Chapter 5. विधायिका Class 11 Political Science CBSE notes in hindi कानून बनाने की प्रक्रिया - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 11 English Medium Political Science All Chapters:
5. विधायिका
2. कानून बनाने की प्रक्रिया
कानून बनाने की प्रक्रिया :
विधेयक: प्रस्तावित कानून के प्रारूप को विधेयक कहते है |

विधेयक दो प्रकार के होते है :
(1) सरकारी विधेयक : वह विधेयक जिसे सरकार का कोई मंत्री संसद में पेश/प्रस्तुत करता है | सरकारी विधेयक कहलाता है |
सरकारी विधेयक दो प्रकार के होते है |
(a) साधारण विधेयक : धन या वित्तीय विधेयक को छोड़कर सभी सरकारी विधेयक साधारण विधेयक होते हैं | जैसे - जनता से जुडी मामलों के लिए कोई नया कानून बनाना हो या संविधान में कोई संसोधन करना हो |
साधारण विधेयक दो प्रकार के होते है |
(i) समान्य विधेयक
(ii) संविधान संसोधन विधेयक
(b) धन या वित्तीय विधेयक : वह विधेयक जो किसी नए कर, छुट या अन्य वित्तीय लेनदेन से संबंधित हो या किसी कार्य के लिए धन मुहैया कराना हो ऐसे विधेयक को वितीय विधेयक कहते है |
(2) निजी विधेयक या गैर-सरकारी विधेयक : वह विधेयक जिसे मंत्री के अलावा संसद का कोई अन्य सदस्य संसद में प्रस्तुत करे तो उसे निजी विधेयक कहते है |
संसद से कानून बनाने की प्रक्रिया :
कोई भी कानून का प्रस्ताव कानून बनने से पहले विधेयक (bill) होता है जब वह संसद के दोनों सदन से बहस के बाद स्वीकृत हो जाने के बाद मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास जाता है | राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से वह मंजूर हो जाता है और फिर वह विधेयक कानून का रूप ले लेता है |
हमें विधेयक या किसी कानून की क्या आवश्यकता है ?
(i) कोई भी राजनितिक दल अपने चुनावी वायदों को पूरा करने के लिए या आगामी चुनाव में जीतने के इरादे से किसी विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकती है |
(ii) लोकहितकारी कार्य को करने के लिए या अनेक हित-समूहों के द्वारा मिडिया और नागरिक संगठन भी किसी विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकती है |
(iii) कोई भी सरकार अपने योजनाओं को पूरा करने लिए अथवा जनता से किये वायदों को पूरा करने लिए संसद में विधेयक ला सकती है |
(iv) वर्त्तमान परिस्थिति में यदि संविधान में संसोधन की आवश्यकता हो तो सरकार संविधान संसोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत कर सकती है |
कानून बनाना केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं बल्कि राजनितिक प्रक्रिया भी है |
(i) विधेयक बनाने में aएक बातों का ध्यान रखना पड़ता है जैसे - कानून लागु करने के लिए जरुरी संसाधन कहाँ से जुटाया जायेगा | विधेयक का कितना समर्थन और कितना विरोध होगा, चुनाब में इस कानून का क्या प्रभाव होगा आदि समस्याएँ राजनितिक फैसले होते है |
(ii) यदि गठबंधन सरकार है तो सहयोगी पार्टियों की क्या प्रतिक्रिया या भूमिका होगी यह भी राजनितिक प्रक्रिया है |
(iii) कानून बनाने की प्रक्रिया से पहले उस कानून के लिए मंत्रिमंडल में इस बात पर विचार किया जाता है |
(iv) कई बार एक कानून कई मंत्रालयों से जुड़ा होता है जिस पर उन सभी मंत्रालयों का विचार लेना होता है फिर प्रमुख संबद्ध मंत्रालय विधेयक का प्रारूप तैयार करता है |
संसद में धन विधेयक पास करने की प्रक्रिया :
(i) धन विधेयक केवल लोकसभा में ही शुरू हो सकता है |
(ii) जब लोकसभा धन विधेयक को पास कर देती है तो इसको राज्यसभा की सिफारिशों के लिए राज्यसभा में भेज दिया जाता है |
(iii) राज्यसभा 14 दिन के भीतर अपनी सिफारिशों को लोकसभा को लौटा देता है, यह लोकसभा की मर्जी पर निर्भर करता है कि वह राज्यसभा के सिफारिशों को माने ले या ना माने |
(iv) यदि लोकसभा राज्य सभा की सिफारिशों को मान लेता है तो यह समझा जायेगा कि धन विधेयक उन राज्यसभा की उन सुधारों के साथ दोनों सदनों ने पास कर दिया है |
(v) यदि राज्यसभा की सिफारिशें लोकसभा स्वीकार नहीं करती है तो यह समझा जायेगा कि धन विधेयक लोकसभा द्वारा पास किये गए रूप में दोनों सदनों ने पास कर दिया है |
(vi) राज्यसभा ने 14 दिन के भीतर यह बिल को नहीं लौटाया तो समझा जायेगा कि उस बिल को दोनों सदनों ने पास कर दिया है |
(vii) कोई धन विधेयक राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जायेगा तो राष्ट्रपति उसे पुनर्विचार के लिए नहीं लौटा सकते | अर्थात राष्ट्रपति धन विधेयक को स्वीकृती देने ने मना नहीं करेंगे |
शून्यकाल: प्रश्नकाल के तुरंत पश्चात् 12 बजे आरंभ होने वाले समय को शून्यकाल कहा जाता है |
प्रश्नकाल : प्रश्नकाल संसद के अधिवेशन के समय प्रतिदिन एक अवधि आता है जिसमें मंत्रियों को संसद सदस्यों के तीखे प्रश्नों के जबाब देना पड़ता है | इस अवधि को प्रश्नकाल कहते है |
प्रश्नकाल अक्सर दोनों सदनों की बैठक की सर्वाधिक हलचल वाली अवधि है | प्रश्नकाल मंत्रियों को एक दम सजग रखता है | यह सरकारी अन्याय तथा ढील के प्रति एक महत्वपूर्ण संरक्षण है |
स्थगन या कामरोको प्रस्ताव: सदन समस्त अन्य कार्य छोड़कर तथा तत्कालिक सार्वजानिक महत्व के मामले पर विचार विमर्श शुरे करे ऐसे प्रस्ताव को स्थगन या कामरोको प्रस्ताव कहते है |
प्रश्नकाल की विशेषताएँ :
(i) प्रश्नकाल सरकार की कार्यपालिका और प्रशासकीय एजेंसियों पर निगरानी रखने का का सबसे प्रभावी तरीका है |
(ii) संसद के इस अवधि में मंत्रियों से उनके कार्यों से संबंधित प्रश्न पूछे जाते है इसलिए यह गहरी रूचि वाला अवधि है |
(iii) लोकहित के लिए प्रश्नकाल की अवधि अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि जनता से जुड़े समस्याओं पर सवाल पूछे जाते हैं और इन मुद्दों पर सूचनाएं मांगी जाती है |
संसद का कार्यपालिका पर नियंत्रण :
कार्यपालिका पर नियंत्रण की आवश्यकता:
लोकसभा में बहुमत वाले दल या गठबंधन के सदस्य मिलकर संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका का निर्माण करते है | ऐसा हो सकता है कि बहुमत की ताकत पाकर यह कार्यपालिका अपनी शक्तियों का मनमाना प्रयोग करने लगे | जिससे मत्रिमंडल जो कहेगा सदन को वही मानना पड़ेगा | इसलिए कार्यपालिका पर नियंत्रण की आवश्यकता है |
संसद अनेक विधियों के प्रयोग द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण करती है |
(i) बहस और वाद-विवाद के द्वारा : प्रश्नकाल में संसद सदस्यों द्वारा पूछे गए प्रश्नों से कार्यपालिका की जबाबदेही तय होती है | प्रश्नकाल सरकार की कार्यपालिका और प्रशासकीय एजेंसियों पर निगरानी रखने का का सबसे प्रभावी तरीका है |
(ii) कानूनों को मंजूरी देने या नामंजूर करने का अधिकार भी संसद के पास है | इस अधिकार के द्वारा संसद कार्यपालिका का नियंत्रण होता है |
(iii) सरकार के कार्यों के लिए वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था बजट के द्वारा होता है, जिस बजट को पास करवाने के लिए कार्यपालिका को संसद की मंजूरी लेनी पड़ती है | यही कारण है कि विधायिका को कार्यपालिका के खजाने पर नियंत्रण करने का अवसर मिल जाता है |
(iv) कई बार संसद अविश्वास प्रस्ताव के द्वारा अल्पमत की सरकार को त्यागपत्र देने के लिए मजबूर कर दिया है | ऐसा तब होता है जब अपने ही गठबंधन के सदस्यों को अपनी सरकार पर विश्वास नहीं हो |
संसदीय विशेषाधिकार : विधायिका में कुछ भी कहने के वावजूद किसी सदस्य के विरुद्ध कोई क़ानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती | इसे संसदीय विशेषाधिकार कहते है |