Chapter Chapter 11. विद्रोही और राज Class 12 History Part-3 CBSE notes in hindi विद्रोही और राज Notes - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 12 English Medium History Part-3 All Chapters:
Chapter 11. विद्रोही और राज
1. विद्रोही और राज Notes
अध्याय 2 : विद्रोही और राज
1857 का विद्रोह – पृष्ठभूमि, कारण, स्वरूप और परिणाम
1857 का विद्रोह : परिचय
1857 का विद्रोह भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहला व्यापक और संगठित प्रतिरोध था। इस विद्रोह में केवल सैनिक ही नहीं, बल्कि किसान, जमींदार, कारीगर और अनेक भारतीय शासक भी शामिल थे। ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे सिपाही विद्रोह कहा, जबकि भारतीय इतिहास में इसे स्वतंत्रता के लिए पहला बड़ा संघर्ष माना जाता है।
विद्रोह के कारण
सैन्य कारण
भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव किया जाता था। उन्हें कम वेतन मिलता था और उच्च पदों से वंचित रखा जाता था। एनफील्ड राइफल के चर्बीयुक्त कारतूसों की अफवाह ने सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई, जिससे असंतोष और विद्रोह की भावना फैल गई।
राजनीतिक कारण
ब्रिटिश सरकार की विस्तारवादी नीति, दत्तक नीति और भारतीय रियासतों के विलय ने शासक वर्ग को असंतुष्ट कर दिया। अवध का विलय और मुगल सम्राट की शक्ति का ह्रास विद्रोह को भड़काने वाले प्रमुख कारण बने।
आर्थिक कारण
किसानों पर भारी लगान लगाया गया और जमींदारियों की जब्ती की गई। भारतीय हस्तशिल्प और उद्योग नष्ट हो गए, जिससे कारीगर बेरोजगार हो गए। इस आर्थिक शोषण ने जनता में गहरा असंतोष पैदा किया।
सामाजिक एवं धार्मिक कारण
ब्रिटिश सरकार द्वारा किए गए सामाजिक सुधारों को भारतीय समाज ने अपने धर्म और परंपराओं पर आक्रमण के रूप में देखा। ईसाईकरण के भय और धार्मिक हस्तक्षेप की आशंकाओं ने विद्रोह को और तीव्र बना दिया।
विद्रोह की शुरुआत और फैलाव
विद्रोह की शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ से हुई। सिपाहियों ने ब्रिटिश अधिकारियों पर हमला किया और दिल्ली पहुँचकर बहादुर शाह ज़फर को भारत का सम्राट घोषित किया। इसके बाद विद्रोह दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी, बरेली और बिहार तक फैल गया।
विद्रोह के प्रमुख नेता
दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर को विद्रोह का प्रतीकात्मक नेता बनाया गया। झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई, कानपुर में नाना साहेब, बिहार में कुंवर सिंह और लखनऊ में बेगम हज़रत महल ने विद्रोह का नेतृत्व किया। इन नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में ब्रिटिश सत्ता को गंभीर चुनौती दी।
विद्रोह का स्वरूप
1857 का विद्रोह केवल सैनिक विद्रोह नहीं था। यह एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले चुका था, जिसमें ग्रामीण जनता, किसान और शहरी वर्ग भी शामिल थे। इस विद्रोह का उद्देश्य पारंपरिक सत्ता, धर्म और सामाजिक सम्मान की रक्षा करना था।
ब्रिटिश दमन नीति
ब्रिटिश सरकार ने विद्रोह को कठोरता से दबाया। भारी सैन्य बल का प्रयोग किया गया, सार्वजनिक फाँसियाँ दी गईं, गाँव जलाए गए और संपत्तियाँ जब्त की गईं। इस दमन नीति के माध्यम से विद्रोह को धीरे-धीरे कुचल दिया गया।
विद्रोह की असफलता के कारण
विद्रोह के असफल होने के प्रमुख कारणों में एकीकृत राष्ट्रीय नेतृत्व का अभाव, आधुनिक हथियारों की कमी और संसाधनों का अभाव शामिल था। कई भारतीय रियासतें तटस्थ रहीं, जिससे विद्रोह को व्यापक समर्थन नहीं मिल सका।
विद्रोह के परिणाम
1857 के विद्रोह के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया। भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया। सेना और प्रशासन में बड़े परिवर्तन किए गए तथा भारतीयों के प्रति नीतियाँ और अधिक सतर्क हो गईं।
विद्रोह का ऐतिहासिक महत्व
1857 का विद्रोह ब्रिटिश शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिद्ध हुआ। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय जनता ब्रिटिश शासन से असंतुष्ट थी। यद्यपि यह विद्रोह असफल रहा, फिर भी इसने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन की नींव रखी।