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Chapter 4. विचारक, विश्वास और ईमारतें Class 12 History Part-1 [LATEST] Solutions अभ्यास (NCERT Book) in Hindi - CBSE Study

Chapter 4. विचारक, विश्वास और ईमारतें History Part-1 Class 12 exercise - [LATEST] Solutions अभ्यास (NCERT Book) cbse board school study materials like cbse notes in Hindi medium, all chapters and exercises are covered the ncert latest syllabus 2026 - 27.

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Chapter 4. विचारक, विश्वास और ईमारतें Class 12 History Part-1 [LATEST] Solutions अभ्यास (NCERT Book) in Hindi - CBSE Study

NCERT Solutions for Class 12 History Part-1 are carefully prepared according to the latest CBSE syllabus and NCERT textbooks to help students understand every concept clearly. These solutions cover all important Chapter 4. विचारक, विश्वास और ईमारतें with detailed explanations and step-by-step answers for better exam preparation. Each अभ्यास (NCERT Book) is explained in simple language so that students can easily grasp the fundamentals and improve their academic performance. The study material is designed to support daily homework, revision practice, and final exam preparation for Class 12 students. With accurate answers, concept clarity, and structured content, these NCERT solutions help learners build confidence and score higher marks in their examinations. Whether you are revising a specific topic or preparing an entire chapter, this resource provides reliable and syllabus-based guidance for complete success in History Part-1.

Class 12 English Medium History Part-1 All Chapters:

Chapter 4. विचारक, विश्वास और ईमारतें

2. अभ्यास (NCERT Book)

              विचारक, विश्वास और इमारतें

प्रश्न – “ईसा पूर्व प्रथम सहस्त्राब्दी का काल विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है |” न्यायसंगत ठहराइए |

उत्तर - ईसा पूर्व प्रथम सहस्त्राब्दी का काल निम्नलिखित विशेषताओं के कारण विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है –

1. इस काल में जुरथुस्त्र, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटों तथा अरस्तु और भारत में महावीर बुद्ध जैसे कई चिंतको का उदय हुआ |

2. इस काल में गंगा घाटी में नए राज्य तथा नए शहर अस्तित्व में आये |

3. यह काल सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तनों का भी काल था |

प्रश्न – भोपाल राज्य की प्राचीन इमारतों में से सबसे प्राचीन इमारते कौन –सी है ? साँची के स्तूप का पूर्वी तोरणद्वार बाहर जाने से कैसे बचा रहा ?

उत्तर – भोपाल राज्य के प्राचीन अवशेषों में साँची कंखेड़ा की इमारते सबसे अद्दभुत इमारते है | यह गाँव भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व में एक पहाड़ी तलहटी में बसा है | उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोपीय भोपाल में स्थित साँची के स्तूप के प्रति विशेष रूचि रखते थे | इस स्तूप का पूर्वी तोरणद्वार सबसे अच्छी दिशा में था और विदेशियों के लिए आकर्षण का विशेष केंद्र था | फ़्रांसिसी इस तोरंद्वार को फ्रांस के संग्रहालय में ले जाना चाहते थे | इसके लिए उन्होंने शाहजहाँ बेगम से अनुमति माँगी थी | कुछ समय के लिए अंग्रेजो ने भी ऐसे ही प्रयास किये | इस प्रकार मुलकृति भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रही | 

प्रश्न – साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूपों का संक्षेप में वर्णन कीजिए|

उत्तर- साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूप बिना अलंकरण के है| इनमे केवल पत्थर की वेदिकाएँ और तोरणद्वार ही बने हैं| पत्थर की ये वेदिकाएँ किसी बाँस या काठ के घेरे के सम्मान थी| परन्तु चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वार पर खूब नक्काशी की गई थी| उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाई ओर रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे| ऐसा लगता था कि जैसे वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों| बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी |

प्रश्न- समकालीन बौद्ध ग्रंथों में विभिन्न विचारों वाले लोगों से जीवंत चर्चों और विवादों की एक झलक कैसे मिलती हैं? स्पष्ट कीजिए|

उत्तर - समकालीन बौद्ध ग्रंथों में 64 सम्प्रदायों अथवा चिन्तन परम्पराओं का उल्लेख मिलता है | इन परम्पराओं से हमें जीवंत चर्चाओं और विवादों की एक झांकी मिलती है | ये चर्चाएँ कुटागारशालाओ (नुकीली चाट वाली झोपड़ी ) ये ऐसे उपवनो में होती थी जहाँ घुमक्कड़ विचारक ठहरा कर्ते३ थे |

     कई विचारकों ने, जिनमे महावीर और बुद्ध शामिल थे, वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाया | उन्होंने यह माना कि जीवन के दुखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कार सकता है | यह सोच ब्राहमणवाद से बिलकुल भिन्न थी, क्योंकि ब्राह्मणवाद का मानना था कि किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाती और लिंग से निर्धारित होता है | 

प्रश्न- हम बुद्ध की शिक्षाओं के बारे में कैसे जानते है? स्पष्ट कीजिए|

उत्तर - हम बुद्ध की शिक्षाओं को निम्नलिखित साधनों द्वारा जानते थे –

(1) वे मूल बुद्ध ग्रंथ जिनका बड़ी सावधानी से संपादन, विश्लेषण तथा अनुवाद किया है |

(2) महात्मा बुद्ध की जीवन –कथाएँ जिनके आधार पर इतिहासकारों ने अपने जीवन का पुनः चित्रण किया है | इनमे से कई जीवन –चित्रण भगवान् बुद्ध के जीवनकाल से लगभग एक शताब्दी बाद लिखे गए थे |

प्रश्न- महात्मा बुद्ध अथवा बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए|

                        अथवा

“बुद्ध ने अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया|” इस कथन पर प्रकाश डालते हुए जीवन पर उनकी शिक्षाओं को स्पष्ट कीजिये |

उत्तर - महात्मा बुद्ध अथवा बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का संक्षिप्त में वर्णन निम्नलिखित तरिके से किया गया है –

1. बोद्ध दर्शन के अनुसार विश्व अनित्य है | यह लगातार बदल रहा है | यह आत्मविहीन है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी अथवा शाश्वत नहीं है |  

2. इस क्षणभंगुर संसार में दुःख मनुष्य के जीवन को जकड़े हुए है | घोर तपस्या और विषयाशक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य संसार के दुखों से मुक्ति पा सकता है |

3. बौद्ध धर्म की प्रारंभिक परम्पराओं का भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था|

4. बुद्ध का मानना था कि समाज का निर्माण मनुष्य ने किया था न कि ईश्वर ने| इसलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान बनने की सलाह दी | बुद्ध के अनुसार व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश को बदला जा सकता है |

5. बुद्ध ने जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्ति, आत्म –ज्ञान और निर्वाण के लिए सम्यक कर्म पर बदल दिया |

6. बौद्ध ने परंपरा के अनुसार अपने शिष्यों के लिए बुद्ध का अंतिम निर्देश यह था कि;  “तुम सब अपने लिए स्वयं ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हे स्वयं ही अपनी मुक्ति का मार्ग ढूढ़ना है |”

प्रश्न - साँची की मूर्तियों में प्रयुक्त कई प्रतिक या चिन्ह लोक परम्पराओं से पनपे थे | उदहारण दीजिये |

उत्तर – साँची में जानवरों के कुछ बहुत ही सुन्दर उत्कीर्ण पाए गए है | इन जानवरों में हाथी, घोड़े, बन्दर और गाय, बैल शामिल है | ऐसा लगता है कि इन जानवरों का उत्कीर्णन लोगों को आकर्षित करने के लिये किया गया था | जानवरों का मनुष्यों के गुणों के प्रतिक के रूप में भी प्रयोग किया जाता था | उदहारण के लिए हाथी को शक्ति और ज्ञान का प्रतीक माना जाता था | एक अन्य मूर्ति में कमल दल और हथियों के बीच एक महिला को दर्शाया गया है | हाथी उमके ऊपर छिड़क रहे है जैसे कि वे उनका अभिषेक कर रहे हो | यह भी संभव है कि इन मूर्तियों को देखने वाले उपासक इसे माया और गजलक्ष्मी दोनों से ही जोड़ते है |

     कई स्तंभों पर सर्पों को दिखाया गया है | यह प्रतीक भी लोक परम्पराओं से लिया गया प्रतीत होता है जिनका ग्रंथो में बहुत ही कम उल्लेख होता था |

प्रश्न – बौद्ध संघ क्या था ? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताओं |

उत्तर – धीरे –धीरे बौद्ध के शिष्यों की संख्या बहुत अधिक बढ़ गयी | इसलिए उन्होंने संघ की स्थापना की | यह ऐसे भिक्षुओं की एक संस्था थी जो धम्म के शिक्षक बन गए | ये भिक्षु एक सादा जीवन बिताते थे | उनके पास जीवनयापन के लिए अत्यावश्यक चीज़ों के अतिरिक्त कुछ नहीं होता था | उदाहरण के लिए वे दिन में एक बार उपासकों से भोजन दान प्रदान करते थे | इसके लिए वे एक कटोरा रखते थे | क्योकि वे भिक्षा अथवा दान पर निर्भर थे, इसलिए उन्हें भिक्खु कहा जाता था |

संघ में महिलाओं का प्रवेश – शुरू में केवल पुरूष ही संघ में सम्मिलित हो सकते थे | बाद में महिलाओं को भी अनुमति दे दी गयी | संघ में कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाए बन गयी | आगे चलकर वे थेरी बनी जिसका अर्थ है ऐसे महिलाएं जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो |

सभी का सामान दर्जा – बुद्ध के अनुयायी कई सामाजिक वर्गों से संबंध रखते थे | इनमे राजा, धनवान, गृहपति, साधारण लोग जैसे कर्मकार, दास, शिल्पी सभी शामिल थे | सभी का दर्जा सामान माना जाता था क्योंकि भिक्खु और भिक्खुनी बनने पर उन्हें पुराणी पहचान को त्याग देना पड़ता था |

संघ की संचालन पद्धति – संघ की संचालन पद्धति गणों और संघो की परम्परा पर आधारित थी | इसके अनुसार लोग बातचीत द्वारा किसी बात पर एकमत होने का प्रयास करते थे | यदि इस प्रकार उनमे एकमत नहीं हो पाता था, तो मतदान द्वारा निर्णय लिया जाता था |

प्रश्न – छठी शताब्दी ई॰ पूर्व को भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

उत्तर - छठी शताब्दी ई॰ पूर्व को अग्रलिखित कारणों से भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है –

1. इस शताब्दी में वैदिक कर्मकांडों की परम्परा अपनी पकड़ खो बैठी है | लोगों का ध्यान मोक्ष प्राप्ति के नए साधन ढूढने की और आकर्षित हुआ | परिणामस्वरूप समाज में नए दार्शनिक विचारों का प्रतिपादन हुआ |

2. नयी दार्शनिक विचारधारा के परिणामस्वरुप समाज में नए धार्मिक सम्प्रदाए उदित हुए | इनकी संख्या लगभग बासठ थी | फलस्वरूप भारतीय समाज और संस्कृति का रूप बदलने लगा |

3. जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म ने आत्मसंयम तथा तपस्या पर बल दिया |  उनके यह विचार उपनिषदों में दिए गए विचारों के अनुकूल थे | परिणामस्वरूप भारत में उपनिषद दर्शन की लोकप्रियता बढ़ी |

प्रश्न – गौतम बुद्ध पर एक नोट लिखों |

उत्तर- गौतम बुद्ध का जन्म 566 ई॰ में कपिलवस्तु में हुआ | उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था | उनके पिता का नाम शुद्दधोधन तथा माता का नाम महामाया था | गौतम के जन्म के कुछ ही दिनों पश्चात उनकी माता का देहांत हो गया | उनके पिता ने गौतम के लिए एक सुन्दर महल बनवाया, परन्तु महल की चार दिवारी में गौतम का दिल न बहल सका  अतः उनके पिता ने उनका विवाह राजकुमारी यशोधरा के साथ कर दिया | उनके यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ, परन्तु फिर भी वह दुखी रहने लगे | कुछ समय पश्चात गौतम ने रोग, बुढ़ापा, मृत्यु आदि के दृश्य देखे | उन्होंने इन दुखों का कारण जानने के लिए घर –बार त्याग दिया |उन्होंने छः वर्ष तक घोर तपस्या भी की | अंत में वह ‘गया’ के समीप एक वट -वृक्ष के नीचे समाधि लगाकर बैठ गए | चालीस दिन के पश्चात उन्हें सच्चा ज्ञान प्राप्त हुआ और वह ‘बुद्ध’ कहलाये | बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश बनारस के समीप सारनाथ के स्थान पर दिया | यहाँ पर पांच व्यक्ति उनके शिष्य बने | बाद में उनकी शिष्यों की संख्या दी –प्रतिदिन बढ़ती चली गयी | 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर नामक स्थान पर उन्होंने महानिर्वाण प्राप्त किया |               

प्रश्न – वैषणववाद में अनेक अवतारों के इर्द –गिर्द पूजा पद्धतियाँ किस प्रकार विकसित हुई ? व्याख्या कीजिये |

उत्तर – 1. भारत में पौराणिक हिन्दू धर्म का उदय वैषणववाद से हुआ | यह माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव के कारण जब दुनिया में अव्यवस्था और और विनाश की स्थिति हो जाती है तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग –अलग रूपों में अवतार लेते है | संभवतः अलग –अलग अवतार देश के भिन्न –भिन्न हिस्सों में लोकप्रिय थे |

2. इनमे से कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है | अन्य देवताओं की भी मूर्तियाँ बनी | शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में दर्शाया जाता था | परन्तु उन्हें कई बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया है |

3. पुराणों की लोकप्रियता ने भी पौराणिक हिन्दू धर्म के विकास में सहायता पहुँचाई | पुराणों की अधिकतर कहानियाँ आपसी लोगो के मेल –मिलाप से विकसित हुई | पुजारी, व्यापारी और सामान्य स्त्री –पुरुष एक स्थान से दुसरे स्थान पर आते –जाते हुए अपने विश्वासों तथा अवधारणाओं का आदान –प्रदान करते थे | उदहारण के लिए वासुदेव कृष्ण मथुरा प्रदेश के महत्वपूर्ण देवता थे | परन्तु कई शताब्दियों के दौरान उनकी पूजा देश के अन्य प्रदेशों में भी फ़ैल गई |

प्रश्न – “बुद्ध के जीवनकाल में तथा उनकी मृत्यु के पश्चात भी बौद्ध धर्म तेज़ी से फैला |” उक्त कथन का औचित्य निर्धारित कीजिये |

उत्तर - बौद्ध धर्म के तेज़ी से फैलने के मुख्य कारण निमानालिखित है –

1. लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे | वे उस युग में तेज़ी हो रहे सामाजिक बदलावों के कारण उलझन में थे | अब वे कोई नया चाहते थे |

2. बुद्ध धर्म में जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्व दिया जाता था | इस बात से लोग बुद्ध धर्म की और आकर्षित हुए |

3. बुद्ध धर्म के छोटे तथा कमजोर लोगो के प्रति मित्रता एवं करुणा के भाव ने भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया |  

4. बुद्ध संघ में महिलाओं के प्रवेश से बुद्ध धर्म के अनुयायिओं की संख्या काफ़ी वृद्धि हुई |

5. बुद्ध अपने युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे | सैकड़ो वर्षो के दौरान उनके संदेश पूरे उपमहाद्वीप में और उसके बाद मध्यएशिया होते हुए चीन, कौरिया, जापान, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड तथा इंडोनेशिया तक फ़ैल गए |    

प्रश्न – अतीत में कलाकृतियों के अतिरिक्त चित्रकारी भी सम्प्रेषण का एक महत्वपूर्ण माध्यम था | अजंता की चित्रकारी का उदहारण देते हुए स्पष्ट कीजिये |

उत्तर – पत्थर की कलाकृतियाँ लम्बे समय तक सुरक्षित रहती है इसलिए इतिहासकारों को ये आसानी से उपलब्ध हो जाति है | परन्तु अतीत में चित्रकारी जैसे सम्प्रेषण के अन्य माध्यम भी प्रयोग में लाये जाते थे इन चित्रों में जो सबसे अछि दशा में बचे है वे गुफाओं की दीवारों पर बने चित्र है | इनमे अजंता की चित्रकारी बहुत ही प्रशिद्ध है |

     अजंता के चित्र जातकों की कथाओं को दर्शाते है | इनमे राज –दरबार का जीवन, शोभा यात्रा, काम कतरे हुए स्त्री और पुरुष और त्यौहार मानने के चित्र दिखाए गए है | इनमे से कुछ चित्र बिलकुल स्वाभाविक और सजीव लगते है |

प्रश्न – शुरू -शुरू के मंदिरों की मुख्य विशेषताएँ बताईये |

अथवा

प्रारम्भिक मंदिरों की विशेषता बताईये | एलोरा के कैलाश मंदिर का निरम करने के पश्चात उसके मुख्य वास्तुकार ने अपना आश्चर्य किन शब्दों में व्यक्त किया ? लिखिए |

उत्तर – आरंभिक काल में मंदिरों की स्थापत्य कला के विकास के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे –

1. प्राचीन मंदिरों का निर्माण लगभग उसी समय सुरु हुआ जिस समय साँची जैसे स्थानों पर स्तूप विकसित रूप में आ गए थे |

2. शुरु के मंदिर एक कमरे के रूप थे जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था | इनमे एक दरवाजा होता था जिनमे से होकर उपासक मूर्ति पूजा के लिए मंदिर में प्रवेश करते थे |

3. गर्भगृह के ऊपर एक ऊंचा ढाँचा बनाया जाता था, जिसे शिखर कहते थे |

4. मंदिरों की दीवारों पर सुंदर भित्ति –चित्र उत्कीर्ण किये जाते थे |

5. बाद में मंदिर बहुत बड़े हो गए, जिनमे जलापूर्ति की व्यवस्था भी थी |

6. कुछ मंदिर पहाड़ो को काटकर उन्हें खोखला करके बनाये जाते थे |इस मंदिर का निर्माण करने वाले वार्जुकार ने अपना आश्चर्य इन शब्दों में व्यक्त किया – “ हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया |”

प्रश्न – उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप के विद्वानों को प्राचीन भारतीय मूर्तिकला को समझना कठिन क्यों लगा ? उन्होंने इस समस्या के समाधान का प्रयास कैसे किया ?  

उत्तर – उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप के विद्वानों ने जब कुछ देवी –देवताओं की मूर्तियाँ देखी तो वे उनकी पृष्ठभूमि और महत्व को नहीं समझ पाए | कई सिरों तथा हाथों वाली या मनुष्य और जानवरों के रूपों को मिलाकर बनायीं गयी मूर्तियाँ उन्हें विचित्र लगती थी |

कई बार तो उन्हें उस मूर्तियों से घृणा होने लगती थी | फ़िर भी उन्होंने उन विचित्र मूर्तियों को समझने के लिए निम्नलिखित प्रयास किये - 

यूनानी परंपरा से तुलना – विद्वानों ने इन मूर्तियों की तुलना एक परंपरा से की है| यह परंपरा प्राचीन यूनान की कला परम्परा थी | क्योंकि यह विद्वान यूनानी मूर्ति कला से परिचित थे, इसलिए उन्होंने बुद्ध तथा बोधिसत्त की मूर्तियों को भारतीय मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना |

     इस प्रकार यूरोपीय विद्वानों ने इस कला को समझने के लिए एक आम तरीका अपनाया – परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीजों को समझने का प्रयास करना |

प्रश्न भक्ति की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?

उत्तर – किसी भी देवी –देवता के प्रति लगाव को भक्ति कहा जाता है | मौर्येकाल के बाद भक्ति की परंपरा काफी प्रचलित हो गयी | इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थी –

1. भक्ति का मार्ग अपनाने वाले लोग आडम्बरों में विश्वास नहीं रखते थे | वे ईश्वर के प्रति सच्ची लगन और व्यक्तिगत पूजा पर बल देते थे |

2. भक्ति मार्ग अपनाने वालों का यह मानना था कि वे जिन देवी तथा देवताओं की पूजा सच्चे मन से करते है तो वे उसी रूप में दर्शन देते है जिसमे भक्त देखना चाहते है | जैसे – मानव के रूप में या सिंह, पेढ़ या अन्य किसी भी रूप में भी |

3. देवी देवताओं का विशेष सम्मान किया जाता था | इसलिए उनकी मूर्तियों को मंदिरों में स्थापित किया जाता था |

4. भक्ति परंपरा ने चित्रकला, शिल्पकला और स्थापत्यकला के माध्यम से अभिव्यक्ति की प्रेरणा भी दी |

5. भक्ति का मार्ग सबके लिए खुला था – चाहे वे धनी हो या निर्धन, स्त्री हो या पुरुष, ऊँची जाति का हो या निम्न जाति का |

प्रश्न मगध नए नए धार्मिक आंदोलनों का केंद्र क्यों बना ?

उत्तर – छठी शताब्दी ईसा पूर्व को धार्मिक उथल-पुथल का युग माना जाता है, क्योंकि इस शताब्दी में देश में अनेक धार्मिक आंदोलनों का उदय हुआ | इन आंदोलनों का मुख्य केंद्र मगध था | इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे –

1. कृषि मूलक अर्थव्यवस्था का विकास सर्वप्रथम मगध में ही हुआ | यह अर्थव्यवस्था नए धार्मिक आंदोलनों का आधार बनी |

2. मगध राज्य ने व्यापार –वाणिज्य में तेज़ी से उन्नति की | परिणामस्वरूप वैश्यों का महत्त्व बढ़ा और उन्होंने ब्राहमणों के प्रभुत्व की प्रतिक्रिया के रूप में जन्म लेने वाले नए धार्मिक आंदोलनों को प्रभावित किया | 

प्रश्न – “प्रारम्भिक बौद्ध मत में निर्वाण प्राप्त करने के लिए व्यक्तिगत प्रयास को विशेष महत्त्व दिया गया है |” इस कथन की पुष्टि कीजिये |

उत्तर – निर्वाण का अर्थ है – जीवन –मरण के चक्र से मुक्ति | भगवान बुद्ध ने जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्ति तथा आत्म ज्ञान के लिए व्यक्ति के अपने प्रयास तथा सम्यक कर्म की कल्पना की | उनके लिए इसका अर्थ था, अहं और इच्छा का समाप्त हो जाना | जिससे ग्रहस्थी वालों के दुखों के चक्र का अंत हो सकता था | बौद्ध परंपरा के अनुसार उनका अपने शिष्यों के लिए अंतिम निर्देश था, “तुम सब अपने लिए स्वयं ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हे स्वयं ही अपनी मुक्ति का मार्ग ढूढ़ना है |”

प्रश्न बुद्ध और महावीर के वेदों के प्रभुत्व पर दिए गए विचारों का वर्णन कीजिये|

उत्तर - बुद्ध और महावीर के वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाये | माना ब्राहमणवाद के अनुसार किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाति तथा लिंग से निर्धारित होता है | उसके सुख- दुख भी इसी से जुड़े है | बौद्ध परंपरा के अनुसार बुद्ध का अपने शिष्यों के लिए अंतिम निर्देश था, “तुम सब अपने लिए स्वयं ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हे स्वयं ही अपनी मुक्ति का मार्ग ढूढ़ना है |”

    बुद्ध और महावीर ने वैदिक धर्म में प्रचलित पशुबलि का भी विरोध किया और अहिंषा पर बल दिया | उन्होंने यज्ञों को भी कोई महत्व नहीं दिया |

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