Chapter Chapter 3. भूमंडलीकृत विश्व का बनना Class 10 History CBSE notes in hindi औद्योगिक क्रांति और विश्व अर्थव्यवस्था - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 10 English Medium History All Chapters:
Chapter 3. भूमंडलीकृत विश्व का बनना
3. औद्योगिक क्रांति और विश्व अर्थव्यवस्था
Chapter 3. भूमंडलीकृत विश्व का बनना
18वीं और 19वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति, जनसंख्या वृद्धि तथा नई आर्थिक नीतियों ने विश्व व्यापार को नई गति दी। उत्पादन बढ़ने के साथ कच्चे माल, श्रमिकों और नए बाजारों की मांग भी तेजी से बढ़ी।
Part 2 – औद्योगिक क्रांति और विश्व अर्थव्यवस्था
इस भाग में औद्योगिक क्रांति, कॉर्न लॉ, कृषि परिवर्तन, श्रमिक प्रवासन तथा विश्व अर्थव्यवस्था के विस्तार का अध्ययन करेंगे।
औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution)
औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन और व्यापार की पूरी व्यवस्था को बदल दिया।
- इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी में ब्रिटेन से हुई।
- हाथ से बनने वाली वस्तुओं का उत्पादन मशीनों से होने लगा।
- कारखानों की संख्या तेजी से बढ़ी।
- उत्पादन लागत कम हुई और वस्तुएँ सस्ती हुईं।
- विश्व व्यापार का विस्तार हुआ।
औद्योगिक क्रांति के प्रभाव
औद्योगिक क्रांति का प्रभाव विश्व की अर्थव्यवस्था और समाज पर व्यापक रूप से पड़ा।
- बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ।
- कच्चे माल की मांग बढ़ गई।
- नए बाजारों की आवश्यकता महसूस हुई।
- रेल, जहाज और संचार साधनों का विकास हुआ।
- शहरीकरण और औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिला।
कॉर्न लॉ (Corn Laws)
कॉर्न लॉ ब्रिटेन में अनाज के आयात पर लगाए गए कानून थे।
- इनका उद्देश्य ब्रिटिश किसानों के हितों की रक्षा करना था।
- विदेशी अनाज पर भारी कर लगाया जाता था।
- इससे खाद्यान्न की कीमतें बढ़ गईं।
- उद्योगपति और मजदूर इन कानूनों के विरोध में थे।
- 1846 में कॉर्न लॉ समाप्त कर दिए गए।
कॉर्न लॉ समाप्त होने के प्रभाव
कॉर्न लॉ समाप्त होने से ब्रिटेन के व्यापार और उद्योग को लाभ मिला।
- विदेशों से सस्ता अनाज आयात होने लगा।
- खाद्यान्न की कीमतों में कमी आई।
- औद्योगिक श्रमिकों का जीवन बेहतर हुआ।
- मुक्त व्यापार (Free Trade) को बढ़ावा मिला।
- विश्व व्यापार का विस्तार तेज हुआ।
कृषि का व्यवसायीकरण
औद्योगिक विकास के साथ कृषि भी व्यापार से जुड़ने लगी।
- नकदी फसलों का उत्पादन बढ़ा।
- कृषि में आधुनिक तकनीकों का उपयोग होने लगा।
- कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ा।
- किसानों का संबंध वैश्विक बाजार से जुड़ गया।
- कृषि उत्पादन का उद्देश्य केवल स्थानीय आवश्यकता नहीं रहा।
श्रमिकों का प्रवासन (Migration of Labour)
रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग एक देश से दूसरे देश जाने लगे।
- यूरोप से लाखों लोग अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया गए।
- भारत और चीन से भी मजदूर अन्य देशों में भेजे गए।
- गन्ना, चाय और रबर के बागानों में श्रमिकों से काम कराया गया।
- अनुबंधित श्रम (Indentured Labour) की व्यवस्था विकसित हुई।
- प्रवासन से विभिन्न देशों की जनसंख्या और संस्कृति प्रभावित हुई।
भारतीय अनुबंधित मजदूर (Indentured Labour)
ब्रिटिश शासन के दौरान हजारों भारतीय मजदूरों को अनुबंध के आधार पर विदेश भेजा गया।
- मॉरीशस, फिजी, त्रिनिदाद, गुयाना और सूरीनाम प्रमुख गंतव्य थे।
- अधिकांश मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु से गए।
- इनसे बागानों और कृषि क्षेत्रों में कार्य कराया गया।
- इनका जीवन कठिन परिस्थितियों में बीतता था।
- आज भी इन देशों में भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं।
विश्व व्यापार का विस्तार
परिवहन और संचार के विकास से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में तेजी आई।
- रेलमार्ग और स्टीमर जहाजों का विकास हुआ।
- स्वेज नहर के खुलने से यूरोप और एशिया की दूरी कम हुई।
- व्यापारिक लागत में कमी आई।
- वस्तुओं का आयात-निर्यात बढ़ा।
- विश्व बाजार पहले की तुलना में अधिक जुड़ गया।
विश्व अर्थव्यवस्था का विकास
19वीं शताब्दी के अंत तक विश्व की अर्थव्यवस्था परस्पर निर्भर हो चुकी थी।
- देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा।
- पूंजी और निवेश का अंतरराष्ट्रीय प्रवाह बढ़ा।
- औद्योगिक देशों का प्रभाव बढ़ा।
- उपनिवेश कच्चे माल के प्रमुख स्रोत बने।
- आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था का विकास हुआ।