Chapter 2. यूरोप में समाजवाद और रूसी क्रांति Class 9 History CBSE notes in hindi सामाजिक परिवर्तन का युग - CBSE Study
कक्षा 9 History के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण 2. यूरोप में समाजवाद और रूसी क्रांति को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक सामाजिक परिवर्तन का युग को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन History में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।
CBSE NOTES:
Class 9 English Medium History All Chapters:
2. यूरोप में समाजवाद और रूसी क्रांति
1. सामाजिक परिवर्तन का युग
2. यूरोप में समाजवाद और रूसी क्रांति
सामाजिक परिवर्तन का युग : यूरोप में सामाजिक संरचना के क्षेत्र में फ्रांसिसी क्रांति के बाद आमूल परिवर्तन की संभावना का सूत्रपात हो गया था |
उदारवादी (Liberals) : उदारवादी एक विचारधारा है जिसमें सभी धर्मों को बराबर का सम्मान और जगह मिले | वे व्यक्ति मात्र के अधिकारों की रक्षा के पक्षधर थे |
रुढ़िवादी (Conservatives) : यह एक ऐसी विचारधारा है जो पारंपरिक मान्यताओं के आधार पर कार्य करती है |
रैडिकल (Radical)/आमूल परिवर्तनवादी : ऐसी विचारधारा जो क्रन्तिकारी रूप से सामाजिक और राजनितिक परिवर्तन चाहता है |
समाजवादी विचारधारा (Socialist): समाजवादी विचारधारा वह विचारधारा है जो निजी सम्पति रखने के विरोधी है और समाज में सभी को न्याय और संतुलन पर आधारित विचारधारा है |
रूस में उदारवादी समूह लोकतांत्रिक नहीं था : यह समूह ''लोकतंत्रवादी'' नहीं था | ये लोग सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार यानि सभी व्यस्क नागरिकों को वोट का अधिकार देने के पक्ष ने नहीं थे | उनका मानना था कि वोट का अधिकार केवल सम्पतिधारियों को ही मिलना चाहिए |
रूस में सामाजिक परिवर्तन को लेकर समाजवादियों की प्रमुख विचारधाराएँ :
रूस में समाजवादियों की प्रमुख विचारधाराएँ निम्न थी |
(i) वे निजी सम्पति के विरोधी थे | यानि, वे संपति पर निजी स्वामित्व को सही नहीं मानते थे |
(ii) वे संपति के निजी स्वामित्व की व्यवस्था को ही सारी समस्याओं की जड़ मानते थे |
(iii) कुछ समाजवादियों को कोआपरेटिव यानि सामूहिक उद्यम के विचार में दिलचस्पी थी |
(iv) केवल व्यक्तिगत पहलकदमी से बहुत बड़े सामूहिक खेत नहीं बनाए जा सकते | वह चाहते थे कि सरकार अपनी तरफ से सामूहिक खेती को बढ़ावा दे |
(v) वे चाहते थे कि सरकार पूंजीवादी उद्यम की जगह सामूहिक उद्यम को बढ़ावा दे |
रूस में उदारवादियों की प्रमुख विचारधाराएँ :
रूस में उदारवादियों की प्रमुख विचारधाराएँ निम्नलिखित थी -
(i) सभी धर्मों को बराबर का सम्मान और जगह मिले |
(ii) वे सरकार से व्यक्ति मात्र के अधिकारों की रक्षा के पक्षधर थे |
(iii) उनका कहना था कि सरकार को किसी के अधिकारों का हनन करने या उन्हें छीनने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए |
(iv) यह समूह प्रतिनिधित्व पर आधारित एक ऐसी निर्वाचित सरकार के पक्ष में था जो शासकों और आफ्सरों के प्रभाव से मुक्त और सुप्रक्षिक्षित न्यायपालिका द्वारा स्थापित किये गए कानूनों के अनुसार शासन-कार्य चलाये |
(v) उदारवादी समूह वंश-आधारित शासकों की अनियंत्रित सत्ता के भी विरोधी थे |
रैडिकल समूह की प्रमुख विचारधाराएँ :
रैडिकल समूह की प्रमुख विचारधाराएँ निम्नलिखित थी :
(i) रैडिकल समूह के लोग ऐसी सरकार के पक्ष में थे जो देश की आबादी के बहुमत के समर्थन पर आधारित हो।
(ii) इनमें से बहुत सारे लोग महिला मताधिकार आंदोलन के भी समर्थक थे।
(iii) उदारवादियों के विपरीत ये लोग बड़े जमींदार और संपन्न उद्योगपतियों को प्राप्त किसी भी तरह के विशेषाधिकारों के खिलाफ थे |
(iv) वे निजी संपत्ति के विरोधी नहीं थे लेकिन केवल कुछ लोगों के पास संपत्ति के संकेन्द्रण का विरोध जरूर करते थे।
रुढ़िवादियों की प्रमुख विचारधाराएँ :
रुढ़िवादियों की प्रमुख विचारधाराएँ निम्नलिखित थी -
(i) रुढ़िवादी तबका रैडिकल और उदारवादी, दोनों के खिलाफ था।
(ii) मगर फ्रांसिसी क्रांति के बाद तो रुढ़िवादी भी बदलाव की जरुरत को स्वीकार करने
लगे थे।
(iii) पुराने समय में, यानी अठारहवीं शताब्दी में रुढ़िवादी आमतौर पर परिवर्तन के विचारों का विरोध करते थे। लेकिन उन्नीसवीं सदी तक आते-आते वे भी मानने लगे थे कि कुछ परिवर्तन आवश्यक हो गया है |
(iv) वह चाहते थे कि अतीत का सम्मान किया जाए अर्थात् अतीत को पूरी तरह ठुकराया न
जाए और बदलाव की प्रक्रिया धीमी हो।