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Chapter Chapter 2. भारतीय अर्थव्यवस्था 1950 - 1990 Class 12 Economics-II CBSE notes in hindi भारत का विदेशी व्यपार - CBSE Study

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Chapter Chapter 2. भारतीय अर्थव्यवस्था 1950 - 1990 Class 12 Economics-II CBSE notes in hindi भारत का विदेशी व्यपार - CBSE Study

कक्षा 12 Economics-II के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण Chapter 2. भारतीय अर्थव्यवस्था 1950 - 1990 को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक भारत का विदेशी व्यपार को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन Economics-II में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Class 12 English Medium Economics-II All Chapters:

Chapter 2. भारतीय अर्थव्यवस्था 1950 - 1990

4. भारत का विदेशी व्यपार

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भारत का विदेशी व्यापार

विदेशी व्यापार की रचना - व्यापार की रचना से अभिप्राय आयात और निर्यात की मदों से है | सरल शब्दों में व्यापार की रचना का अर्थ है की किस - किस प्रकार की वस्तुओं का आयात और निर्यात किया जा रहा है |

 

भारतीय विदेशी व्यापार की रचना की प्रमुख विशेषताएं -

  • कृषि निर्यातों में गिरावट : भारत के कुल निर्यातों में कृषि उत्पादित वस्तुओं के प्रतिशत भाग में काफी कमी आई है | इसका मुख्य कारण घरेलु उद्योगों द्वारा कृषि वस्तुओं का कच्चे माल के रूप में करना है |
  • परंपरागत मदों के निर्यात में प्रतिशत गिरावट : भारत के निर्यातों में जूट, चाय, आनाज जैसे परंपरागत मदे शामिल है | परन्तु समय के साथ इनकी घरेलु मांग बढ़ने के कारण कुल निर्यातों में इनका भाग घटने लगा |
  • निर्मित वस्तुओं के प्रतिशत भाग में वृद्धि : जैसे-जैसे भारत में उद्योगों की संख्या में वृद्धि हुई वैसे-वैसे कुल निर्यातों में विनिर्मित वस्तुओ के भाग में भी भारी वृद्धि देखी गई |

विदेशी व्यापार की दिशा - व्यापार की दिशा का अर्थ है की किन-किन देशो के साथ एक देश वस्तुओं और सेवाओं का आयात निर्यात करता है | 

 

आयात प्रतिस्थापन - आयात प्रतिस्थापन एक रणनीति है जिसके अंतर्गत ऐसी वस्तुएँ जिनका विदेशो से आयात किया जाता है उनका देश के अंदर ही उत्पादन करने को प्रोत्साहन दिया जाता है ताकि विदेशी मुद्रा की ज्यादा से ज्यादा बचत की जा सके |

 

घरेलू उद्योगों का विदेशी प्रतियोगिता से सुरक्षा में आयात प्रतिस्थापन की भूमिका -

घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतियोगिता से सुरक्षा प्रदान करने के लिए दो तरीके अपनाएँ गए | 

(i) प्रशुल्क : प्रशुल्क आयातित वास्तुओं पर लगाया गया कर है | प्रशुल्क लगाने पर आयातित वस्तुएं महँगी हो जाती है जिससे घरेलु बाजार में उनकी माँग गिरने लगती है |

(ii) कोटा : यहाँ कोटे का अर्थ है आयात के लिए किसी वस्तु की मात्रा निश्चित करना ताकि उससे ज्यादा कोई उस वास्तु का आयात ना कर सके |

प्रशुल्क और कोटे का प्रभाव यह होता है की इससे आयात प्रतिबंधित हो जाता है जिसके कारण घरेलु उद्योगों की विदेशी प्रतियोगिता से सुरक्षा होती है | 

 

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