महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में फैला हुआ था।

प्रमुख राजधानियाँ

  • अमरावती
  • प्रतिष्ठान (पैठन)

सातवाहन काल में व्यापार

सातवाहन काल में व्यापार और वाणिज्य बहुत विकसित था।

  • समुद्री व्यापार का विकास
  • रोमन साम्राज्य से व्यापार
  • व्यापारिक मार्गों का विस्तार

निर्यात की प्रमुख वस्तुएँ

  • मसाले
  • वस्त्र
  • चंदन
  • हाथीदाँत
  • मोती

आयात की वस्तुएँ

  • काँच
  • सुगंधित मलहम

सातवाहन सिक्कों पर जहाजों के चित्र मिलते हैं, जो समुद्री व्यापार की उन्नति को दर्शाते हैं।

नानेघाट अभिलेख

नानेघाट गुफाओं का अभिलेख सातवाहन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसमें वैदिक यज्ञों, दान और धार्मिक गतिविधियों का वर्णन मिलता है।

ये अभिलेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गए थे।

सातवाहन समाज

सातवाहन समाज में मातृनाम की परंपरा प्रचलित थी।

गौतमीपुत्र शातकर्णी का नाम उनकी माता गौतमी बलश्री के नाम पर रखा गया था।

गौतमी बलश्री ने बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान दी और महत्वपूर्ण शिलालेख बनवाए।

धर्म और संस्कृति

सातवाहन शासक वैदिक परंपरा के अनुयायी थे लेकिन उन्होंने बौद्ध और जैन धर्म को भी संरक्षण दिया।

भिक्षुओं और विद्वानों को कर-मुक्त भूमि दान दी जाती थी।

कार्ले और पीतलखोरा गुफाएँ

कार्ले गुफाएँ बौद्ध स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन्हें चट्टानों को काटकर बनाया गया था।

पीतलखोरा गुफाएँ अपनी सुंदर मूर्तियों और यक्ष प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध हैं।

सातवाहन साम्राज्य का पतन

तीसरी शताब्दी ईस्वी में सातवाहन साम्राज्य छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया।

इसके मुख्य कारण थे —

  • केंद्रीय शासन की कमजोरी
  • आर्थिक पतन
  • क्षेत्रीय शक्तियों का उदय

चेदि वंश और खारवेल

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद कलिंग में चेदि वंश शक्तिशाली बनकर उभरा।

खारवेल इस वंश के प्रसिद्ध शासक थे। वे जैन धर्म के अनुयायी थे लेकिन सभी मतों का सम्मान करते थे।

उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएँ

भुवनेश्वर के पास स्थित उदयगिरि और खंडगिरि गुफाएँ जैन साधुओं के लिए बनाई गई थीं।

ये गुफाएँ शैलकृत स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

हाथीगुफा अभिलेख

हाथीगुफा अभिलेख में खारवेल की विजयों और जनकल्याण कार्यों का वर्णन मिलता है।

उन्होंने स्वयं को सभी मतों का सम्मान करने वाला शासक बताया।

दक्षिण भारत के राज्य

दक्षिण भारत में चेर, चोल और पांड्य तीन प्रमुख राजवंश थे।

ये राज्य व्यापार, साहित्य और संस्कृति के विकास के लिए प्रसिद्ध थे।

संगम साहित्य

संगम साहित्य दक्षिण भारत का प्राचीनतम साहित्य माना जाता है।

इसमें प्रेम, वीरता, उदारता और सामाजिक जीवन का वर्णन मिलता है।

संगम युग में कवियों की सभाएँ आयोजित की जाती थीं।

चोल वंश

चोल दक्षिण भारत का शक्तिशाली राजवंश था।

राजा करिकाल चोल इस वंश के प्रसिद्ध शासक थे।

उन्होंने चेर और पांड्य शासकों को पराजित कर अपनी शक्ति स्थापित की।

कल्लनई (ग्रैंड एनीकट)

राजा करिकाल ने कावेरी नदी पर “कल्लनई” नामक जल वितरण प्रणाली बनवाई।

इससे सिंचाई व्यवस्था मजबूत हुई और कृषि उत्पादन बढ़ा।

इसी कारण कावेरी डेल्टा क्षेत्र को “दक्षिण का अन्न भंडार” कहा गया।

चेर वंश

चेर शासकों को “केरलपुत्र” भी कहा जाता था।

उन्होंने तमिलनाडु और केरल के पश्चिमी भागों पर शासन किया।

उनकी राजधानी वंजी थी।

चेरों की विशेषताएँ

  • रोमन साम्राज्य से व्यापार
  • मसाले और हाथीदाँत का निर्यात
  • संगम कवियों को संरक्षण

पांड्य वंश

पांड्य शासकों की राजधानी मदुरै थी।

यह राज्य मोतियों और समुद्री व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।

ग्रीक लेखक मेगस्थनीज ने पांड्य राज्य को समृद्ध और सुशासित बताया है।

पांड्य शासकों ने कला, व्यापार और नौसैनिक शक्ति को बढ़ावा दिया।

इंडो-ग्रीक आक्रमण

उत्तर-पश्चिम भारत में इंडो-ग्रीक शासकों का आगमन हुआ।

ये यूनानी शासक भारतीय संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित हुए।

भारतीय और यूनानी संस्कृतियों के मेल से नई सांस्कृतिक परंपराएँ विकसित हुईं।

हेलियोडोरस स्तंभ

विदिशा के निकट स्थित हेलियोडोरस स्तंभ भारतीय और यूनानी सांस्कृतिक मेल का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

इस स्तंभ के अभिलेख में वासुदेव की स्तुति की गई है।

कला और संस्कृति का विकास

इस काल में मूर्तिकला, वास्तुकला, साहित्य और व्यापार में उल्लेखनीय प्रगति हुई।

विभिन्न संस्कृतियों के मेल से भारतीय संस्कृति और अधिक समृद्ध हुई।

निष्कर्ष

पुनर्गठन का काल भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण चरण था। इस काल में नए राज्यों, व्यापार, कला, साहित्य और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का व्यापक विकास हुआ। शुंग, सातवाहन, चेदि, चोल, चेर और पांड्य जैसे राजवंशों ने भारतीय सभ्यता को नई दिशा प्रदान की।

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