Chapter Chapter 2. भारतीय अर्थव्यवस्था 1950 - 1990 Class 12 Economics-II CBSE notes in hindi नियोजन के दौरान औद्योगिक विकास की रणनीति - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 12 English Medium Economics-II All Chapters:
Chapter 2. भारतीय अर्थव्यवस्था 1950 - 1990
3. नियोजन के दौरान औद्योगिक विकास की रणनीति
नियोजन के दौरान औद्योगिक विकास की रणनीति (1947-1990)
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों का महत्व -
- अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तान : औद्योगिक विकास अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन लाने में सहायता करता है | उद्योगों के विकास से विकास की प्रक्रिया में विविधता आती है जिसके कारण केवल एक ही क्षेत्र जैसे कृषि का विकास ना होकर सभी क्षेत्रो का विकास होता है |
- कृषि के यांत्रिकृत साधनों का विकास : कृषि उत्पादकता को बढाने के लिए कृषि के यांत्रिकृत साधनों जैसे ट्रेक्टर आदि का प्रयोग करना अति आवश्यक है | कृषि क्षेत्र के लिए ये साधन उधोगो द्वारा ही प्रदान किया जाता है |
- रोजगार का स्रोत : आज के समय में जहाँ बढ़ती आबादी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ी समस्या है वही दूसरी तरफ भारत में उद्योग रोजगार के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में उभरा है |
- आधारिक संरचना का विकास : उद्योगों के विकास के कारण ही आधारिक संरचना के विकास में बहुत अधिक तेजी दर्ज की गई है | किसी भी उद्योग की स्थापना से पहले आधारभूत आधारिक संराचना जैसे सड़क, बिजली, पानी, बीमा, बैंकिंग आदि का विकास होना अति आवश्यक है |
- विकास प्रक्रिया को गति प्रदान करना : उद्योग वोक्स प्रक्रिया को गति प्रदान करता है | उद्योगों के अभाव में विकास केवल कृषि क्षेत्र तक ही सिमित रहती है | उद्योगों के विकास के कारण उत्पादन के स्तर में तेजी से वृद्धि दर्ज की गई है |
औद्योगिक विकास में सार्वजानिक क्षेत्र की भूमिका -
औद्योगिक विकास में सार्वजानिक क्षेत्र ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | निम्न कारणों के कारण औद्योगिक विकास में सार्वजानिक क्षेत्र को प्रत्यक्ष भाग लेंना पड़ा |
- निजी उद्यमियों के पास पूँजी का अभाव : भारत मे उद्योगों के विकास के लिए एक बड़े निवेश कि आवश्यकता थी | परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के समय बड़े निजी उद्यमियों की संख्या बहुत कम थी और निजी उद्यमियों के पास पूँजी की उपलब्धता जितनी उनकी आवश्यकता थी उससे बहुत कम थी |जिस कारण इस कार्य के लिए सार्वजानिक क्षेत्र को सामने आना पड़ा |
- निजी उद्यमियों में प्रेरणा का आभाव : स्वतंत्रता प्राप्ति के समय बाजार में उद्योगिक वस्तुओं की मांग बहुत कम थी | बाजार का आकार छोटा होने के कारण निजी उद्यमी निवेश करने के लिए इच्छुक नहीं थे जिस कारण औद्योगिक विकास के लिए सार्वजानिक क्षेत्र को आगे आना पड़ा |
- सामाजिक हितो की रक्षा : भारतीय अथव्यवस्था को समाजवाद के पथ पर अग्रसर करने के लिए यह अति आवश्यक था की सरकार अर्थ्व्यवास्था में बड़े तथा भारी उद्योगों पर नियंत्रण रखे तथा यह सुनिश्चित करे की औद्योगिक धन कुछ निजी निवेशको के हाथो में केन्द्रित न हो |
सन 1956 की औद्योगिक नीति की विशेषताएं -
सामाजिक न्याय के साथ विकास के मुख्य उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए देश को एक औद्योगिक नीति की आवश्यकता थी | इसी को ध्यान में रखते हुए तब की वर्तमान सरकार ने वर्ष 1956 में औद्योगिक नीति बनाई | जिसकी मुख्य विशेषताएं निम्न है|
- उद्योगों का वर्गीकरण : सरकार ने उद्योगों को तीन श्रेणियों ने बाँटा जो निम्न है -
(i) पहले वे उद्योग जिनकी स्थापना और विकास सार्वजानिक क्षेत्र के उद्योगों के रूप में की जाएगी |
(ii) दुसरे वो उद्योग जिनकी स्थापना और विकास निजी क्षेत्र के उद्योगों के रूप में की जाएगी |
(iii) तीसरे वे उद्योग जिनकी स्थापना और विकास सार्वजानिक एंव निजी दोनों क्षेत्रो के उद्योगों के रूप में की जाएगी |
- औद्योगिक लाइसेंसिंग का प्रावधान : 1956 की औद्योगिक नीति के अंतर्गत सरकार ने निजी क्षेत्र के उद्योगों की स्थापना के लिए लाइसेंस लेना आवश्यक बना दिया | सरकार की लाइसेंसिंग निति का मुख्य उद्देश्य निजी उद्यमियों को पिछड़े क्षेत्रो में उद्योग स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना था ताकि सभी क्षेत्रो का संतुलित विकास हो सके |
- औद्योगिक रियायते : पिछड़े क्षेत्रो में विकास की प्रक्रिया को गति प्रदान करने के लिए सरकार ने 1956 की औद्योगिक नीति में निजी उद्योगों को कुछ रियायते देने का प्रावधान किया | जैसे -
(i) पिछड़े क्षेत्रो में नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना करने पर कर में छुट |
(ii) रियायती दरो पर बिजली प्रदान करना आदि |
लघु स्तरीय उद्योगों की विशेषताएं -
- रोजगार परक : छोटे पैमाने के उद्योगों के पास बड़े पैमाने के उद्योगों की तुलना में कम पूँजी होती है जिस कारण वे अधिकतर पूँजी प्रधान तकनीक का प्रयोग ना कर श्रम प्रधान तकनीक का प्रयोग करते है | जिस कारण छोटे पैमाने के उद्योग बड़े पैमाने के उद्योगों की तुलना में अधिक रोजगार का सृजन करते है |
- स्थान निर्धारण संबंधी लचीलापन : समान्यतः बड़े पैमाने के उद्योग ऐसे स्थानों के निकट स्थापित किये जाते है जहा कच्चा माल तथा अन्य संसाधन आसानी से उपलब्ध हो | परन्तु छोटे पैमाने के उद्योगों मे स्थान निर्धारण संबंधी लचीलापन पाया जाता है| इन्हें कही भी आसानी से स्थापित किया जा सकता है |
- अल्प निवेश : बड़े पैमाने के उद्योगों में छोटे पैमाने के उद्योगों की तुलना में अधिक निवेश की आवश्यकता होती है जबकि छोटे पैमाने के उद्द्योगो में छोटे पूंजीपतियों को भी निवेश करने का अवसर प्राप्त होता है | जिसके कारण छोटे निवेशको को भी विकास का अवसर प्राप्त होता है |