Chapter Chapter 3. आर्थिक सुधार 1991 से Class 12 Economics-II CBSE notes in hindi उदारीकरण - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 12 English Medium Economics-II All Chapters:
Chapter 3. आर्थिक सुधार 1991 से
2. उदारीकरण
1. उदारीकरण :
सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्रों को अपने नीतियों या नियमों में छुट या लचीलापन दिखाना और कुछ प्रतिबंधों को हटाना उदारीकरण कहलाता है |
1991 से पहले की आर्थिक निति :
सरकार ने 1991 से पहले घरेलु अर्थव्यवस्था में निजी उद्यमों पर कई प्रकार के नियंत्रण लगाये थे |
ये नियंत्रण निम्नलिखित थे :
(i) औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था
(ii) वस्तुओं पर कीमत या वित्तीय नियंत्रण
(iii) आयात लाइसेंस
(iv) विदेशी मुद्रा नियंत्रण
(v) बड़े व्यापारिक घरानों द्वारा निवेश पर प्रतिबन्ध |
1991 से पहले के सरकारी नियंत्रण का दुस्प्रभाव :
(i) इन नियंत्रणों ने भ्रष्टाचार, अनावश्यक बिलम्ब तथा अकुशलता को जन्म दिया |
(ii) सकल घरेलु उत्पाद (GDP) की विकास दर कम हो गयी |
(iii) निम्न-लागत प्रतियोगी आर्थिक प्रणाली आने की बजाय उच्च-लागत प्रणाली अस्तित्व में आ गयी |
आर्थिक सुधार की मान्यता :
आर्थिक सुधार निम्न मान्यताओं पर आधारित है :
(i) सरकारी नियंत्रण की अपेक्षा बाजार शक्तियां अर्थव्यवस्था का उचित मार्गदर्शन कर सकती हैं |
(ii) बाजार शक्तियाँ अर्थव्यवस्था को संवृद्धि और विकास के मार्ग पर अग्रसर कर सकती हैं |
(iii) संसार के अन्य अल्पविकसित देश जैसे कोरिया, थाईलैंड और सिंगापूर आदि भी उदारीकरण के फलस्वरूप तेजी से आर्थिक विकास किया है |
महत्वपूर्ण क्षेत्र जिसके लिए सुधार किया गया :
भारतीय अर्थव्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रक जिसमें 1991 में तथा उसके बाद विशेष ध्यान दिया गया |
(i) औद्योगिक क्षेत्रक
(ii) वित्तीय क्षेत्रक
(iii) कर-सुधार
(iv) विदेशी विनिमय बाजार
(v) व्यापार तथा निवेश क्षेत्रक
उदारीकरण से होने वाले आर्थिक सुधार :
उदारीकरण से होने वाले आर्थिक सुधार निम्नलिखित हैं |
(i) औद्योगिक क्षेत्रक में आर्थिक सुधार
(ii) वित्तीय क्षेत्रक में आर्थिक सुधार
(iii) राजकोषीय नीतियों में आर्थिक सुधार अथवा कर व्यवस्था में सुधार
(iv) विदेशी विनिमय संबंधी सुधार
(v) विदेशी व्यापार और निवेश निति सुधार
(i) औद्योगिक क्षेत्रक में आर्थिक सुधार : उदारीकरण का मुख्य उदेश्य औद्योगिक क्षेत्र को प्रतिबंधो एवं नियंत्रण से मुक्त करना ही था | इसके अंतर्गत निम्नलिखित कदम उठाए गए :
(a) औद्योगिक लाइसेंसिंग व्यवस्था को समाप्त करना : इसके अंतर्गत इन उद्योगों (I) एल्कोहल, (II) सिगरेट, (III) जोखिम भरे रसायनों, (IV) औद्योगिक विस्फोटकों, (V) इलेक्ट्रोनिकी, (VI) विमानन तथा औषधि भेषज इन छ: उत्पादों श्रेणियों को छोड़ अन्य सभी उद्योगों के लिए लाइसेंसिंग व्यवस्था समाप्त कर दी गयी |
(b) सार्वजानिक क्षेत्रक को संकुचित कर पहले से छोटा कर दिया गया : सार्वजानिक क्षेत्रक के अब सिर्फ तीन ही महत्वपूर्ण उद्योग बचे है जो सुरक्षित उद्योगों की श्रेणी में हैं वो हैं :
(I) प्रतिरक्षा उपकरण
(II) परमाणु उपकरण और
(III) रेल परिवहन
(c) उत्पादन क्षेत्र से आरक्षण को हटाना : लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित अनेक वस्तुएँ भी अब अनारक्षित श्रेणी में आ गयी है | अब बाजार को अपने वस्तुओं की कीमत निर्धारण की अनुमति मिल गयी है |
(d) उत्पादन क्षमता का निर्धारण बाजार को सुपुर्द किया गया : बाजार की मांग के अनुसार अब उत्पादक स्वयं यह निर्णय करेंगे कि क्या उत्पादन करना है और कितनी मात्रा में करना है |
(ii) वित्तीय क्षेत्रक में आर्थिक सुधार :
इस आर्थिक सुधार से भारत में वित्तीय क्षेत्र में चौतरफा विकास हुआ है इसलिए इस क्षेत्रक को अर्थव्यवस्था की आर्थिक क्रिया की जीवन रेखा कहा जाता है |
वित्तीय क्षेत्र में शामिल हैं |
(a) बैंकिंग तथा गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाएँ
(b) स्टॉक एक्सचेंज मार्केट तथा
(c) विदेशी मुद्रा बाजार
रिजर्व बैंक का दायित्व :
भारत में रिजर्व बैंक के पास वित्तीय क्षेत्रक का नियमन का दायित्व है | भारतीय रिजर्व बैंक के विभिन्न नियम और कसौटियों के माध्यम से ही बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों के कार्यों का नियमन होता है | रिजर्व बैंक ही यह तय करता था कि कौन सा बैंक कितनी मुद्रा अपने पास जमा रख सकता है | रिजर्व बैंक ही ब्याज की दरों की नियत करता है |
वितीय क्षेत्रक में आर्थिक सुधार की दिशा में निम्नलिखित बदलाव किये गए :
(i) रिजर्व बैंक को इस क्षेत्रक के नियंत्रक की भूमिका से हटाकर उसे इस क्षेत्रक का एक सहायक बना दिया गया |
(ii) वित्तीय क्षेत्रक रिजर्व बैंक के बिना सलाह के ही कई मामलों में अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है |
(iii) इसी सुधार की वजह से वित्तीय क्षेत्रक में भारतीय और विदेशी निजी बैंकों को भी पदार्पण का मौका मिला है |
(iv) बैंकों की पूँजी में विदेशी भागीदारी की सीमा 50 प्रतिशत कर दी गयी है |
(v) कुछ निश्चित शर्तों को पूरा करने वाले बैंक अब रिजर्व बैंक की अनुमति के बिना ही नई शाखाएँ खोल सकते हैं |
(vi) विदेशी निवेश संस्थाओं (एफ. आई. आई) तथा व्यापारी बैंक, म्युचुअल फण्ड और पेंशन कोष आदि को भी अब भारतीय वित्तीय बाजारों में निवेश की अनुमति मिल गई है |
राजकोषीय नीतियाँ : कर व्यवस्था में सुधार का संबंध सरकार की राजस्व (आमदनी ) और व्यय (खर्च ) की नीतियों से है, जिन्हें सामूहिक रूप से राजकोषीय नीतियाँ कहा जाता है |
दुसरे शब्दों में वह नीतियाँ जिससे सरकार का राजकाज चलता है राजकोषीय नीतियाँ कहलाती हैं |
कर के प्रकार :
करों को मुख्यत: दो वर्गों में बाँटा गया है :
(i) प्रत्यक्ष कर (Direct tax): प्रत्यक्ष कर वह कर होते हैं जिनका भार अन्य व्यक्तियों को टाला (shift) नहीं जा सकता है | उदाहरण : आय कर, सम्पति कर |
(ii) अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax): वस्तुओं और सेवाओं पर लगाये जाने वाले कर को अप्रत्यक्ष कर कहते हैं | जिनका भार अन्य व्यक्तियों पर टाला जा सकता है, अर्थात इन्हें सेवा लेने या वस्तु लेने वाले से लिया जाता है | जैसे - बिक्री कर (sale tax ), सेवा कर (service tax) और vat आदि |
(iii) राजकोषीय नीतियों में आर्थिक सुधार अथवा कर व्यवस्था में सुधार :
(a) कर प्रणाली जो कि पहले बहुत हु जटिल थी उसे अब काफी सरल और सामान्य बनाया गया है | ताकि सभी जो कर के दायरे में आते हैं कर का भुगतान करे |
(b) कर की दरों में भी कमी की गयी है, और कमी आई भी है |
(c) इस निति से कर दाताओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है सरकार का राजस्व भी बढ़ा है |
(d) कर की दर में कमी से बचत को बढ़ावा मिला है जिससे अब लोग स्वेच्छा से अपनी आय का विवरण दे देते हैं |