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Chapter 2. राजा, किसान और नगर Class 12 History Part-1 [LATEST] Solutions अध्याय-समीक्षा in Hindi - CBSE Study

Chapter 2. राजा, किसान और नगर History Part-1 Class 12 exercise - [LATEST] Solutions अध्याय-समीक्षा cbse board school study materials like cbse notes in Hindi medium, all chapters and exercises are covered the ncert latest syllabus 2026 - 27.

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Chapter 2. राजा, किसान और नगर Class 12 History Part-1 [LATEST] Solutions अध्याय-समीक्षा in Hindi - CBSE Study

NCERT Solutions for Class 12 History Part-1 are carefully prepared according to the latest CBSE syllabus and NCERT textbooks to help students understand every concept clearly. These solutions cover all important Chapter 2. राजा, किसान और नगर with detailed explanations and step-by-step answers for better exam preparation. Each अध्याय-समीक्षा is explained in simple language so that students can easily grasp the fundamentals and improve their academic performance. The study material is designed to support daily homework, revision practice, and final exam preparation for Class 12 students. With accurate answers, concept clarity, and structured content, these NCERT solutions help learners build confidence and score higher marks in their examinations. Whether you are revising a specific topic or preparing an entire chapter, this resource provides reliable and syllabus-based guidance for complete success in History Part-1.

Class 12 English Medium History Part-1 All Chapters:

Chapter 2. राजा, किसान और नगर

1. अध्याय-समीक्षा

अध्याय-समीक्षा


 

  •  ईसा पूर्व छठी शताब्दी से कई नए परिवर्तनों के प्रमाण मिलते है |इनमे सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन आरंभिक राज्यों, साम्राज्यों और रजवाड़ों का विकास है | इन राजनीतिक प्रक्रियाओं के लिए कुछ अन्य परिवर्तन उत्तरदायी थे |इनका पता कृषि उपज को संगठित करने के तरीको से पता चलता है |

  • भारतीय अभिलेख के शोधकार्य विज्ञान में 1830 के दशक में एक उल्लेखनिये प्रगति हुई | इस कार्य में एक ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी जेम्स प्रिंसेप का महतवपूर्ण योगदान रहा जिसने ब्राहमी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला | इन लिपियों का प्रयोग सबसे आरंभिक अभिलेखों और सिक्कों में किया गया है | जेम्स प्रिंसेप को पता चला की अधिकांश अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी अर्थात मनोहर मुखाकृति वाले रजा का नाम लिखा है | 

  • ईसा पूर्व छठी शताब्दी में कुछ ऐसे राज्य थे जिन्हें गणसंघ अथवा गणराज्य कहा जा सकता है |उस समय कुछ महत्वपूर्ण गणराज्य  कुशिनारा के मल्ल , पावा के मल्ल ,कपिलवस्तु के शाक्य  ,रामग्राम के कोलिय ,पिप्पलिवन के मोरिय  , अल्कप्प के बुलि ,केसपुत्त के कलाम , सुमसुमारगिरी के भम्ग , वैशाली के लिच्छव

  •  छठी शताब्दी ई॰ पू॰ का सबसे महत्वपूर्ण गणराज्य वजिजियों का था | उनका राज्य गंगा के उत्तरी भाग में फैला हुआ था | यह राज्य आठ गणों का का एक संघ था जिनमें से लिच्छवी गण बहुत ही महत्वपूर्ण था | चेतक के अधीन लिच्छवी बहुत ही शक्तिशाली हो गए थे परंतु मगध के शासक अजातशत्रु ने उन्हें पराजित कर दिया और उनके राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया |

  • ईसा पूर्व छठी शताब्दी में देश में बड़े -बड़े राज्यों की स्थापना हुई जिन्हें महाजनपद कहते है | इनमे से अधिकतर राज्य विध्यांचल पर्वत के उत्तर में स्थित थे और उनका विस्तार क्षेत्र उत्तर –पश्चिमी सीमांत से लेकर बिहार तक था | मगध, कौसल, वत्स और अवन्ती बड़े शक्तिशाली राज्य थे |

  • | सबसे पूर्व की ओर ‘अंग’ जनपद था जिसे पड़ोस के मगध राज्य ने जीतकर अपने राज्य में मिला लिया था | मगध अपने समय का सबसे प्रमुख राज्य था | इन राज्यों में सदा आपसी संघर्ष होता रहता था | मगध ने प्रमुखता प्राप्त की और उसे एक साम्राज्य स्थापित करने में सफलता मिली 

  • मौर्येकाल की जानकारी देने वाले स्त्रोतों में मेग्स्थिनिज की ‘इंडिका’ महतवपूर्ण है | इस पुस्तक में मौर्यों की शासन प्रणाली तथा तत्कालीन समाज का बड़ा सुन्दर वर्णन है |कौटिल्य की पुस्तक अर्थशास्त्र में भी हमें मौर्येकाल की शासन प्रणाली की काफी जानकारी मिलती है

  • इलाहबाद स्तंभ अभिलेख के नाम से प्रसिद्ध प्रयाग प्रशस्ति समुद्रगुप्त के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देती है | इसे समुद्रगुप्त गुप्त के राजकवि हरिषेण ने लिखा था | इससे पता चलता है की वह संभवतः गुप्त सम्राटों में सबसे शक्तिशाली तथा गुण-संपन्न था |

  •  कौटिल्य का अर्थशास्त्र राजनीति से संबंधित एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है | इसकी रचना कौटिल्य ने की थी जो एक बहुत बड़ा विद्वान और चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री था उसने इस ग्रन्थ के प्रशासन में सिंद्धांतो का वर्णन किया है | इस ग्रंथ का भारतीय इतिहास में बहुत महत्व था |

  • अशोक के शिलालेख -  सिद्धपुर – यह स्थान मैसूर राज्य के चित्तल दुर्ग जिले में हैं ,  ब्रह्मगीरी - यह स्थान भी मैसूर राज्य में है ,  मास्की – यह स्थान हैदराबाद के निकट है ,  सहसाराम – यह स्थान शाहाबाद ( बिहार ) में है 

  •  अशोक के शिलालेख हमें अशोक के निजी धर्म और उच्च चरित्र के विषय में जानकारी देते है |

  •  अशोक के मिस्त्र, सीरिया, बर्मा और श्रीलंका के साथ बड़े आचे संबध थे |

  • अशोक की गणना केवल भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के महान सम्राटों में की जाती है  कलिंगयुद्ध के बाद अशोक ने यह ठाना की वह सिर्फ अब लोगो की सेवा में ही अपना सारा जीवन व्यतित कर देंगे | विश्व में किसी भी सम्राट ने ऐसा त्याग नही किया है| अशोक अपनी प्रजा को अपनी संतान के समान समझते थे | राज्य की ओर से विधवाओं तथा अनाथों को विशेष सुविधाएँ प्राप्त थी |अशोक के एक सहनशील सम्राट था | वह सभी धर्मो का आदर करता था |अशोक पहला शासक था जिसने पशुओं के लिए भी अस्पताल खुलवाए |

  •  किसानो की तरह मौर्येकाल में कारीगरों तथा शिल्पियों की स्थिति भी बहुत महत्वपूर्ण थी | मेगस्थनीज ने जल्द की सामाजिक वर्गीकरण में इन्हें चौथा स्थान दिया | व्यापार की उन्नति के कारण शिल्पियों तथा कारीगरों की संख्या काफी बढ़ गयी थी | प्रत्येक श्रेणी के शिल्पकारों ने अपना संगठन भी बना लिया था | प्रत्येक संगठन का नेता भी होता था | 

  • शिल्पकारों के प्रत्येक लोगो का अपना एक काम होता था यदि एक श्रेणी के कारीगर खेती -बाड़ी के यंत्र बनाते थे तो दूसरी श्रेणी के शिल्पकार घरेलु समान बनाते थे | इसी प्रकार जैसे मूर्तिकार, बुनकरों, कुम्हारों, लुहारों तथा हठी दांत का काम करने वालो की अपनी –अपनी अलग श्रेणियाँ होती थी |

  • मेगस्थनीज के विवरण में मौर्य साम्राज्य के महान अधिकारियों के कार्यो के बारे में निम्नलिखित बातें बताई गयी है – कुछ अधिकारी नदियों की देख –रेख और भूमि मापन का काम करते थे |कुछ प्रमुख नहरों से उपनगरों के लिए छोड़े जाने वाले पानी के मुखद्वार का निरिक्षण करते थे ताकि सभी स्थानों पर पानी की समान पूर्ति की जा सके |यही अधिकारी शिकारियों पर भी नजर रखते थे |अधिकारीगण कर वसूली करते थे और भूमि से जुड़े सभी व्यवसायों का निरिक्षण करते थे | साथ ही वे लकड़हारों, बढई, लोहारों का भी निरिक्षण करते थे

  • बौद्ध धर्म में छोटे किसानो तथा बड़े –बड़े जमींदारों का उल्लेख मिलता है | बड़े –बड़े जमींदार और ग्राम प्रधान शक्तिशाली माने जाते थे | वे किसानों पर नियंत्रण रखते थे | ग्राम प्रधान का पद बड़ा होता था | 

  • – इसवी की आरंम्भिक शताब्दियों से भूमि दान के प्रमाण मिलते है | इनमे से कई भु -दानों का उल्लेख अभिलेखों में मिलता है | कुछ अभिलेख पत्थरों पर खुदे हुए थे | इन्हें संभवतः भूमिदान पाने वाले लोगो को प्रमाण के रूप में दिया जाता था | भूमिदान के जो प्रमाण मिले है, वे दान प्राय धार्मिक संथाओं या ब्राह्मणों को दिए है | अधिकांश अभिलेख संस्कृत में थे | 

  • भूमिदान के प्रचलन से राज्य तथा किसानो के बीच संबंध की भी झलक मिलती है परंतु कुछ लोग ऐसे भी थे जिन पर अधिकारियो का नियंत्रण नहीं था | इनमे पशुपालक, शिकारी, शिल्पकारी, और जगह –जगह घूमकर खेती करने वाले लोग शामिल थे |

  • भूमिदान के प्रचलन से राज्य तथा किसानो के बीच संबंध की भी झलक मिलती है परंतु कुछ लोग ऐसे भी थे जिन पर अधिकारियो का नियंत्रण नहीं था | इनमे पशुपालक, शिकारी, शिल्पकारी, और जगह –जगह घूमकर खेती करने वाले लोग शामिल थे |

  • विभिन्न व्यापारी – इन मार्गों पर चलने वाले व्यापरियों में पैदल फैरी लगाने वाले तथा बैलगाड़ी और घोड़ों के दाल के साथ चलन्र वाले व्यापारी शामिल थे | वे समुद्री मार्ग से भी यात्रा करते थे | यह यात्रा खतरनाक तो थी, परंतु बहुत हि८ लाभदायक होती थी 

  • विभिन्न व्यापारी – इन मार्गों पर चलने वाले व्यापरियों में पैदल फैरी लगाने वाले तथा बैलगाड़ी और घोड़ों के दाल के साथ चलन्र वाले व्यापारी शामिल थे | वे समुद्री मार्ग से भी यात्रा करते थे | यह यात्रा खतरनाक तो थी, परंतु बहुत हि८ लाभदायक होती थी 

  • आयात निर्यात नमक, अनाज, कपड़ा, धातु और उसमे निर्मित उत्पाद, पत्थर, लकड़ी, जड़ी –बूटियों आदि अनेक प्रकार के पदार्थ एक स्थान से दुसरे स्थान तक ले जाये जाते थे | इन सभी वस्तुओ को अरब सागर के मार्ग से भूमध्य क्षेत्र तक पहुँचाया जाता था |  

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