Chapter Chapter 2. भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक Class 10 Economics CBSE notes in hindi भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रक - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 10 English Medium Economics All Chapters:
Chapter 2. भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक
2. भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रक
अध्याय 2. भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक
भारतीय अर्थव्यवस्था अनेक प्रकार की आर्थिक गतिविधियों से मिलकर बनी है। इन गतिविधियों को उनके कार्य के आधार पर विभिन्न क्षेत्रकों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक क्षेत्रक देश के उत्पादन, रोजगार और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यद्यपि इनकी कार्यप्रणाली अलग-अलग होती है, फिर भी सभी क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
भाग 1 – भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रक
इस भाग में आर्थिक गतिविधियों, प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक क्षेत्रकों एवं उनकी विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
आर्थिक क्षेत्रक का अर्थ
समान प्रकार की आर्थिक गतिविधियों के समूह को आर्थिक क्षेत्रक कहा जाता है।
(i) अर्थव्यवस्था को समझने के लिए आर्थिक गतिविधियों का वर्गीकरण किया जाता है।
(ii) प्रत्येक क्षेत्रक का अपना अलग कार्य होता है।
(iii) सभी क्षेत्रक मिलकर राष्ट्रीय आय में योगदान देते हैं।
(iv) प्रत्येक क्षेत्रक रोजगार के अवसर प्रदान करता है।
(v) सभी क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।
प्राथमिक क्षेत्रक
प्राथमिक क्षेत्रक वह क्षेत्र है जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का प्रत्यक्ष उपयोग किया जाता है।
(i) इसे कृषि क्षेत्र भी कहा जाता है।
(ii) यह अन्य क्षेत्रकों को कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
(iii) इसकी गतिविधियाँ भूमि, जल, वन तथा खनिजों पर आधारित होती हैं।
(iv) ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश लोगों की आजीविका इसी क्षेत्र पर निर्भर करती है।
(v) यह अर्थव्यवस्था का आधारभूत क्षेत्रक माना जाता है।
उदाहरण: कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी तथा खनन।
द्वितीयक क्षेत्रक
द्वितीयक क्षेत्रक में कच्चे माल को तैयार अथवा अर्द्ध-तैयार वस्तुओं में परिवर्तित किया जाता है।
(i) इसे औद्योगिक या विनिर्माण क्षेत्र भी कहा जाता है।
(ii) इस क्षेत्र में कारखानों में वस्तुओं का निर्माण किया जाता है।
(iii) यह कच्चे माल का मूल्य बढ़ाता है।
(iv) औद्योगिक विकास से रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
(v) यह देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
उदाहरण: वस्त्र उद्योग, इस्पात उद्योग, सीमेंट उद्योग, ऑटोमोबाइल उद्योग तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग।
तृतीयक क्षेत्रक
तृतीयक क्षेत्रक में विभिन्न प्रकार की सेवाएँ प्रदान की जाती हैं, जो उत्पादन एवं उपभोग दोनों में सहायता करती हैं।
(i) इसे सेवा क्षेत्र भी कहा जाता है।
(ii) यह सीधे वस्तुओं का उत्पादन नहीं करता।
(iii) यह परिवहन, संचार, बैंकिंग तथा व्यापार जैसी सेवाएँ उपलब्ध कराता है।
(iv) वर्तमान समय में इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है।
(v) भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इसका सबसे अधिक योगदान है।
उदाहरण: बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, बीमा, पर्यटन तथा सूचना प्रौद्योगिकी।
क्षेत्रकों की परस्पर निर्भरता
भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
(i) प्राथमिक क्षेत्रक उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
(ii) द्वितीयक क्षेत्रक कच्चे माल से तैयार वस्तुओं का निर्माण करता है।
(iii) तृतीयक क्षेत्रक परिवहन, बैंकिंग, विपणन और संचार जैसी सेवाएँ प्रदान करता है।
(iv) किसी एक क्षेत्रक की प्रगति अन्य क्षेत्रकों के विकास में भी सहायक होती है।
(v) संतुलित आर्थिक विकास के लिए सभी क्षेत्रकों का विकास आवश्यक है।
विभिन्न क्षेत्रकों का महत्व
प्रत्येक क्षेत्रक भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(i) प्राथमिक क्षेत्रक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
(ii) द्वितीयक क्षेत्रक औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देता है।
(iii) तृतीयक क्षेत्रक आर्थिक गतिविधियों को गति प्रदान करता है।
(iv) सभी क्षेत्रक रोजगार के अवसर उत्पन्न करते हैं।
(v) सभी क्षेत्रक मिलकर राष्ट्रीय आय एवं आर्थिक विकास में योगदान देते हैं।
CBSE परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
(i) भारतीय अर्थव्यवस्था को प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रकों में विभाजित किया गया है।
(ii) प्राथमिक क्षेत्रक प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होता है।
(iii) द्वितीयक क्षेत्रक कच्चे माल को तैयार वस्तुओं में परिवर्तित करता है।
(iv) तृतीयक क्षेत्रक विभिन्न सेवाएँ प्रदान करता है।
(v) तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर हैं तथा आर्थिक विकास में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।