Chapter 7. राष्ट्रवाद Class 11 Political Science-II CBSE notes in hindi राज्य एवं राष्ट्र में अन्तर - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 11 English Medium Political Science-II All Chapters:
7. राष्ट्रवाद
2. राज्य एवं राष्ट्र में अन्तर
सांझी राजनितिक पहचान :
राज्य और राष्ट्र में अंतर :
राज्य :
(i) राज्य एक वैधानिक संस्था है |
(ii) राज्य का आधार संप्रभुता है |
राष्ट्र :
(i) राष्ट्र एक वैधानिक संस्था नहीं है |
(ii) राष्ट्र का आधार भावना है |
आत्मनिर्णय के आंदोलनों से उत्पन्न समस्याएँ :
आत्मनिर्णय के आन्दोलनों के कारण विश्व को बहुत से समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है | अत: इससे संबंधित निम्न समस्याएँ हैं -
(i) स्वतंत्र राज्य की माँग करना और उसके लिए जान-माल का नुकसान करना और हिंसा करना |
(ii) एक संस्कृति और एक राज्य की माँग |
(iii) हिंसा के कारण अल्पसंख्यकों का विस्थापन |
(iv) विभिन्नताओं का अनादर |
एक संस्कृति-एक राज्य की धारणा :
एक संस्कृति-एक राज्य की धारणा की शुरुआत 19 वीं सदी के यूरोप में सामने आई | इसके परिणाम स्वरुप प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् राज्यों की पुनव्यस्था में इस विचार को परखा गया परन्तु आत्म निर्णय की सभी मांगों को संतुष्ट करना संभव नहीं था |
आज भी इस निति को प्रयोग में ला पाना संभव नहीं तभी बहुलवाद का प्रचलन है अर्थात बहुत से समुदाय और संस्कृतियों के लोग एक ही देश में फल-फूल सकें |
'एक संस्कृति एक राज्य' का सपना लोकतान्त्रिक देशों के लिए बाधक है :
एक संस्कृति एक राज्य निम्न कारणों से लोकतान्त्रिक देशो के बाधक है -
(i) इसमें विभिन्न संस्कृतियाँ और समुदाय एक ही देश फल-फुल नहीं पाते हैं |
(ii) यह बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देता है |
(iii) यह अल्पसंख्यकों के हितों का ध्यान नहीं रखता है |
(iv) यह अन्य धर्म और संस्कृतियों को सुरक्षा नहीं देता है |
आत्मनिर्णय के आन्दोलनों से कैसे निपटे :
(i) आत्मनिर्णय के आन्दोलन लोकतान्त्रिक देशों के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है जिससे निपटना इन देशों के लिए एक चुनौती है |
(ii) समाधान नए राज्यों के गठन में नहीं बल्कि वर्त्तमान राज्यों को ज्यादा लोकतान्त्रिक और समतामूलक बनाने में है |
(iii) समाधान है कि भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक और नस्लीय पहचानों के लोग देश में सामान नागरिक तथा मित्रों की तरह साथ-साथ रह सके |
राष्ट्रवाद बड़े-बड़े साम्राज्यों के पतन का कारण बना :
बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में यूरोप में आस्ट्रियाइ - हंगेरियाई और रुसी साम्राज्यों के पतन तथा उनके साथ एशिया और अफ्रीका में फ़्रांसिसी, ब्रिटिश डच और पुर्तगाली साम्राज्य के बंटवारे और पतन में राष्ट्रवाद की अहम् भूमिका थी
सांझे राजनितिक विश्वास : जब राष्ट्र के सदस्यों की इस विषय पर एक साँझा दृष्टि होती है कि वे कैसे राज्य बनाना चाहते है, अथवा वे अपने देश को भविष्य में किस दिशा में या किस विचार मूल्यों पर आधारित राज्य बनाना चाहते हैं | इन शेष तथ्यों के अतिरिक्त वे धर्म निरपेक्षता, लोकतंत्र और उदारवाद जैसे मूल्यों और सिद्धांतों को स्वीकार करते हैं तब यह विचार राष्ट्र के रूप में उनकी राजनितिक पहचान को स्पष्ट करता है |
भू-क्षेत्र से सामूहिक पहचान : कोई भी भू-क्षेत्र जहाँ के रहने वालों के लिए वह भूमि सामूहिक पहचान का अनुभव कराती है | किसी भू क्षेत्र पर काफी हद तक साथ-साथ रहना एवं उससे संबंधित सांझे अतीत की कई स्मृतियाँ (यादें) जुडी हुई होती हैं | लोग अपनी धरती प्रेम और स्नेह की दृष्टि से देखते हैं और इसे कई लोग मातृभूमि, तो कोई पितृभूमि कहता है तो कई लोग उस भू-क्षेत्र को पवित्र भूमि मानते है |
सांझी राजनितिक पहचान : व्यक्तियों को एक राष्ट्र में बांधने के लिए एक सामान भाषा, जातीय वंश परंपरा और सामाजिक परंपराओं जैसी सांस्कृतिक पहचान की आवश्यकता होती है | ऐसे हमारे विचार, धार्मिक विश्वास, सामाजिक परंपराएँ सांझे हो जाते है | इससे सभी एक दुसरे को अपनापन की नजर से देखते हैं | वास्तव में लोकतंत्र में किसी खास नस्ल, धर्म या भाषा से संबद्धता की जगह एक मूल्य एवं समूह के प्रति निष्ठा की आवश्यकता होती है |
इतिहास से राष्ट्र की पहचान : देश की प्राचीन सभ्यता तथा सांस्कृतिक विरासत और अन्य उपलब्धियाँ एक राष्ट्र और एकात्मकता का प्रमाण देते हैं | राष्ट्र स्वयं को इस रूप में देखते हैं जैसे वे बीते अतीत के साथ-साथ आगत भविष्य को समेटे हुए हों | वे देश स्थायी खांका पेश करने के लिए सांझी स्मृतियाँ, किंवदंतियों और ऐतिहासिक अभिलेखों की रचना के माध्यम से अपने लिए इतिहास बोध निर्मित करते हैं |