Chapter Chapter 10. उपनिवेशवाद और देहात Class 12 History Part-3 CBSE notes in hindi उपनिवेशवाद और देहात Shorts Notes: - CBSE Study
कक्षा 12 History Part-3 के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण Chapter 10. उपनिवेशवाद और देहात को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक उपनिवेशवाद और देहात Shorts Notes: को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन History Part-3 में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।
CBSE NOTES:
Class 12 English Medium History Part-3 All Chapters:
Chapter 10. उपनिवेशवाद और देहात
2. उपनिवेशवाद और देहात Shorts Notes:
अध्याय 1 : उपनिवेशवाद और देहात
विषय : इस्तमरारी (स्थायी) बंदोबस्त
भारत में प्रथम औपनिवेशिक शासन
औपनिवेशिक शासन सर्वप्रथम बंगाल में स्थापित किया गया था। यही वह प्रांत था जहाँ सबसे पहले ग्रामीण समाज को पुनर्व्यवस्थित करने, भूमि संबंधी अधिकारों की नई व्यवस्था लागू करने तथा एक नई भू-राजस्व प्रणाली स्थापित करने के प्रयास किए गए।
बर्दवान में नीलामी की घटना (1797)
सन् 1793 में इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किया गया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्रत्येक जमींदार के लिए राजस्व की निश्चित राशि तय कर दी। जो जमींदार समय पर राजस्व नहीं चुका पाते थे, उनकी संपत्तियाँ नीलाम कर दी जाती थीं।
1797 में पश्चिम बंगाल के बर्दवान में राजा की संपत्तियों की सार्वजनिक नीलामी की गई। बाद में यह पाया गया कि नीलामी में 95 प्रतिशत से अधिक खरीदार राजा के अपने ही नौकर या एजेंट थे और नीलामी अधिकांशतः फर्जी थी।
इस्तमरारी बंदोबस्त (1793)
इस्तमरारी बंदोबस्त के अंतर्गत ईस्ट इंडिया कंपनी ने जमींदारों पर स्थायी रूप से राजस्व की निश्चित राशि निर्धारित कर दी। समय पर भुगतान न होने की स्थिति में जमींदारी नीलाम की जा सकती थी।
इस व्यवस्था के लागू होने के बाद 75 प्रतिशत से अधिक जमींदारियाँ हस्तांतरित हो गईं।
बंगाल में राजस्व को स्थायी करने के उद्देश्य
- 1770 के दशक तक बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था अकाल और घटती कृषि पैदावार के कारण संकट में थी।
- कृषि और व्यापार का विकास तभी संभव था जब संपत्ति अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ।
- स्थायी राजस्व निर्धारण से कंपनी को नियमित आय की आशा थी।
- सरकार को उम्मीद थी कि एक धनी और वफादार भूस्वामी वर्ग उभरेगा जो कृषि सुधार करेगा।
इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद जमींदारों की स्थिति
- राजाओं और ताल्लुकदारों को जमींदार के रूप में वर्गीकृत कर दिया गया।
- जमींदार भूमि का मालिक नहीं बल्कि राज्य का राजस्व संग्राहक मात्र था।
- राजस्व न देने पर जमींदारी नीलाम की जा सकती थी।
राजस्व भुगतान में जमींदारों की असफलता के कारण
- प्रारंभिक राजस्व माँग बहुत अधिक थी।
- 1790 के दशक में कृषि उपज की कीमतें बहुत कम थीं।
- फसल अच्छी हो या खराब, राजस्व समय पर देना अनिवार्य था।
- सूर्यास्त विधि के अनुसार निश्चित समय तक भुगतान न होने पर जमींदारी नीलाम की जाती थी।
जमींदारों पर औपनिवेशिक नियंत्रण
- जमींदारों की निजी सेनाएँ भंग कर दी गईं।
- सीमा शुल्क समाप्त कर दिए गए।
- न्याय और पुलिस की शक्तियाँ छीन ली गईं।
- कलेक्टर का कार्यालय सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया।
रैयतों (किसानों) के साथ जमींदारों की समस्या
खराब फसल और कम कीमतों के कारण किसान भुगतान नहीं कर पाते थे। कई बार रैयत जानबूझकर भुगतान में देरी करते थे। जोतदार और मंडल जैसे धनवान रैयत जमींदारों से अधिक शक्तिशाली हो गए।
1798 में अकेले बर्दवान जिले में राजस्व बकाया से संबंधित 30,000 से अधिक मामले लंबित थे।
निष्कर्ष
इस्तमरारी बंदोबस्त किसानों और जमींदारों दोनों के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। इससे कृषि सुधार नहीं हो सका और ग्रामीण असंतोष बढ़ा, जो आगे चलकर किसान आंदोलनों का आधार बना।