Chapter Chapter 2. व्यावसायिक संगठन के स्वरुप Class 11 Business Study CBSE notes in hindi Page 1 - CBSE Study
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Chapter 2. व्यावसायिक संगठन के स्वरुप
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व्यवसायिक संगठन का स्वरूप : व्यावसायिक संगठन के स्वरूप का चयन करना व्यवसाय में अत्यंत महत्वपूर्ण है | यदि कोंई व्यक्ति अपना व्यवसाय आरंभ करना चाहता है तो उसे सभी संसाधनों तथा अन्य कारक जैसे जोखिम , गोपनीयता , दायित्व , योग्यता आदि को ध्यान में रखते हुए व्यवसाय के स्वरूप का चयन करना होगा |
व्यवसायिक संगठन के प्रकार :
एकल स्वामित्व
संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय
साझेदारी
सहकारी समिति
संयुक्त पूंजी कंपनी |
1. एकल स्वामित्व : एकल स्वामित्व व्यवसायिक संगठन का एक ऐसा स्वरूप है जिसमें एक ही व्यक्ति के पास उसके व्यवसाय से सम्बंधित सभी प्रकार की शक्तियाँ होती है | यह छोटे व्ययसाय के लिए उपयुक्त है | व्यवसाय में अर्जित लाभ इसका अपना होता है तथा हानि के लिए उतरदायी होता है |
विशेषताएं :
(1)एकल स्वामित्व :एकाकी व्यापार की प्रथम महत्वपूर्ण विशेषता यह है की इस पर एक ही व्यक्ति का स्वामित्व होता है |
(2)एकाकी प्रबंधन :एकाकी व्यापर में स्वामी ही साधारणतः प्रबंधक का कार्य भी करता हैं| प्रबंधको द्वारा किये गए कार्यों के लिए भी वह स्वयं ही उतरदायी होता है |
(3)असीमित दायित्व : एकाकी व्यापारी का दायित्व व्यवसाय में विनियोजित पूंजी से अधिक हो सकता है |यदि व्यवसाय में अधिक हानि हो जाए और व्यवसाय की सम्पति पर्याप्त न हो तो घरेलु सम्पतियों का प्रयोग किया जायेगा |
(4)व्यवसाय के चयन की स्वतंत्रता : एकाकी व्यवसाय अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यवसाय को चुन सकता है व्यवसाय के अन्य स्वरुपों में अनेक लोगो की राय से ही व्यवसाय का चयन सम्भव है |
(5)गोपनीयता : व्यवसाय से संबंधित सभी महत्वपूर्ण बातों की जानकारी केवल स्वामी को ही होती है तथा कोई भी बाहरी पक्षकार इनसे अनुचित लाभ नही उठा सकता |
(6)व्यवसाय का पृथक वैधानिक अस्तित्व नहीं होता : व्यवसाय का व्यवसायी से अलग कोई भी वैधानिक अस्तित्व नही होता,जो भी सम्पति व दायित्व व्यवसाय के है वे सभी व्यवसायी के ही होता है अत: सभी व्यापारिक गतिविधियों के लिए वह स्वयं ही उतरदायी होगा, न की व्यवसाय |
(7)अविभाजित जोखिम : एकाकी व्यापार के लाभ तथा हानि दोनों का सम्बन्ध केवल स्वामी से होता है |
(8)कुछ विशेष व्यवसायों के लिए उपयुक्त: जहाँ व्यक्तिगत सतर्कता तथा सेवा की जरुरत होती है वहां केवल एकाकी व्यापार ही प्रारंभ किया जा सकता है जैसे- कृषि, बेकरी आदि|
एकाकी स्वामित्व के लाभ:
(1)शीघ्र निर्णय :एकाकी व्यापारी अकेला ही समस्त व्यवसाय को संचालित करता है तथा वह बिना किसी देरी के शीघ्र निर्णय लेकर अपने व्यवसाय को लाभ पहुंचता है|
(2)गोपनीयता का लाभ :व्यवसाय को सफल बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण रहस्यों को छिपा कर रखना जरुरी होता है (२)प्रत्यक्ष प्रेरणा ;एकाकी व्यवसायी को कार्य करना के लिए किसी बहरी प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती वह इस बात से प्रेरित होता है की जितना लाभ होगा वह सारा उसी की झोली में जाता हैं |
(3)व्यकितगत नियंत्रण : व्यापर का अकेला स्वामी ओर सर्वेसर्वा होने के करना एकाकी व्यापारी का व्यवसाय पर नियंत्रण रहता है |
(5)स्थापना में सुगमता:एकाकी व्यापर की स्थापना करना बहुतआसना है क्योंकी इसे लिए किसी प्रकार की वेधानिकाओपचारिता को पूरा करना आवश्यक है
एकाकी स्वामित्व की सीमाए
(1)पूंजी के सीमित साधन:एकाकी व्यापारी में वितीय साधन व्यवसायी किअपनी स्वयं की पूंजी तथा उसके पैसे उधार लेने की क्षमता तक सिमित होते है |
(2)अस्थायी अस्तित्व :एकाकी व्यापर के संचरण में लगातार अनिश्चितता बनी रहती है यदि स्वामी की मृत्यु हो जाये तो व्यवसाय को पूरी तरह बंद ही करना पड़ता है |
(3)असीमित दायित्व :एकीकरण व्यापर की सबसे बड़ी कमी इसमें असीमित दायित्व अथवा अत्यधिक व्यक्तिगत जोखिम का पाया जाना है| असीमित दायित्व का दोष एकाकी व्यापर के विकास में एक बहुत बड़ी बाधा है |
सीमाएँ-
(1) पूंजी के सीमित साधन : एकाकी व्यापार मे वित्तीय साधन व्यवसायी की अपनी स्वंय की पूंजी तथा उसकी रूपया उधार लेने की क्षमता तक सीमित होते है |
(2) अस्थायी अस्तित्व : एकाकी व्यापार के संचालन मे लगातार अनिश्चितता बनी रहती है | यदि किसी आवश्यक कर्यवश या अस्वस्थ होने के कारण एकाकी व्यापारी को अपने व्यापारी को अपने वव्यावसायिक संस्थान से अनुपस्थित रहना पड़ जाए तो कारोबार को या तो कर्मचारियो के छोड़ना पड़ता है या फिर कुछ समय के लिए बंद करना पड़ सकता है | जिसके ग्राहक असंतुष्ट होकर दुसरे दुकानदारो से माल खरीदने लगे है |
(3) असीमित दायित्व : एकाकी व्यापार की सबसे बड़ी कमी इसमें असीमित दायित्व अथवा अत्यधिक व्यक्तिगत जोखिम का पाया जाना है | एकाकी व्यापारी को ही व्यवसाय का सारा जोखिम सहन करना पड़ता है | यदि किसी कारणवश व्यवसाय असफल हो जाए तो व्यवसायी का सब कुछ चला जाता है और यहाँ तक की उसके घर का सामान तक बिक जाता है |
(4) असंतुलित प्रबन्ध : एकाकी व्यापार को व्यसाय में की जाने वाली विभिन क्रियाओं ; जैसे - क्रय, विक्रय, उत्पादन ,वित् , आदि को स्वंय ही करना पड़ता है और प्राय: कोई भी व्यक्ति इतना सक्षम नही हो सकता की इन सभी क्रियाओ को सफलतापूर्वक सम्पन कर ले|
(साझेदारी)
साझेदारी का अर्थ: साझेदारी का मतलब ऐसे व्यवसायिक संगठन से है जिसमें दो या दो से अधिक लोग मिलकर एक ही व्यवसाय को क़ानूनी तरीके से चलाने के लिए सहमत होते है इस प्रकार के व्यवसाय को साझेदारी कहते है|इस में वे सब पूंजी लगते है और लाभ हानि को आपस में बाँटने के लिए सहमत होते है |
साझेदारी के लक्षण तथा विशेषताएँ :
(अ)वैधानिक लक्षण :साझेदारी के वैधानिक लक्षण वे है जिसका वर्णन भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 में किया गया है |
(1) व्यवसाय का होना :दो या दो से अधिक व्यक्तियों के संगठित होने को साझेदारी तभी कहा जाता है यदि वे किसी व्यवसाय को चलाने के लिए सहमत हुआ हो व्यवसाय का वैधानिक होना जरुरी है |
(2) एक से अधिक व्यक्तियों का होना : किसी भी साझेदारी में कम से कम दो व्यक्तियों का होना आवश्यक हैं, क्योकि अकेला व्यक्ति स्वय अपना ही साझेदारी नही हो सकता|
(3) उद्देश्य लाभ कमाना और आपस मैं बांटना :साझेदारी का महत्वपूर्ण लक्ष्य लाभ कमाना और आपस मैं बांटना होता है |कोई भी संस्था जिसका उद्देश्य लाभ कमाना नही है वह क़ानूनी रूप से साझेदारी नही हो सकती |
(4) स्वामी एवं एजेंट का संबंध : स्वामी एवं एजेंट के संबंध का अभिप्राय यह है की जिस प्रकार एक स्वामी अपने एजेंट द्वारा अधिकार क्षेत्र में रहते हुए किये गए अनुबंध के लिय उत्तरदायी होता हैं ,ठीक उसी प्रकार एक साझेदार अपने कार्यो से अन्य समस्त साझेदार को बाध्य कर सकता हैं |
(ब) सामान्य लक्षण : साझेदारी का वह लक्षण जिनका विधान में स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया हैं ,सामान्य लक्षण कहलाते हैं |
(1) असीमित दायित्व : साझेदारी में प्रत्येक साझेदार का दायित्व असीमित होता हैं| साझेदारी के समस्त जिम्मेदारी के लिए प्रत्येक साझेदार संयुक्त व पृथक् दोनों प्रकार से उत्तरदायी होता है|
(2)कोई अलग अस्तित्व नही :साझेदारी का अस्तित्व साझेदारों से अलग नही हो सकता |अस्तित्व साझेदारों से अलग नही हो सकता |
(3)ज्यादा सद्विश्वास :साझेदारों के बीच में ज्यादा सद्विश्वाश होना साझेदारी की नीव है|इस विशेषता के बिना सझेदरी का कोई मतलब नही है |
(4)साझेदारों में अपने हस्तांतरण पर रोक : कोई भी साझेदार फर्म में अपने हित कोकिसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में तब तक हस्तांतरित नही कर सकता जब तक की बचे हुआ सब साझेदार सहमत न हो जाएँ |
साझेदारी के प्रकार
साझेदारी की प्रक्रति के आधार पर इसका विभाजन निम्न प्रकार किया जा सकता है:
(1)सामान्य तथा सीमित साझेदारी :सिमित साझेदारी में साझेदार दो प्रकार के होते है :पहला सामान्य साझेदार और दुसरे विशिष्ट साझेदार |सामान्य साझेदारों का दायित्त्व असीमित होता है जबकि विशिष्ट साझेदारों का सीमित|
(2)ऐच्छिक तथा विशेष साझेदारी :ऐच्छिक साझेदारी अनिश्चितकाल के लिए तथा कोई भी व्यवसाय करने के लिए की जाती है,जबकि विशेष साझेदारी किसी विशेष उद्देश्य के लिए कि जाती है तथा उस पूर्व निश्चित उद्देश्य के पूरा होते ही समाप्त हो जाती है|
(3)वैध तथा अवैध साझेदारी :साझेदारी की स्थापना के लिए भारतीय साझेदारी अधिनियम के अंतर्ग्रत रजिस्टर करना जरुरी नही है फिर भी साझेदारी संघटनों को इस अधिनियम के कानूनों के अंतर्ग्रत काम करना होता है|
साझेदारी की लाभ
स्थापना में आसानी :साझेदारी की स्थापना के लिए किसी तरह कि कनुनी औपचारिकताओं को पूरा करने की जरुरत नही होती|