Chapter 7. संघवाद Class 11 Political Science CBSE notes in hindi संघवाद परिचय - CBSE Study
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CBSE NOTES:
Class 11 English Medium Political Science All Chapters:
7. संघवाद
1. संघवाद परिचय
7. संघवाद
संघवाद : संघवाद एक संस्थागत प्रणाली है जिसमें एक प्रांतीय स्तर की सरकारें और दूसरी केन्द्रीय स्तर की सरकार एक साथ एक ही देश में अपने-अपने अधिकारों के अनुरूप शासन करती है | सरकारों की ऐसी व्यवस्था को संघवाद कहते हैं |
भारत में संघीय ढांचा : भारतीय संघात्मक सरकार में 29 राज्य व 7 केन्द्रशासित इकाइयाँ है जो एक साथ मिलकर भारत में संघीय शासन की स्थापना करती है | केन्द्रीय शासन के तौर पे दिल्ली को राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्र का दर्जा दिया गया है |
विश्व में संघीय राज्य : विश्व में बहुत ऐसे राज्य है जहाँ संघीय शासन प्रणाली है जैसे - अमेरिका भी सघीय राज्य है लेकिन वह जर्मनी व भारत से भिन्न है | वेस्टइंडीज, नाइजीरिया आदि में संघीय राज्य है |
संघीय शासन में नागरिकता : संघीय शासन में दोहरी नागरिकता पाई जाती है, परंतु भारत में एकहरी नागरिकता ही है |
भारतीय संविधान में संघात्मक लक्षण :
भारतीय संविधान में संघात्मक लक्षण निम्नलिखित है |
(1) संविधान की सर्वोच्यता : भारत में कोई भी शक्ति संविधान से ऊपर नहीं है |
(2) स्वतंत्र सर्वोच्य न्यायालय : भारत में स्वतंत्र सर्वोच्य न्यायालय है जो संघीय ढाँचे में केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का निपटारा करता है |
(3) शक्तियों का विभाजन : शक्तियों का विभाजन तीन तीन सूचियों के आधार पर किया गया है | ये हैं :
(i) संघ सूची
(ii) राज्य सूची
(iii) समवर्ती सूची
(4) दोहरी शासन प्रणाली : भारत में दोहरी शासन प्रणाली है जिसमें एक सशक्त केन्द्रीय सरकार है और दूसरा प्रांतीय सरकारें राज्यों में शासन करती है |
(5) इकहरी नागरिकता : भारत में सभी नागरिकों को इकहरी नागरिकता प्राप्त है |
(6) संघ और राज्यों के लिए एक ही संविधान |
(7) एकीकृत न्यायपालिका |
(8) आपातकाल में एकात्मक शासन |
भारतीय राज्य में संघवाद की आवश्यकता :
(i) भारत एक विशाल राज्य है जिस पर शासन करने के लिए शक्तियों को प्रांतीय और केन्द्रीय शक्तियों के बाँटना जरुरी हैं |
(ii) भारतीय समाज में क्षेत्रीय और भाषाई विविधताएँ अधिक है इन विविधाताओं को मान्यता देने की आवश्यकता थी | इससे सभी को समान अधिकार और सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित किया जा सके |
(iii) भारतीय राज्य की कल्पना एक लोकतांत्रिक राज्य की है जिसमें सभी की सहभागिता आवश्यक है | लोकतान्त्रिक राज्य संधीय व्यस्था को मान्यता देता है |
केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का विभाजन:
संघीय व्यवस्था में शक्तियों का विभाजन आवश्यक है | भारत के संविधान में दो तरह के सरकारों की बात की गई है |
(i) एक सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए जिसे संघीय सरकार या केंद्र सरकार कहते हैं और
(ii) दूसरी प्रत्येक प्रांतीय इकाई या राज्य के लिए जिसे राज्य सरकार कहते हैं | दोनों ही संवैधानिक सरकारें हैं और इनके स्पष्ट कार्य क्षेत्र हैं | शक्तियों के विभाजन को लेकर यदि दोनों के बीच विवाद हो जाये तो इसका निर्णय न्यायपालिका संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार करेगी | संविधान इस बात का स्पष्ट व्यवस्था करता है कि कौन कौन सी शक्तियाँ केंद्र के पास होगी और कौन कौन सी राज्यों के पास होंगी | संविधान ने आर्थिक और वित्तीय शक्तियाँ केन्द्रीय सरकार के हाथ सौंपी है | राज्यों के पास उत्तरदायित्व बहुत अधिक है और आय के साधन कम है |
संघीय व्यवस्था में न्यायालय की भूमिका :
केंद्र और राज्यों के माध्य किसी टकराव को रोकने के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था होती है जो संघर्षों का समाधान करती है | न्यायपालिका की केन्द्रीय सरकार और राज्यों के बीच शक्ति के बँटवारे के सम्बन्ध में उठाने वाले क़ानूनी विवादों को हल करने का अधिकार होता है |
भारतीय संघ को लेकर संविधान निर्माताओं की मान्यता :
अथवा
समस्याएँ जिसके कारण संविधान निर्माता एक सशक्त केन्द्रीय सरकार चाहते थे :
(i) संविधान निर्माताओं की मान्यता थी कि वे एक संघीय संविधान चाहते थे जो भारतीय विविधताओं को समेट सके |
(ii) वे एक शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार की स्थापना भी करना चाहते थे जो विघटनकारी प्रवृतियों पर अंकुश रख सके और समाजिक और राजनितिक परिवर्तन ला सके |
(iii) देश की एकता बनाए रखने के साथ-साथ संविधान निर्माता यह भी चाहते थे कि समाजिक-आर्थिक समस्याओं का समाधान एक शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार करे और ऐसा करने में उसे राज्यों का सहयोग भी प्राप्त हो |
(iv) गरीबी, निरक्षरता और आर्थिक असमानता राष्ट्रिय एकता और विकास आदि कुछ ऐसी समस्याएँ थी जिनके समाधान के लिए नियोजन (planning) और समन्वय (co-ordination) बहुत जरुरी था जिसके लिए एक सशक्त केन्द्रीय सरकार की आवश्यकता थी |
संवैधानिक प्रावधान जो सशक्त केन्द्रीय सरकार की स्थापना करते है :
- किसी राज्य के अस्तित्व और उसकी भौगोलिक सीमाओ के स्थायित्व पर संसद का नियंत्रण |
- संविधान में केंद्र को अत्यंत शक्तिशाली बनाने वाले कुछ आपातकालीन प्रावधान हैं जो लागु होने पर हमारी संघीय व्यवस्था को एक शक्तिशाली केंद्रीकृत व्यवस्था में बदल देते हैं |
- केंद्र सरकार के पास अत्यंत प्रभावी वित्तीय शक्तियाँ और उत्तर दायित्व प्राप्त है तथा आय के प्रमुख संसाधनों पर केंद्र सरकार का नियंत्रण है |
- राज्य के राज्यपाल को यह शक्ति प्राप्त है कि वह राज्य सरकार को हटाने और विधान सभा भंग करने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज सकता है |
- केंद्र सरकार राज्य विधान मंडल द्वारा पारित किसी विधेयक या कानून निर्माण में देरी कर सकता है अथवा यदि चाहे तो ऐसे विधेयकों की परीक्षा कर उन पर निषेधाधिकार (वीटो) का प्रयोग कर उसे पूरी तरह नकार सकता है |
- किसी विशेष परिस्थिति में केंद्र सरकार राज्य सूची में वर्णित विषय पर राज्य सभा की अनुमति लेकर कानून बना सकता है |
- हमारी प्रशासकीय व्यवस्था इकहरी है | भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारीयों जैसे जिलाधीश या भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारीयों जैसे पुलिस कमिश्नर आदि अधिकारीयों पर केंद्र सरकार का अधिकार होता है | राज्य न तो उनके विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है न ही उन्हें सेवा से हटा सकता है |
- संविधान के अनुच्छेद 33 और 34 के अनुसार जब देश के किसी क्षेत्र में सैनिक शासन (मार्शल लॉ ) लागु हो तो संघ सरकार (केंद्र सरकार ) की शक्ति काफी बढ़ जाती है |
भारतीय संविधान संघात्मक परन्तु भावना में एकात्मक है :
भारतीय संविधान शरीर से तो संघात्मक है परन्तु आत्मा उसकी एकात्मक है यह निम्नलिखित बातों से स्पष्ट जी जाती है |
(i) समवर्ती सूची में वर्णित अधिकार के अनुसार केंद्र और राज्यों के बीच बने कानून को लेकर विवाद की स्थिति में अंतिम निर्णय केंद्र के पक्ष में ही जाता है |
(ii) आपातकाल की स्थित में राज्यों के सभी अधिकार छीन जाते है और केन्द्रीय शासन स्थापित हो जाता है |
(iii) केंद्र को राज्यों के मुकाबले अधिकार अधिकार प्राप्त हैं |
(iv) केद्र कभी भी राज्य सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा सकता है |
(v) एकहरी नागरिकता जो एकात्मक व्यवस्था है |
(vi) सभी के लिए एक ही संविधान और एकीकृत न्यायपालिका |