Chapter 8. स्थानीय शासन Class 11 राजनितिक विज्ञान-I [LATEST] Solutions अतिरिक्त प्रश्नोत्तर in Hindi - CBSE Study
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Class 11 English Medium राजनितिक विज्ञान-I All Chapters:
Chapter 8. स्थानीय शासन
2. अतिरिक्त प्रश्नोत्तर
अतिरिक्त प्रश्नोत्तर :-
Q1. स्थानीय शासन से क्या अभिप्राय है तथा यह किस प्रकार से आम नागरिकों को फायदा पहुचता है ?
उत्तर : गाँव और जिला स्तर के शासन को स्थानीय शासन कहते हैं। स्थानीय शासन आम आदमी के सबसे नजदीक का शासन है। स्थानीय शासन का विषय है आम नागरिक की समस्याए और उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी।स्थानीय शासन की मान्यता है कि स्थानीय ज्ञान और स्थानीय हित लोकतांत्रिक फैसला लेने के अनिवार्य घटक हैं। कारगर और जन-हितकारी प्रशासन व केलिए भी यह जरुरी है | स्थानीय शासन का फायदा यह है कि यह लोगों के सबसे नजदीक होता है और इस कारण उनकी समस्याओं का समाधन बहुत तेजी से तथा कम खर्च े में हो जाता है |
Q 2. भारत में स्थानीय शासन का विकास कैसे हुआ और हमारे संविधान में इसके बारे में क्या कहा गया है?
उत्तर : स्थानीय शासन वेफ निर्वाचित निकाय सन् 1882 के बाद अस्तित्व में आए। उस वक्त लार्ड रिपन भारत का वायसराय था। उसने इन निकायों को बनाने की दिशा में पहल कदमी की। उसवक्त इसे मुकामी बोर्ड कहा जाता था। बहरहाल, इस दिशा में प्रगति बड़ी धीमी गति से हो रही थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सरकार से माँग की किसी भी स्थानीय बोर्डों को ज्यादा कारगर बनाने के लिए वह जरुरी कदम उठाए। गवर्नमेंट आँफ इंडिया एक्ट-1919 के बनने पर अनेक प्रांतों में ग्राम पंचायत बने। सन् 1935 के गवर्नमेंट आँफ इंडिया एक्ट के बाद भी यह प्रवृत्ति जारी रही।
जब संविधान बना तो स्थानीय शासन का विषय प्रदेशों को सौंप दिया गया।संविधान के ‘नीति निर्देशक-सिद्धांतों में भी इसकी चर्चा है। इसमें कहा गया है कि देश की हर सरकार अपनी नीति में इसे एक निर्देशक तत्व मानकर चले |
Q 3. संविधन के 73वें और 74वें संशोधन को संसद में कब पारित किया गया।तथा यह किस शासन व्यवस्था से जुड़ा हुआ है ?
उत्तर : सन् 1992 में संविधान के 73वें और 74वें संशोधन को संसद ने पारित किया।संविधान का 73वाँ संशोधन गाँव के स्थानीय शासन से जुड़ा है। इसका संबंध् पंचायती राजव्यवस्था की संस्थाओं से है।
संविधान का 74वाँ संशोधन शहरी स्थानीय शासन (नगरपालिका) से जुड़ा है। सन् 1993 में 73वाँ और 74वाँ संशोधन लागू हुए।
Q 4. 73वें संशोधन के कारण पंचायती राज व्यवस्था में आये बदलावों का वर्णन कीजिए |
उत्तर : 73वें संशोधन के कारण पंचायती राज व्यवस्था में आये बदलावों का वर्णन निम्न है :-
त्रि-स्तरीय बनावट
सभी प्रदेशों में पंचायती राज व्यवस्था का ढाँचा त्रि-स्तरीय है। पहली पायदान पर ग्राम पंचायत आती है। ग्राम पंचायत के दायरे में एक अथवा एक से ज्यादा गाँव होते हैं। बीच का पायदान मंडल का है जिसे प्रखंड या तालुका भी कहा जाता है।इस पायदान पर कायम स्थानीय शासन के निकाय को मंडल या तालुका पंचायत कहा जाता है। जो प्रदेश आकार में छोटे हैं वहाँ मंडल या तालुका पंचायत यानी मध्यवर्ती स्तर को बनाने की जरूरत नहीं। सबसे ऊपर वाले पायदान पर जिला पंचायत का स्थान है। इसके दायरे मेंजिले का पूरा ग्रामीण इलाका आता है।
संविधान के 73वें संशोधन में इस बात का भी प्रावधान है कि ग्राम सभा अनिवार्य रूप से बनाई जानी चाहिए। पंचायती हलके में मतदाता के रूप में दर्ज हर वयस्क व्यक्ति ग्राम सभा का सदस्य होता है। ग्राम सभा की भूमिका और कार्य का फैसला प्रदेश के कानूनों से होता है।
चुनाव
पंचायती राज संस्थाओं के तीनों स्तर के चुनाव सीधे जनता करती है। हर पंचायती निकाय की अवधि पाँच साल की होती है। यदि प्रदेश की सरकार पाँच साल पूरे होने से पहले पंचायत को भंग करती है,तो इसके छः माह के अंदर नये चुनाव हो जाने चाहिए। निर्वाचित स्थानीय निकायों के अस्तित्व को सुनिश्चित रखने वाला यह महत्त्वपूण प्रावधान है। संविधान के 73वें संशोधन से पहले कई प्रदेशों में जिला पंचायती निकायों के चुनाव अप्रत्यक्ष रीति से होते थे और पंचायत संस्थाओं को भंग करने के बाद तत्काल चुनाव कराने के संबंध् में कोई प्रावधान नहीं था।
आरक्षण
सभी पंचायती संस्थाओं में एक तिहाई सीट महिलाओं के लिए आरक्षित है। तीनों स्तर पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीट में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। यह व्यवस्था अनुसूचित जाति/जनजातिकी जनसंख्या के अनुपात में की गई है। यदि प्रदेश की सरकार जरुरी समझे, तो वह अन्य पिछड़ा वर्ग को भी सीट में आरक्षण दे सकती है।यह आरक्षण पंचायत के मात्र साधरण सदस्यों की सीट तक सीमित नहीं है। तीनों ही स्तर पर अध्यक्ष पद तक आरक्षण दिया गया है। इसके अतिरिक्त सिर्फ सामान्य श्रेणी की सीटों पर ही महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण नहीं दिया गया बल्कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट पर भी महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण की व्यवस्था है।
Q 5. शहरी इलाका किसे कहते हैं?
उत्तर : भारत की जनगणना में शहरी इलाके की परिभाषा करते हुए जरुरी माना गया
है कि ऐसे इलाके में
(क) कम से कम 5,000 की जनसंख्या हो|
(ख) इस इलाके के काम काजी पुरुषों में कम से कम 75 प्रतिशत खेती-बाड़ी के काम से अलग माने जाने वाले पेशे में हों|
(ग) जनसंख्या का घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हो।
Q6. ग्राम पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण के प्रावधान का वर्णन कीजिए |
उत्तर : पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण के प्रावधान के कारण स्थानीय निकायों में महिलाओं की भारी संख्या में मौजूदगी सुनिश्चित हुई है। आरक्षण का प्रावधान अध्यक्ष और सरपंच जैसे पद के लिए भी है। इस कारण निर्वाचित महिलाजन-प्रतिनिधियों की एक बड़ी संख्या अध्यक्ष और सरपंच जैसे पदों पर आसीन हुई है।आज कम से कम 200 महिलाएँ जिला पंचायतों की अध्यक्ष हैं। 2,000 महिलाएँ प्रखंडअथवा तालुका पंचायत की अध्यक्ष हैं और ग्राम पंचायतों में महिला सरपंच की संख्या 80,000 से ज्यादा है। नगर निगमों में 30 महिलाएँ मेयर (महापौर) हैं। नगरपालिकाओं में 500 से ज्यादा महिलाएँ अध्यक्ष पद पर आसीन हैं। लगभग 650 नगर पंचायतों की प्रधानी महिलाओं के हाथ में हैं। संशाधनों पर अपने नियंत्रण की दावेदारी करके महिलाओं ने ज्यादा शक्ति और आत्मविश्वास अर्जित किया है |
Q7. अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण को संविधान संशोधन ने ही अनिवार्य
बना दिया था। कैसे वर्णन कीजिए |
उत्तर : अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण को संविधान संशोधन ने ही अनिवार्य बना दिया था। इसके साथ ही, अधिकाशं प्रदेशों ने पिछड़ी जाति के लिए आरक्षण का प्रावधान बनाया है। भारत की जनसंख्या में 16.2 प्रतिशत अनुसूचित जाति तथा 8.2प्रतिशत अनुसूचित जनजाति है। स्थानीय शासन के शहरी और ग्रामीण संस्थाओं के निर्वाचित सदस्यों में इन समुदायों के सदस्यों की संख्या लगभग 6.6 लाख है। इससे स्थानीय निकायों की सामाजिक बुनावट में भारी बदलाव आए हैं। ये निकाय जिस सामाजिक सच्चाई के बीच काम कर रहे हैं अब उस सच्चाई की नुमाइंदगी इन निकायों के ज़रिए ज्यादा हो रही है।
Q8. 73वें और 74वें संशोधन ने देश भर की पंचायतराज संस्थाओं और नगरपालिका की संस्थाओं की बनावट को एक-सा किया है कैसे वर्णन कीजिए |
उत्तर : ग्रामीण भारत में जिला पंचायतों की संख्या करीब 500, मध्यवर्ती अथवा प्रखंड स्तरीय पंचायत की संख्या 6,000 तथा ग्राम पंचायतों की संख्या 2,50,000 है। शहरी भारत में 100 से ज्यादा नगरनिगम, 1,400 नगरपालिका तथा 2,000 नगर पंचायत मौजूद हैं। हर पाँच वर्ष पर इन निकायों के लिए 32 लाख सदस्यों का निर्वाचन होता है। यदि प्रदेशों की विधान सभा तथा संसद को एक साथ रखकर देखें तो भी इनमें निर्वाचित जन - प्रतिनिधियों की संख्या 5,000 से कम बैठती है। स्थानीय निकायों के चुनाव के कारण निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है।
Q9.73वें संशोधन के कारण पंचायती राज व्यवस्था के आरक्षण में आये बदलावों का वर्णन कीजिए |
उत्तर : सभी पंचायती संस्थाओं में एक तिहाई सीट महिलाओं के लिए आरक्षित है। तीनों स्तर पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीट में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। यह व्यवस्था अनुसूचित जाति/जनजातिकी जनसंख्या के अनुपात में की गई है। यदि प्रदेश की सरकार जरुरी समझे, तो वह अन्य पिछड़ा वर्ग को भी सीट में आरक्षण दे सकती है।यह आरक्षण पंचायत के मात्र साधरण सदस्यों की सीट तक सीमित नहीं है। तीनों ही स्तर पर अध्यक्ष पद तक आरक्षण दिया गया है। इसके अतिरिक्त सिर्फ सामान्य श्रेणी की सीटों पर ही महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण नहीं दिया गया बल्कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट पर भी महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण की व्यवस्था है।
Q10.73वें संशोधन के अनुसार भारत के सभी प्रदेशों में पंचायती राज व्यवस्था का ढाँचा किस प्रकार का है?
उत्तर :73वें संशोधन के अनुसार भारत के सभी प्रदेशों में पंचायती राज व्यवस्था का ढाँचा त्रि-स्तरीय है।
पहली पायदान पर ग्राम पंचायत आती है। ग्राम पंचायत के दायरे में एक अथवा एक से ज्यादा गाँव होते हैं।
बीच का पायदान मंडल का है जिसे प्रखंड या तालुका भी कहा जाता है।इस पायदान पर कायम स्थानीय शासन के निकाय को मंडल या तालुका पंचायत कहा जाता है। जो प्रदेश आकार में छोटे हैं वहाँ मंडल या तालुका पंचायत यानी मध्यवर्ती स्तर को बनाने की जरूरत नहीं।
सबसे ऊपर वाले पायदान पर जिला पंचायत का स्थान है। इसके दायरे में जिले का पूरा ग्रामीण इलाका आता है।
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