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Chapter Chapter 13. महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आन्दोलन Class 12 History Part-3 CBSE notes in hindi NOTES - CBSE Study

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Chapter Chapter 13. महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आन्दोलन Class 12 History Part-3 CBSE notes in hindi NOTES - CBSE Study

कक्षा 12 History Part-3 के लिए NCERT समाधान नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम और NCERT पाठ्यपुस्तकों के अनुसार सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझ सकें। इन समाधानों में सभी महत्वपूर्ण Chapter 13. महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आन्दोलन को विस्तृत व्याख्या और चरण-दर-चरण उत्तरों सहित शामिल किया गया है, जिससे परीक्षा की बेहतर तैयारी हो सके। प्रत्येक NOTES को सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी मूलभूत सिद्धांतों को आसानी से समझकर अपनी शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार कर सकें। यह अध्ययन सामग्री दैनिक गृहकार्य, पुनरावृत्ति अभ्यास तथा वार्षिक परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। सटीक उत्तर, स्पष्ट अवधारणाएँ और व्यवस्थित सामग्री विद्यार्थियों को आत्मविश्वास बढ़ाने तथा परीक्षाओं में अधिक अंक प्राप्त करने में सहायता करती है। चाहे आप किसी विशेष विषय का पुनरावृत्ति कर रहे हों या पूरे अध्याय की तैयारी कर रहे हों, यह संसाधन History Part-3 में पूर्ण सफलता के लिए विश्वसनीय और पाठ्यक्रम-आधारित मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Class 12 English Medium History Part-3 All Chapters:

Chapter 13. महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आन्दोलन

1. NOTES

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महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन

1. महात्मा गाँधी का राष्ट्रीय आंदोलन में आगमन

महात्मा गाँधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उन्होंने भारतीय राजनीति में सत्याग्रह, अहिंसा और जनसहभागिता को आंदोलन का आधार बनाया। गाँधीजी ने राष्ट्रीय आंदोलन को शहरी नेतृत्व से निकालकर गाँवों और आम जनता तक पहुँचाया।

2. गाँधीजी के आंदोलन की विचारधारा

गाँधीजी की राजनीति नैतिक मूल्यों पर आधारित थी। उनका उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि समाज का नैतिक और सामाजिक पुनर्निर्माण भी था।

  • सत्य (Truth)
  • अहिंसा (Non-violence)
  • सत्याग्रह (आत्मबल से अन्याय का विरोध)
  • स्वराज (आत्मशासन)
  • स्वदेशी और आत्मनिर्भरता

3. प्रारंभिक सत्याग्रह आंदोलन

भारत में गाँधीजी ने राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत स्थानीय समस्याओं से की। इन आंदोलनों ने उन्हें जनता से सीधे जोड़ दिया।

(i) चंपारण सत्याग्रह (1917)

यह आंदोलन नील की जबरन खेती और तिनकठिया प्रथा के विरोध में किया गया। इससे किसानों को राहत मिली और गाँधीजी को राष्ट्रीय पहचान प्राप्त हुई।

(ii) अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918)

यह आंदोलन मजदूरों के वेतन और अधिकारों के समर्थन में किया गया। गाँधीजी ने यहाँ अहिंसक सत्याग्रह का प्रयोग किया।

(iii) खेड़ा सत्याग्रह (1918)

फसल खराब होने के बावजूद लगान वसूली के विरोध में यह आंदोलन किया गया। सरकार को अंततः किसानों को राहत देनी पड़ी।

4. असहयोग आंदोलन (1920–22)

जलियाँवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत आंदोलन के बाद गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। यह आंदोलन पहली बार व्यापक जन आंदोलन बना।

  • सरकारी पदों और उपाधियों का त्याग
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
  • खादी और चरखे का प्रचार
  • शिक्षण संस्थानों और न्यायालयों का बहिष्कार

5. सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी यात्रा (1930)

नमक कानून के विरोध में गाँधीजी ने दांडी यात्रा प्रारंभ की। नमक जैसी सामान्य वस्तु को आंदोलन का प्रतीक बनाकर उन्होंने औपनिवेशिक शासन को सीधी चुनौती दी।

  • नमक कानून का उल्लंघन
  • अन्यायपूर्ण कानूनों को तोड़ना
  • आंदोलन का गाँव-गाँव फैलना

यह आंदोलन ब्रिटिश सत्ता की नैतिक वैधता पर सीधा प्रहार था।

6. गाँधीजी और सामाजिक सुधार

गाँधीजी का आंदोलन केवल अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं था, बल्कि सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध भी था।

  • छुआछूत का विरोध
  • हरिजन आंदोलन
  • महिलाओं की सक्रिय भागीदारी
  • खादी, स्वदेशी और ग्राम स्वराज का प्रचार

उन्होंने सामाजिक एकता को स्वतंत्रता की अनिवार्य शर्त माना।

7. भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गाँधीजी ने “करो या मरो” का नारा देकर भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ किया।

  • तत्काल स्वतंत्रता की माँग
  • व्यापक जनभागीदारी
  • नेतृत्व की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन जारी

यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत सिद्ध हुआ।

8. गाँधीजी की राजनीति की विशेषताएँ

  • जनसाधारण की व्यापक भागीदारी
  • नैतिक दबाव पर आधारित राजनीति
  • अहिंसक संघर्ष की नीति
  • प्रतीकों का प्रभावी उपयोग (नमक, चरखा)

9. महात्मा गाँधी का राष्ट्रीय आंदोलन में महत्व

महात्मा गाँधी ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने आंदोलन को जन आंदोलन बनाया और किसानों, मजदूरों तथा महिलाओं को इसमें जोड़ा। राजनीति को नैतिकता से जोड़कर उन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक और प्रभावशाली बनाया।

गोलमेज सम्मेलन, महात्मा गाँधी की जेल यात्रा और नमक आंदोलन

भूमिका

महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने एक नया रूप ग्रहण किया। गाँधीजी ने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह को आंदोलन का आधार बनाया। नमक आंदोलन, गाँधीजी की जेल यात्राएँ और गोलमेज सम्मेलन स्वतंत्रता संघर्ष के महत्वपूर्ण चरण थे।

नमक आंदोलन (1930)

नमक आंदोलन ब्रिटिश सरकार के नमक कानून के विरोध में शुरू किया गया। नमक जीवन की आवश्यक वस्तु थी, फिर भी उस पर कर लगाया गया था, जिसका सबसे अधिक बोझ गरीब जनता पर पड़ता था। गाँधीजी ने नमक को आंदोलन का प्रतीक बनाकर पूरे देश को संघर्ष से जोड़ा।

दांडी यात्रा

12 मार्च 1930 को महात्मा गाँधी ने साबरमती आश्रम से दांडी की यात्रा प्रारंभ की। लगभग 240 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद 6 अप्रैल 1930 को उन्होंने समुद्र तट पर नमक उठाकर कानून तोड़ा। इससे सविनय अवज्ञा आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला।

नमक आंदोलन का प्रभाव

देशभर में नमक कानून तोड़ा गया। महिलाओं, किसानों और मजदूरों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। हजारों लोग गिरफ्तार किए गए। इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नैतिक वैधता को गंभीर चुनौती दी।

महात्मा गाँधी की जेल यात्रा

महात्मा गाँधी ने जब-जब अन्यायपूर्ण ब्रिटिश कानूनों का अहिंसक उल्लंघन किया, उन्हें जेल भेजा गया। गाँधीजी की जेल यात्राएँ आंदोलन को कमजोर करने के बजाय और अधिक सशक्त बनाती रहीं।

प्रमुख जेल यात्राएँ

1922 में असहयोग आंदोलन के बाद गाँधीजी को जेल भेजा गया। 1930 में नमक आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया। 1932 में गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद पुनः जेल हुई। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय भी गाँधीजी जेल में रहे।

जेल यात्रा का महत्व

गाँधीजी की गिरफ्तारी से जनता में रोष बढ़ा। लोगों में त्याग और संघर्ष की भावना प्रबल हुई। जेल भी गाँधीजी के लिए संघर्ष और आत्मबल का केंद्र बन गई।

गोलमेज सम्मेलन

ब्रिटिश सरकार ने भारत के संवैधानिक भविष्य पर चर्चा के लिए 1930 से 1932 के बीच लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित किए। इन सम्मेलनों का उद्देश्य भारत में संवैधानिक सुधारों पर विचार करना था।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930)

पहले गोलमेज सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भाग नहीं लिया। उस समय कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय थी। कांग्रेस की अनुपस्थिति के कारण यह सम्मेलन प्रभावहीन रहा।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931)

गाँधी-इरविन समझौते के बाद महात्मा गाँधी कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए। गाँधीजी ने कांग्रेस को भारत का प्रतिनिधि बताया और पूर्ण स्वराज की माँग रखी। लेकिन अल्पसंख्यक प्रश्न और ब्रिटिश नीति के कारण यह सम्मेलन असफल रहा।

तृतीय गोलमेज सम्मेलन (1932)

तृतीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया और महात्मा गाँधी उस समय जेल में थे। इसी सम्मेलन के आधार पर बाद में 1935 का भारत शासन अधिनियम बनाया गया।

समग्र मूल्यांकन

नमक आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को जनआंदोलन का रूप दिया। महात्मा गाँधी की जेल यात्राओं ने संघर्ष की भावना को और प्रबल किया। गोलमेज सम्मेलनों की असफलता से यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार भारत को वास्तविक स्वतंत्रता देने के लिए तैयार नहीं थी। इन सभी घटनाओं ने स्वतंत्रता संघर्ष को निर्णायक दिशा प्रदान की।

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