जीन लक्षणों को नियंत्रित करते है उदाहरण - पौधे में कुछ हार्मोन होते है जो पौधे की लंबाई को नियंत्रित करते है । किसी पौधे की लंबाई पौधे में उपस्थित हॉर्मोन की बनने वाली मात्रा पर निर्भर करता है । एन्जाइम हॉर्मोन बनने प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है । यदि यह एन्जाइम दक्षता से कार्य करता है तो हॉर्मोन अधिक मात्रा में बनेगा और पौधे लंबे होगे । यदि प्रोटीन के जीन में कुछ परिवर्तन आते है तो बनने वाली प्रोटीन की दक्षता पर प्रभाव पडेगा । कम दक्ष की अवस्था में हार्मोन की मात्रा भी कम होगी और पौधे बौने बनेगे । अतः हम कह सकते है कि जीन लक्षणों को नियंत्रित करते है ।
प्रश्न 4 - सेन्ट्रोमियर के अधार पर गुणसुत्र कितने प्रकार के होते है ?
उत्तर - सेन्ट्रोमियर के अधार पर गुणसुत्र चार प्रकार के होते है।
1. मध्यकेन्द्री ( मेटासेंट्रिक ) :- इस गुणसुत्र में सेन्ट्रोमियर बीच में होता है। तथा दोनो भुजाए लगभग समान लंबाई की होती हैं।
2. उप मध्यकेन्द्री ( सब - मेटासेंट्रिक ) :- इस गुणसुत्र में सेन्ट्रोमियर एक सिरे के नजदीक होता है। इस अवस्था में एक भुजा बहुत लंबी एवं दूसरी बहुत छोटी होती है।
3. अग्रबिन्दुक ( एक्रोसेंट्रिक ) :- इसप्रकार के गुणसुत्र में सेन्ट्रोमियर एक सिरे के नजदीक होता है।इस अवस्था में एक भुजा लंबी तथा दुसरी छोटी होती है।
4. अंतः केन्द्री ( टीलोसेन्ट्री ) :- इस प्रकार के गुणसुत्र में सेन्ट्रोमियर गुणसुत्र के सिरे पर स्थित होता है।
प्रश्न 5 - डी 0 एन 0 ए 0 क्या है ? इसका विस्तृत रूप लिखिए, ये कहाँ पाया जाता है ?
उत्तर - डी 0 एन 0 ए 0 एक वृहद अणु है, जो अम्लिय प्रकृति का होता है इसलिए इसे न्युक्लिक अम्ल कहते है। यह अनुवांशिक सुचनाओ का वाहक है। यह गुणसु़त्र में पाया जाता है। प्रत्येक गुणसूत्र में एक डी 0 एन 0 ए 0 (डिऑक्सीराइबोन्युक्लीक अम्ल) का अणु होता हैं। डी 0 एन 0 ए 0 के रासायनिक रूप से तीन घटक होते है।
1. नाइट्रोजनधारी क्षार ( वेस )
2. एक शर्करा (पेन्टोज डिआक्सीराइबोज )
3. एक फॉसफेट समुह।
प्रश्न 6 - डी 0 एन 0 ए 0 की द्विकुंडलित संरचना का चित्र बना कर उसमें विद्यमान न्युक्यिटाइडों का वर्णन करो।
उत्तर - नाइट्रोजनधारी क्षार के अनुसार न्युक्यिटाइड चार प्रकार के होते है।
1. एडिनीन ( A )
2. गुआनीन ( G )
3. सयटोसीन ( T )
4. थायमीन ( C )
प्रश्न 7 - वे कौन से कारक हैं जो नया स्पीशीज की उत्पत्ति के उद्भव मे सहायक हैं ?
उत्तर - नई स्पीशीज के उद्भव में वर्तमान स्पीशीज के सदस्यो का परिवर्तनशील पर्यायवरण में जीवित बने रहना हैं । इन सदस्यों को नये पर्यायवरण में जीवित रहने के लिए कुछ बाहर लक्षणों में परिवर्तन करना पडता हैं । अतः प्रभावी पीढी के सदयों में शारीरिक लक्षणों में परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं जो संभोग क्रिया के द्वारा अगली पीढ़ी में हस्तान्तरित हो जाते हैं परंतु यदि दूसरी कालोनी के नर एवं मादा जीव वर्तमान पर्यायवरण में संभेग करेंगे तब उत्पन्न होने वाली पीढ़ी के सदस्य जीवित नहीं रह सकेगें।
प्रश्न 8 - डार्विन के विकास के सिद्धांत की व्याख्या किजिए।
उत्तर - डार्विन ने विकास के सिद्धांत की व्याख्या इस प्रकार दी ।
"प्रजनन की असीम क्षमता धारण करते हुए भी किसी भी जीवधारी की जनसंख्या एक सीमा के अंदर ही नियंत्रित रहती है। यह आपसी संर्धष के कारण है जो एक जाति के सदस्यो के बीच अथवा विभिन्न जातियो के सदस्यो के बीच भोजन, स्थान एवं जोडी के लिए होता रहता है। इस संर्धष से व्यष्टियां लोप हो जाती हैं। और एक नई जाति का उद्भव होता है।"