Chapter Chapter 10. उपनिवेशवाद और देहात Class 12 History Part-3 CBSE notes in hindi अतिरिक्त प्रश्न उत्तर - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 12 English Medium History Part-3 All Chapters:
Chapter 10. उपनिवेशवाद और देहात
3. अतिरिक्त प्रश्न उत्तर
महत्वपूर्ण प्रश्न–उत्तर
अध्याय 1 : उपनिवेशवाद और देहात
विषय : इस्तमरारी (स्थायी) बंदोबस्त
प्रश्न 1. इस्तमरारी (स्थायी) बंदोबस्त क्या था?
इस्तमरारी बंदोबस्त सन् 1793 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बंगाल में लागू की गई भू-राजस्व व्यवस्था थी। इसके अंतर्गत प्रत्येक जमींदार पर राजस्व की एक स्थायी और निश्चित राशि तय कर दी गई थी। यदि कोई जमींदार समय पर राजस्व नहीं चुका पाता था तो उसकी जमींदारी नीलाम की जा सकती थी।
प्रश्न 2. इस्तमरारी बंदोबस्त लागू करने के पीछे औपनिवेशिक सरकार के उद्देश्य क्या थे?
- 1770 के दशक तक बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था अकाल और घटती कृषि पैदावार के कारण संकट में थी।
- सरकार का मानना था कि कृषि और व्यापार का विकास तभी संभव है जब संपत्ति अधिकार दिए जाएँ।
- राजस्व को स्थायी करने से कंपनी को नियमित आय प्राप्त होगी।
- एक धनी और वफादार भूस्वामी वर्ग का निर्माण करना जो ब्रिटिश शासन का समर्थक हो।
प्रश्न 3. बर्दवान की नीलामी की घटना का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
1797 में बर्दवान के राजा की संपत्तियों की सार्वजनिक नीलामी की गई क्योंकि वह राजस्व का भुगतान नहीं कर सका था। बाद में यह पाया गया कि नीलामी में 95 प्रतिशत से अधिक खरीदार राजा के अपने ही नौकर या एजेंट थे। इससे स्पष्ट होता है कि नीलामी प्रक्रिया फर्जी थी और इस्तमरारी बंदोबस्त व्यवहार में असफल रहा।
प्रश्न 4. इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद जमींदारों की स्थिति कैसी हो गई?
- राजा और ताल्लुकदार जमींदार कहलाने लगे।
- जमींदार भूमि का वास्तविक मालिक नहीं बल्कि राजस्व संग्राहक मात्र था।
- राजस्व न देने पर जमींदारी नीलाम की जा सकती थी।
प्रश्न 5. जमींदार राजस्व का भुगतान क्यों नहीं कर पा रहे थे?
- प्रारंभिक राजस्व माँग बहुत अधिक थी।
- 1790 के दशक में कृषि उपज की कीमतें बहुत कम थीं।
- फसल अच्छी हो या खराब, राजस्व देना अनिवार्य था।
- सूर्यास्त विधि के कारण नियम अत्यंत कठोर थे।
प्रश्न 6. सूर्यास्त विधि क्या थी?
सूर्यास्त विधि के अनुसार यदि जमींदार निर्धारित तिथि को सूर्यास्त तक राजस्व का भुगतान नहीं करता था तो उसकी जमींदारी नीलाम की जा सकती थी। यह नियम जमींदारों के लिए अत्यंत कठोर और हानिकारक सिद्ध हुआ।
प्रश्न 7. औपनिवेशिक सरकार ने जमींदारों पर नियंत्रण रखने के लिए क्या कदम उठाए?
- जमींदारों की निजी सेनाएँ भंग कर दी गईं।
- सीमा शुल्क समाप्त कर दिए गए।
- न्याय और पुलिस की शक्तियाँ जमींदारों से छीन ली गईं।
- कलेक्टर का कार्यालय सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया।
प्रश्न 8. रैयतों (किसानों) और जमींदारों के संबंधों की व्याख्या कीजिए।
खराब फसल और कम कीमतों के कारण रैयतों के लिए अपनी देय राशि का भुगतान करना कठिन हो जाता था। कई बार रैयत जानबूझकर भी भुगतान में देरी करते थे। जोतदार और मंडल जैसे धनवान रैयत जमींदारों से अधिक शक्तिशाली हो गए। न्यायिक प्रक्रिया लंबी होने के कारण जमींदार किसानों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रख पाते थे।
प्रश्न 9. क्या इस्तमरारी बंदोबस्त सफल रहा? कारण दीजिए।
नहीं, इस्तमरारी बंदोबस्त सफल नहीं रहा। इससे न तो कृषि में सुधार हुआ और न ही ग्रामीण समृद्धि आई। इसके विपरीत किसानों और जमींदारों दोनों की स्थिति खराब हो गई और ग्रामीण असंतोष बढ़ा।
प्रश्न 1. इस्तमरारी (स्थायी) बंदोबस्त क्या था?
इस्तमरारी बंदोबस्त सन् 1793 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बंगाल में लागू की गई भू-राजस्व व्यवस्था थी। इसके अंतर्गत प्रत्येक जमींदार पर राजस्व की एक स्थायी और निश्चित राशि तय कर दी गई थी। यदि कोई जमींदार समय पर राजस्व नहीं चुका पाता था तो उसकी जमींदारी नीलाम की जा सकती थी।
प्रश्न 2. इस्तमरारी बंदोबस्त लागू करने के पीछे औपनिवेशिक सरकार के उद्देश्य क्या थे?
- 1770 के दशक तक बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था अकाल और घटती कृषि पैदावार के कारण संकट में थी।
- सरकार का मानना था कि कृषि और व्यापार का विकास तभी संभव है जब संपत्ति अधिकार दिए जाएँ।
- राजस्व को स्थायी करने से कंपनी को नियमित आय प्राप्त होगी।
- एक धनी और वफादार भूस्वामी वर्ग का निर्माण करना जो ब्रिटिश शासन का समर्थक हो।
प्रश्न 3. बर्दवान की नीलामी की घटना का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
1797 में बर्दवान के राजा की संपत्तियों की सार्वजनिक नीलामी की गई क्योंकि वह राजस्व का भुगतान नहीं कर सका था। बाद में यह पाया गया कि नीलामी में 95 प्रतिशत से अधिक खरीदार राजा के अपने ही नौकर या एजेंट थे। इससे स्पष्ट होता है कि नीलामी प्रक्रिया फर्जी थी और इस्तमरारी बंदोबस्त व्यवहार में असफल रहा।
प्रश्न 4. इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद जमींदारों की स्थिति कैसी हो गई?
- राजा और ताल्लुकदार जमींदार कहलाने लगे।
- जमींदार भूमि का वास्तविक मालिक नहीं बल्कि राजस्व संग्राहक मात्र था।
- राजस्व न देने पर जमींदारी नीलाम की जा सकती थी।
प्रश्न 5. जमींदार राजस्व का भुगतान क्यों नहीं कर पा रहे थे?
- प्रारंभिक राजस्व माँग बहुत अधिक थी।
- 1790 के दशक में कृषि उपज की कीमतें बहुत कम थीं।
- फसल अच्छी हो या खराब, राजस्व देना अनिवार्य था।
- सूर्यास्त विधि के कारण नियम अत्यंत कठोर थे।
प्रश्न 6. सूर्यास्त विधि क्या थी?
सूर्यास्त विधि के अनुसार यदि जमींदार निर्धारित तिथि को सूर्यास्त तक राजस्व का भुगतान नहीं करता था तो उसकी जमींदारी नीलाम की जा सकती थी। यह नियम जमींदारों के लिए अत्यंत कठोर और हानिकारक सिद्ध हुआ।
प्रश्न 7. औपनिवेशिक सरकार ने जमींदारों पर नियंत्रण रखने के लिए क्या कदम उठाए?
- जमींदारों की निजी सेनाएँ भंग कर दी गईं।
- सीमा शुल्क समाप्त कर दिए गए।
- न्याय और पुलिस की शक्तियाँ जमींदारों से छीन ली गईं।
- कलेक्टर का कार्यालय सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया।
प्रश्न 8. रैयतों (किसानों) और जमींदारों के संबंधों की व्याख्या कीजिए।
खराब फसल और कम कीमतों के कारण रैयतों के लिए अपनी देय राशि का भुगतान करना कठिन हो जाता था। कई बार रैयत जानबूझकर भी भुगतान में देरी करते थे। जोतदार और मंडल जैसे धनवान रैयत जमींदारों से अधिक शक्तिशाली हो गए। न्यायिक प्रक्रिया लंबी होने के कारण जमींदार किसानों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रख पाते थे।
प्रश्न 9. क्या इस्तमरारी बंदोबस्त सफल रहा? कारण दीजिए।
नहीं, इस्तमरारी बंदोबस्त सफल नहीं रहा। इससे न तो कृषि में सुधार हुआ और न ही ग्रामीण समृद्धि आई। इसके विपरीत किसानों और जमींदारों दोनों की स्थिति खराब हो गई और ग्रामीण असंतोष बढ़ा।