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Chapter 14. उर्जा के स्रोत Class 10 Science CBSE notes in hindi जैव मात्रा - CBSE Study

Chapter 14. उर्जा के स्रोत Science Class 10 cbse notes जैव मात्रा in hindi, all chapters and exercises are covered the ncert latest syllabus 2026 - 27.

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Chapter 14. उर्जा के स्रोत Class 10 Science CBSE notes in hindi जैव मात्रा - CBSE Study

कक्षा 10 Science के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण 14. उर्जा के स्रोत को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक जैव मात्रा को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन Science में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Class 10 English Medium Science All Chapters:

14. उर्जा के स्रोत

3. जैव मात्रा

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4. जैव-मात्रा 

वे ईंधन जो हमें पादप एवं जंतु उत्पाद से प्राप्त होते है उन्हें जैव-मात्रा कहते हैं | जैसे - लकड़ी, गोबर, सूखे पत्ते और तने आदि | 

  • ये ज्वाला के साथ जलते है | 
  • इन्हें जलाने पर अत्यधिक धुँआ निकालता है | 
  • ये ईंधन अधिक ऊष्मा उत्पन्न नहीं करते है |
  • ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है | 
  • जैव-मात्र ऊर्जा का नवीनीकरणीय स्रोत है | 

चारकोल (काष्ठ कोयला) : जब लकड़ी को वायु कि सीमित आपूर्ति में जलाते हैं to उसमें उपस्थित जल एवं वाष्पशील पदार्थ बाहर निकल जाते हैं तथा इसके अवशेष के रूप में चारकोल रह जाता है | 

चारकोल के गुण: 

(i) चारकोल बिना ज्वाला के जलता है | 

(ii) इससे अपेक्षाकृत कम धुँआ निकलता है |

(iii) इसकी ऊष्मा उत्पन्न करने की दक्षता भी अधिक होती है | 

जैव गैस या गोबर गैस :

जैव गैस का प्रचलित नाम गोबर गैस है क्योंकि इस गैस को बनाने में उपयोग होने वाला मुख्य पदार्थ गोबर है | 

इसकी विशेषता निम्न है : 

  • जैव गैस एक संयंत्र में उत्पन्न किया जाता है | 
  • इस संयंत्र को जैव गैस संयंत्र या गोबर गैस संयंत्र कहते है | 
  • इस गैस का उपयोग ईंधन व प्रकाश स्रोत के रूप में गाँव-देहात में किया जाता है | 
  • यह एक उत्तम ईंधन है क्योंकि इसमें 75 प्रतिशत मेथेन गैस होती है |
  • इसकी तापन क्षमता अधिक होती है | 
  • यह धुँआ उत्पन्न किये बिना जलती है | 
  • इसका उपयोग प्रकाश स्रोत के रूप में भी किया जाता है | 
  • तकनीक के प्रयोग से यह एक सस्ता ईंधन बन गया है | 
  • इससे उत्पन्न शेष बची स्लरी का उपयोग एक उत्तम खाद के रूप में किया जाता है क्योंकि इसमें प्रचुर मात्रा में नाइट्रोजन एवं फोस्फोरस होता है |

बायो गैस का निर्माण : गोबर, फसलों के काटने के पश्चात् बचे अपशिष्ट सब्जियों के अपशिष्ट जैसे विविध पादप तथा वाहित मल जब ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में अपघटित होते है तो बायो-गैस /जैव गैस का निर्माण होता है | 

कर्दम (Slurry): जैव गैस बनाने के लिए मिश्रण टंकी में गोबर तथा जल का एक गाढ़ा घोल डाला जाता है, जिसे कर्दम या स्लरी (Slurry) कहते है | 

संपाचित्र  (digester) : संपाचित्र चारो ओर से बंद एक कक्ष होता है जिसमें ऑक्सीजन नहीं होता है | यह बायो-गैस संयंत्र का सबसे बड़ा एवं प्रमुख भाग होता हैं | इसी भाग में अवायवीय सूक्ष्म जीव गोबर कि स्लरी के जटिल यौगिकों का अपघटन कर देते है |  

                       Bio-gas Digester

बायो गैस निर्माण प्रक्रिया:

मिश्रण टंकी में कर्दम (स्लरी) का डाला जाना 

अवायवीय सूक्ष्म जीवों द्वारा गोबर कि स्लरी के जटिल यौगिकों का अपघटन करना

अपघटन के पश्चात् मीथेन, CO2, हाइड्रोजन तथा हाइड्रोजन सल्फाइड गैसों का उत्पन्न होना 

बनी हुई गैस का गैस टंकी में संचित होना 

प्रक्रम द्वारा शेष बची स्लरी का निर्गम टंकी में इक्कठा होना 

बायो-गैस संयंत्र में बनने वाली गैसें : 

(i) मीथेन (ii)  CO(iii) हाइड्रोजन (iv) हाइड्रोजन सल्फाइड 

जैव-गैस निर्माण से निम्न उदेश्य पूर्ति होती है: 

(i) इसके निर्माण से ऊर्जा का सुविधाजनक दक्ष स्रोत मिलता है | 

(ii) इसके निर्माण से उत्तम खाद मिलती है | 

(iii) इसके निर्माण से अपशिष्ट पदार्थों के निपटारे का सुरक्षित उपाय भी मिल जाता है | 

शेष बची स्लरी का उपयोग: 

(i) इस स्लरी में नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस प्रचुर मात्र में होता है इसलिए यह एक उत्तम खाद के रूप में काम आता है | 

5. पवन ऊर्जा 

आजकल पवन ऊर्जा का उपयोग विद्युत उत्पन्न करने में किया जा रहा है | 

पवन: गतिशील वायु को पवन कहते है | इसलिए इनमें गतिज ऊर्जा होती है और इनमें कार्य करने कि क्षमता होती हैं | 

पवन की उत्पत्ति : सूर्य के विकिरणों द्वारा भूखंडों तथा जलाशयों के असमान तप्त होने के कारण वायु में गति उत्पन्न होती है तथा पवनों का प्रवाह होता है | 

पवन-चक्की : पवन-चक्की एक संयंत्र है जिससे पवन के गतिज ऊर्जा का उपयोग कर विद्युत ऊर्जा बनाई जाती है |

पवन-चक्की की संरचना : पवन-चक्की किसी ऐसे विशाल विद्युत पंखे के समान होती है जिसे किसी दृढ़ आधार पर कुछ ऊँचाई पर खड़ा कर दिया जाता है | 

                         

                                   पवन-चक्की (Wind mill)

पवन-ऊर्जा फार्म : किसी विशाल क्षेत्र में बहुत-सी पवन चक्कियाँ लगाई जाती हैं, इस क्षेत्र को पवन ऊर्जा फार्म कहते हैं | 

पवन चक्की द्वारा व्यापारिक स्तर पर विद्युत निर्माण : 

व्यापारिक स्तर पर विद्युत प्राप्त करने के लिए किसी पवन ऊर्जा फार्म की सभी पवन-चक्कियों को परस्पर (एक दुसरे से ) युग्मित कर लिया जाता है जिसके फलस्वरूप प्राप्त नेट ऊर्जा सभी पवन-चक्कियों द्वारा उत्पन्न विद्युत उर्जाओं के योग के बराबर होती है | 

  • डेनमार्क पवन-ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी है इसलिए इसे पवनों का देश कहते है | यहाँ देश की 25 प्रतिशत से भी अधिक विद्युत की पूर्ति पवन-चक्कियों के विशाल नेटवर्क द्वारा विद्युत उत्पन्न की जाती है | 

पवन -ऊर्जा कि विशेषताएँ : 

(i) पवन ऊर्जा नवीकरणीय  ऊर्जा का एक दक्ष एवं पर्यावरणीय-हितैषी स्रोत है |

(ii) इसके द्वारा विद्युत उत्पादन के लिए बार-बार धन खर्च करने कि आवश्यकता नहीं है | 

पवन ऊर्जा के  उपयोग की सीमाएँ : 

(i) पवन ऊर्जा फार्म केवल उन्ही क्षेत्रों में स्थापित किये जाते है जहाँ वर्ष के अधिकांश दिनों में तीव्र पवन चलती हों | 

(ii) टरबाइन की आवश्यक चाल को बनाए रखने के लिए पवन की चाल 15 km/h से अधिक होनी चाहिए | 

(iii) पवन ऊर्जा फार्म स्थापित करने के लिए एक विशाल भूखंड कि आवश्यकता होती है | 

(iv) 1 MW (मेगावाट) के जनित्र के लिए पवन फार्म की भूमि लगभग 2 हेक्टेयर होनी चाहिए |

(v) पवन ऊर्जा फार्म स्थापित करने के लिए आरंभिक लागत अत्यधिक है | 

(vi) उनके लिए उच्च स्तर के रखरखाव कि आवश्यकता होती है | 

 

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