Chapter 9. सविधान-एक जीवंत दस्तावेज Class 11 Political Science CBSE notes in hindi संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 11 English Medium Political Science All Chapters:
9. सविधान-एक जीवंत दस्तावेज
2. संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत
अध्याय 9. संविधान-एक जीवंत दस्तावेज
संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत:
यह सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद के मामले में 1973 में दिया था। इसके अनुसार संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार है लेकिन वह संविधान की अधारभूत संरचना में बदलाव नहीं कर सकती | इसे ही संविधान की मूल संरचना का सिद्धांत कहा जाता है |
संविधान की रक्षा व उसकी व्याख्या में न्यायपालिका की भूमिका:
संविधान की रक्षा का दायित्व अंतत: न्यायपालिका के हाथों में ही आ जाता है | संविधान बनाने व संविधान में संशोधन का कार्य बेशक संसद के पास है परन्तु उसकी रक्षा का कार्य एवं उसे लागु करने का कार्य न्यायपालिका के पास है | ऐसे कई अवसर आए है जब न्यायपालिका ने संविधान के विपरीत या मूलभूत संरचना में बदलाव की कोशिश की गयी है तो न्यायपालिका ने उसे रोकने की कोशिश की है | वह न्यायिक समीक्षा के द्वारा किसी भी कानून या संशोधन की समीक्षा कर सकता है | केशवा नन्द भारती मामले में न्यायपालिका ने संविधान की मूल संरचना का सिद्धांत दिया | जिसके अनुसार संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार है लेकिन वह संविधान की अधारभूत संरचना में बदलाव नहीं कर सकती | इसके साथ ही न्यायपालिका ने समय-समय पर संविधान की व्याख्या भी किया है, और कुछ बिन्दुओं को संविधान की विशेषताएँ भी माना है जैसे - संविधान की सर्वोच्यता, सरकार का गणतंत्रीय और लोकतंत्रीय स्वरुप, संविधान का धर्मनिरपेक्ष स्वरुप, संविधान का संधीय सवरूप तथा कानून का शासन एवं न्यायिक समीक्षा आदि को प्रमुख सूची में रखा है | इससे यह पता चलता है कि न्यायपलिका संविधान की रक्षा व उसकी व्याख्या में भूमिका अहम् है |
संविधान की व्याख्या को लेकर न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव:
कई बार संसद और कार्यपालिका संविधान के कुछ अनुच्छेदों की न्यायपालिका द्वारा किये गए व्याख्या से संतुष्ट नहीं हुए है और ऐसी स्थित में दोनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हुई है | जैसे 42 वें संसोधन जो कि सर्वाधिक विवादास्पद था से समय हुआ | इस संशोधन में प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे :
(i) संविधान की प्रस्तावना में 'समजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द का जोड़ा जाना |
(ii) मौलिक अधिकारों पर एक नया अध्याय जोड़ा गया |
(iii) लोकसभा और राज्य विधानसभाओ का कार्य काल 5 वर्ष से 6 वर्ष किया गया |
(iv) राज्य के निर्देशक सिद्धांतों को और व्यापक बनाया गया और मौलिक अधिकारों से अधिक महत्त्व दिया |
इसके अलावा निम्न मुद्दों पर भी मतभेद सामने आए हैं :
जैसे - मौलिक अधिकारों और निर्देशक सिद्धांतों के आपसी संबंधों को लेकर, सम्पति का अधिकार, संसद द्वारा संविधान संशोधन की शक्ति को लेकर जिसमें यह दावा किया गया कि संसद की इस शक्ति को कोई कम नहीं कर सकता | न्यायपालिका के अधिकारों को संसद द्वारा सिमित करने की कोशिश को लेकर भी कई बार विवाद हो चुके है | न्यायधीशों की नियुक्ति को लेकर भी कई बार न्यायपालिका और कार्यपालिका आमने-सामने आ चुके है |
टकराव का कारण:
संविधान की व्याख्या को लेकर न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव के निम्नलिखित कारण है :
(1) कुछ मुद्दे जिनकों लेकर मतभेद थे : (a) मौलिक अधिकारों और निर्देशक सिद्धांतो का आपसी संबंध (b) संपति का अधिकार को लेकर (c) संसद द्वारा यह दावा कि संविधान-संशोधन की उसकी शक्ति किसी भी रूप में सिमित नहीं किया जा सकता है |
(2) गोलकनाथ मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय कि संविधान में ऐसा कोई संशोधन नहीं किया जा सकेगा जिससे मौलिक अधिकारों में कोई कमी या कटौती हो, इस फैसले को निष्प्रभावी बनाने के लिए 1971 में संविधान का 24 वाँ संशोधन अधिनियम पारित किया गया | जिसमें प्रावधान था कि संसद संविधान के किसी भाग में संशोधन कर सकेगी |
(3) आपातकाल की घोषणा के बाद 1975 संविधान का 38 संशोधन अधिनियम पारित किया गया जिसमें प्रावधान था कि कि राष्ट्रपति द्वारा जरी किये गए अध्यादेश या उद्घोषणा को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी | यह संशोधन भी विवाद में रहा जब सभी विपक्षी दलों के संसद जेलों में बंद थे |
(4) कई ऐसे भी संशोधन किये गए जिससे उच्चतम और उच्च न्यायालय की शक्तियों को कम किया जा सके |
भारतीय संविधान में अब तक किये गए संशोधनों का वर्गीकरण :
भारतीय संविधान में अब तक किये गए संशोधनों का वर्गीकरण को निम्न भागों में बाँटा गया है |
(i) तकनिकी या प्रशासनिक
(ii) संविधान की व्याख्याएँ
(iii) राजनितिक आम सहमति के माध्यम से संशोधन
भारतीय संविधान में इतने अधिक संशोधन होने के कारण:
भारतीय संविधान में इतने अधिक संशोधन होने के निम्नलिखित कारण हैं :
(i) तकनिकी या प्रशासनिक समस्याओं से निपटने के लिए संशोधन, उदाहरण -उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों के वेतन से संबंधित संशोधन |
(ii) संसद सदस्यों की सर्वसम्मति से किये गए संशोधन उदाहरण - दलबदल विरोधी कानून तथा मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 करना |
(iii) न्यायपालिका और तत्कालिक सरकारों के बीच उभरे मतभेदों के कारण संशोधन, उदाहरण - संपति के अधिकार को लेकर |
(iv) ऐसे संशोधन जिससे बड़े विवाद हुए है जैसे संविधान का 42 वाँ संशोधन और इसे पलटने के लिए फिर से संशोधन हुए |
(v) समय के साथ-साथ नीतियों में परिवर्तन अथवा आर्थिक नीतियों में बदलाव के कारण संशोधन |
(vi) संविधान में छुट गए कुछ विषयों को पुन: नए सिरे से परिभाषित करने के लिए संशोधन | उदाहरण - संविधान के प्रस्तावना में 'समाजवादी' एवं 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द का जोड़ा जाना आदि |